निर्माण-खनन की मार से कराहती अरावली: 53 फीसदी बढ़ा निर्माण, 13.8 फीसदी बढ़ गया क्षरण

अध्ययन में सामने आया है कि शहरी विस्तार और खनन के बढ़ते दबाव के कारण अरावली में मिट्टी का कटाव तेजी से बढ़ रहा है, जबकि बढ़ता वन क्षेत्र भी इसे रोकने में नाकाम साबित हो रहा है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • अरावली में तेजी से बढ़ते निर्माण और बदलते भूमि उपयोग ने मिट्टी के कटाव को गंभीर बना दिया है।

  • एक नए अध्ययन के मुताबिक यहां निर्मित क्षेत्र 53 फीसदी बढ़ने के साथ 2017 से 2024 के बीच हर साल औसतन मिट्टी का नुकसान 13.8 फीसदी बढ़ गया है।

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर निर्माण और खनन पर नियंत्रण नहीं हुआ, तो यह प्राचीन पर्वतमाला मिट्टी, जल स्रोतों और जैव विविधता के लिए बड़े संकट का कारण बन सकती है।

सदियों से उत्तर भारत की जमीन को सहारा देती अरावली अब तेजी से बढ़ते निर्माण और बदलते भूमि उपयोग के दबाव में अपनी पकड़ खो रही है। यहां तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों ने मिट्टी के क्षरण को गंभीर बना दिया है।

इस बारे में भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि यहां निर्मित क्षेत्र (बिल्ट-अप एरिया) 53 फीसदी बढ़ गया है, जिसके कारण 2017 से 2024 के बीच हर साल औसतन मिट्टी को हो रहा नुकसान 13.8 फीसदी बढ़ गया है। यह संकेत है कि विकास की रफ्तार के सामने बेबस अरावली की धरती तेजी से क्षरण का शिकार बन रही है। हालिया शोध बताता है कि इंसानी गतिविधियों और तेजी से फैलते निर्माण ने इस प्राचीन पर्वत प्रणाली की जमीन को कमजोर कर दिया है।

यह अध्ययन ओ पी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। शोध में 2001 से 2021 के बीच भूमि उपयोग और भू आवरण (लैंड यूज-लैंड कवर) में हुए बदलावों का विश्लेषण किया गया है।

कमजोर हो रही अरावली

अध्ययन के अनुसार, तेज ढलान वाले इलाके, कमजोर मिट्टी और खनन वाले क्षेत्र मिट्टी के कटाव के सबसे बड़े “हॉटस्पॉट” बनकर उभरे हैं। इन जगहों पर मिट्टी तेजी से बह रही है, जिससे भूमि की गुणवत्ता और पारिस्थितिकी दोनों पर गहरा असर पड़ रहा है।

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चौंकाने वाली बात यह है कि इस दौरान अरावली में वन क्षेत्र बढ़ा है, लेकिन इसके बावजूद मिट्टी का कटाव कम नहीं हुआ। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर पेड़ लगाने या संरक्षण के प्रयास बड़े पैमाने पर हो रहे भूमि परिवर्तन की भरपाई नहीं कर पा रहे हैं।

पेड़ बढ़े, फिर भी क्यों नहीं रुका क्षरण

वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका कारण यह है कि बड़े पैमाने पर जमीन का उपयोग बदल रहा है, मतलब कि जहां पहले खेत, चरागाह और प्राकृतिक वनस्पति थी, वहां अब सड़कें, कॉलोनियां और खनन गतिविधियां बढ़ रही हैं।

शोध बताते हैं कि जब जमीन पर कंक्रीट और पक्के ढांचे बढ़ते हैं तो मिट्टी की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली टूट जाती है। इससे बारिश का पानी सीधे बहकर मिट्टी को साथ ले जाता है और कटाव तेज हो जाता है।

दो दशकों के विश्लेषण से पता चला है कि अरावली पर्वतमाला के भू-दृश्य में बड़े बदलाव आए हैं। दिलचस्प बात यह है कि जब मध्यम और उच्च रिजॉल्यूशन वाले उपग्रह आंकड़ों की तुलना की गई, तो कुछ नतीजे एक-दूसरे से अलग भी दिखे।

मोडिस (500 मीटर) उपग्रह से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किए गए अध्ययन से पता चला कि पिछले 20 वर्षों में बड़े स्तर पर भूमि उपयोग में महत्वपूर्ण बदलाव हुए हैं। इस दौरान वन क्षेत्र 30.62 वर्ग किलोमीटर बढ़कर 264.62 वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया। वहीं दूसरी ओर झाड़ीदार क्षेत्र में करीब 2,911 वर्ग किलोमीटर की बड़ी कमी दर्ज की गई।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह कमी या तो वर्गीकरण की तकनीकी समस्या हो सकती है या फिर यह संकेत हो सकता है कि खुले प्राकृतिक इलाकों का स्वरूप बदल रहा है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि खेती योग्य जमीन करीब 2,508 वर्ग किलोमीटर बढ़ी, जबकि शहरी क्षेत्र भी लगातार फैलते गए।

इसके साथ ही बंजर जमीन में कमी देखी गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि कुछ इलाकों में जमीन का पुनर्विकास हुआ है या उसका उपयोग बदल गया है।

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निर्माण और खनन से बढ़ा मिट्टी का कटाव

इस अध्ययन के नतीजे अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'जियोग्राफीज' में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, यदि अरावली में तेजी से पसरते निर्माण और खनन पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह क्षेत्र आने वाले समय में मिट्टी, जल स्रोतों और जैव विविधता के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकता है।

हमें समझना होगा कि अरावली महज पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है। यह उत्तर भारत के पर्यावरण के लिए प्राकृतिक ढाल का काम करती है। यह थार के रेगिस्तान की रेत को आगे बढ़ने से रोकती है, भूजल को रिचार्ज करती है और कई दुर्लभ वन्यजीवों का सुरक्षित आवास प्रदान करती है। लेकिन बढ़ती खनन गतिविधियां, शहरी फैलाव और बेतरतीब निर्माण इस नाजुक पारिस्थितिकी को धीरे-धीरे कमजोर कर रहे हैं।

हरियाणा के चरखी दादरी जिले के रामलवास गांव में लाइसेंस वाले माइनिंग एरिया में बंजर पहाड़ियां बाईं ओर और चरखी दादरी जिले के रामलवास गांव में लाइसेंस वाले माइनिंग ऑपरेशन से ग्राउंड वॉटर लेवल गिर गया है। फोटो: नीलम अहलूवालिया, गजाला शहाबुद्दीन
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विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जमीन का यह बदलाव इसी रफ्तार से जारी रहा तो अरावली की पारिस्थितिकी और उससे जुड़े जल, मिट्टी और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सिर्फ पेड़ लगाने से समस्या हल नहीं होगी। जब तक बड़े पैमाने पर जमीन के उपयोग में हो रहे बदलाव, जैसे निर्माण, खनन और शहरी फैलाव पर नियंत्रण नहीं होगा, तब तक संरक्षण के छोटे-छोटे प्रयास इस विशाल पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे।

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