

पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में खेजड़ी बचाओ आंदोलन जंगल की आग की तरह क्यों फैला और करीब एक दर्जन जिलों में प्रदर्शन क्यों हुए, इसे समझने के लिए यहां की पारिस्थितिकी में खेजड़ी के महत्व को समझना जरूरी है।
खेजड़ी थार क्षेत्र की विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने वाले ऐसी वनस्पति में शामिल है जिसका सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व है। खेजड़ी आंदोलन से जुड़े बिश्नोई समाज के लोग 11 सितंबर 1730 को अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में खेजड़ी बचाने के लिए दी गई कुर्बानी को याद करते हैं। जोधपुर के खेजड़ली गांव में पेड़ों की रक्षा के लिए अमृता देवी समेत 363 लोगों ने जान दे दी थी। अमृता देवी ने अपनी जान देने से पहले कहा था- “सर साटे रूंख रहे तो भी सस्ती जान।” अर्थात अगर जान देकर भी पेड़ की रक्षा करनी पड़े तो यह कीमत कम है। जानवरों और पेड़ों को बचाने के लिए बिश्नोई समाज की कुर्बानी का लंबा इतिहास रहा है।
रामगोपाल बिश्नोई के अनुसार, हमारे पूर्वज अकाल के वक्त खेजड़ी की छाल की रोटी खाकर जिंदा बचे थे। यह पेड़ पश्चिमी राजस्थान की जीवनेरखा है। इसकी जड़ें जमीन से 300 फीट तक जाकर पानी सोखती हैं और पेड़ को बचाए रखती हैं। इस पेड़ का हर हिस्सा उपयोगी है। यह पेड़ करीब 10 महीने तक पशुओं को अतिपौष्टिक चारा देता है और इसकी पौष्टिक फलियां (सांगरी) खाकर लोग अपनी पोषण सुरक्षा करते आए हैं। इसके चारे का भाव 2,000 रुपए प्रति क्विंटल और सूखी सांगरी 1,500-2,000 रुपए प्रति किलो के भाव पर बिकती हैं। ग्रामीणों का अनुमान है कि खेजड़ी का एक पेड़ साल में कम से कम 50-60 हजार रुपए का चारा और सब्जी उपलब्ध कराता है। मई जून में मिलने वाला इसका गोंद भी खाया जाता है।
मधुमक्खियां न सिर्फ इसके फूलों का रस पीती हैं बल्कि पेड़ों पर अपने छत्ते भी बनाती हैं। खेजड़ी के पेड़ पर कई तरह की चींटियां और कीड़े-मकौड़े देखे जा सकते हैं। गर्मियों में खेजड़ी के पेड़ों पर सिकाडा गाते हैं, जबकि बुनकर पक्षी उन पर अपना घोंसला बनाना पसंद करते हैं।
बीकानेर विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञानी व प्रोफेसर सरस्वती बिश्नोई के अनुसार, इस पेड़ की छाल का अर्क बिच्छू और सांप के काटने के लक्षणों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है। इसके इलाज में स्किन की बीमारियों को कम करने से लेकर मिसकैरेज रोकने और आसान डिलीवरी तक शामिल हैं।
वह लिखती हैं कि जन्माष्टमी पर घरों में खेजड़ी की हरी टहनियों की पूजा की जाती है। यह राजस्थान के कुछ जिलों में कृष्ण का प्रतीक है। बिश्नोई समुदाय इस पेड़ का सम्मान करता है और इसकी पूजा करता है। शुष्क मौसम के कारण रेगिस्तान में जंगल कम है। खेजड़ी ज्यादातर फॉरेस्ट कवर प्रदान करता है, खासकर पारंपरिक ओरण और गोचर में लेकिन ये क्षेत्र कानूनी रूप से संरक्षित नहीं हैं। हिंदू महाकाव्यों रामायण और महाभारत में इस पेड़ के उपयोग और महत्व का उल्लेख है। राम ने रावण को मारने से पहले खेजड़ी के पेड़ की पूजा की थी। इस पेड़ की पूजा को 'संपूजा' कहा जाता है। पांडवों ने भी इस पेड़ की पूजा की और अपने अज्ञातवास के दौरान इसमें अपने हथियार छिपाए थे।
नौखा दैया गांव के कान्हा राम गोदारा इसके सांस्कृतिक महत्व पर रोशनी डालते हुए कहते हैं कि जन्म से मरण तक खेजड़ी से संबंध बना रहता है। बच्चे के जन्म लेने पर होने वाली पूजा से लेकर अंतिम संस्कार तक में खेजड़ी की लकड़ी प्रयोग होती है। उनका कहना है कि बच्चे का जन्म या शादी के अवसर पर ढाेल बचाने वाले खेजड़ी की टहनी लाकर बधाई देते हैं और बदले में ईनाम पाते हैं। इन पेड़ों को लोग अपनी पूंजी मानते हैं। यही कारण है कि सोलर प्लांट के लिए इनकी कटाई को लोग विकास के नाम विनाश कह रहे हैं।