दूषित जल, गंदे शौचालय, अधूरे इंतजाम: कैग रिपोर्ट में बदहाली का शिकार मिले 90 फीसदी रेलवे स्टेशन

कैग की जांच रिपोर्ट में देश के 90 फीसदी रेलवे स्टेशन बदहाली का शिकार पाए गए, जबकि यात्री सुविधाओं के लिए आबंटित 36 से 44 फीसदी बजट खर्च ही नहीं हुआ।
सोचिए, जिस देश में एक साल में रेलवे 290 करोड़ से ज्यादा लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है (जो देश की आबादी का दोगुना से भी अधिक है), वहां यात्रियों के लिए साफ पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना किसी विडम्बना से कम नहीं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
सोचिए, जिस देश में एक साल में रेलवे 290 करोड़ से ज्यादा लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है (जो देश की आबादी का दोगुना से भी अधिक है), वहां यात्रियों के लिए साफ पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना किसी विडम्बना से कम नहीं। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • कैग की ताजा ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, जांचे गए 512 में से 458 रेलवे स्टेशनों पर पीने के पानी, शौचालय, बैठने की जगह, शेड, पंखे और संकेतक जैसी जरूरी सुविधाओं में कमी मिली। यानी करीब 90 फीसदी स्टेशन यात्रियों की बुनियादी जरूरतों के मानकों पर खरे नहीं उतरे।

  • सबसे गंभीर सवाल पेयजल को लेकर है। कई स्टेशनों पर पानी में क्लोरीन की मात्रा निर्धारित सीमा से बाहर मिली, जबकि कुछ स्टेशनों के नल के पानी के नमूनों में टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया, जिसमें ई-कोलाई भी शामिल है, पाया गया। शौचालयों और सफाई व्यवस्था की हालत भी संतोषजनक नहीं मिली।

  • विडंबना यह है कि समस्या पैसों की कमी की भी नहीं थी। 2019-20 से 2023-24 के बीच यात्री सुविधाओं के लिए आवंटित बजट का 36 से 44 फीसदी हिस्सा खर्च ही नहीं हुआ।

  • रिपोर्ट बताती है कि अब जरूरत सिर्फ नई और तेज ट्रेनों की नहीं, बल्कि उस यात्री की चिंता करने की है जो स्टेशन पर प्यासा, थका और सुविधाओं के इंतजार में खड़ा है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने रेलवे की बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं।

पटरी पर 'हाई-टेक' ट्रेनें, प्लेटफॉर्म पर बेबस यात्री

कैग द्वारा जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक, देश के करीब 90 फीसदी रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों के लिए तय की गई न्यूनतम बुनियादी सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं।

सीएजी ने जब 512 स्टेशनों की जांच की, तो सामने आया कि 458 स्टेशनों पर पीने का पानी, बैठने की व्यवस्था, शौचालय, शेड, पंखे और महत्वपूर्ण चीजों को दर्शाने वाले संकेत जैसी बुनियादी चीजें या तो पूरी नदारद थीं या इस कदर जर्जर हालत में थीं कि उनका इस्तेमाल नहीं हो सकता।

दूसरी तरफ महज 54 स्टेशन ही ऐसे मिले जो मानकों पर पूरी तरह खरे थे।

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सोचिए, जिस देश में एक साल में रेलवे 290 करोड़ से ज्यादा लोगों को उनकी मंजिल तक पहुंचाती है (जो देश की आबादी का दोगुना से भी अधिक है), वहां यात्रियों के लिए साफ पानी, शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना किसी विडम्बना से कम नहीं। सीधे शब्दों में कहें तो रेलवे स्टेशनों की ये खामियां करोड़ों यात्रियों के रोजमर्रा के सफर से जुड़ी हैं।

करोड़ों सफर, अनगिनत उम्मीदें और बदहाली का सच

बता दें कि इस ऑडिट में देश के 5,908 गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों को शामिल किया गया। इन स्टेशनों से हर दिन 7,424 यात्री ट्रेनें चलती हैं। रिपोर्ट में कैग ने 2019-20 से 2023-24 की अवधि का आकलन किया है।

यह स्थिति तब है जब रेलवे बोर्ड ने यात्री सुविधाओं के लिए बाकायदा मानक तय कर रखे हैं। इसके बावजूद कैग ने पाया कि सुविधाओं की कमी किसी एक-दो स्टेशन की समस्या नहीं, बल्कि पूरे रेलवे तंत्र में फैली व्यवस्था संबंधी खामी है।

फरवरी 2025 के पैसेंजर एमेनिटीज मैनेजमेंट सिस्टम्स (पीएएमस) के आंकड़ों के विश्लेषण से भी यही तस्वीर सामने आई है। सभी श्रेणियों और रेलवे जोन में कमियां बनी हुई थीं। इतना ही नहीं, जरूरी और बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना तक तैयार नहीं की गई, जबकि रेलवे बोर्ड के निर्देश मौजूद थे।

सवालों के घेरे में शौचालय और सफाई व्यवस्था

रिपोर्ट में स्टेशनों की स्वच्छता व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक मिली। कई जगह शौचालय काम नहीं कर रहे थे, पे-एंड-यूज सुविधाएं पर्याप्त नहीं थीं और अवैध प्रवेश मार्ग अब भी बने हुए थे। इससे केवल सफाई ही नहीं, यात्रियों की सुरक्षा भी प्रभावित होती है। मतलब स्टेशनों पर बने शौचालय या तो बंद पड़े हैं या उनका रख-रखाव इतना खराब है कि उनका इस्तेमाल करना किसी सजा से कम नहीं।

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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने (एनजीटी) ने रेलवे को हर स्टेशन के लिए ऐसी वेबसाइट बनाने का निर्देश दिया था, जहां यात्री सुविधाओं, सफाई व्यवस्था और सुधार की कार्ययोजनाओं की जानकारी उपलब्ध हो। लेकिन कैग के मुताबिक, मार्च 2024 तक किसी भी रेलवे जोन ने ऐसी वेबसाइट शुरू नहीं की थी।

प्यास बुझाएं या बीमारी मोल लें? नलों में मिला 'ई-कोलाई' बैक्टीरिया

रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाले पेयजल और उसकी गुणवत्ता है। कैग ने पाया कि पानी की नियमित जांच निर्धारित अंतराल पर नहीं हो रही। रेसिडुयल क्लोरीन, बैक्टीरियोलॉजिकल और रासायनिक जांच में भी कमी रही।

2022-23 में 16 जोन के 135 स्टेशनों और 2023-24 में 15 जोन के 139 स्टेशनों पर पानी में क्लोरीन की मात्रा निर्धारित 0.2 से 0.5 पीपीएम की सीमा में नहीं मिली। रेलवे हेल्थ इंस्पेक्टरों द्वारा की जांच में इसका स्तर कहीं ज्यादा तो कहीं कम पाया गया। इसी तरह 11 जोन के 63 स्टेशनों पर किए गए कुल परीक्षणों में आधे से अधिक में रेसिडुयल क्लोरीन निर्धारित सीमा (0.2 से 0.5 पीपीएम) से बाहर थी।

मतलब कि पानी में बैक्टीरिया मारने के लिए क्लोरीन की जो मात्रा होनी चाहिए, वह देश के सैकड़ों स्टेशनों पर पूरी तरह असंतुलित पाई गई।

इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह रही कि 2022-23 में आठ जोन के 49 स्टेशनों और 2023-24 में नौ जोन के 56 स्टेशनों से लिए गए नल जल के नमूनों में टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया, जिसमें ई-कोलाई भी शामिल है, की मौजूदगी पाई गई। यानी जिस पानी पर लंबी यात्रा के दौरान यात्री भरोसा करते हैं, वही पानी कुछ स्टेशनों पर उसकी सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।

पैसा भी था, बजट भी था... फिर क्यों तरसते रहे मुसाफिर?

अक्सर किसी योजना के विफल होने पर फंड की कमी का बहाना बना दिया जाता है, लेकिन कैग रिपोर्ट ने इस बहाने को भी खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में एक सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि देश में रेलवे सुविधाओं के लिए बजट उपलब्ध होने के बावजूद उसका पूरा इस्तेमाल तक नहीं किया गया।

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रुझान दर्शाते हैं कि 2019-20 से 2023-24 के बीच यात्री सुविधाओं के लिए आवंटित बजट का 36 से 44 फीसदी हिस्सा खर्च ही नहीं किया गया। यह स्थिति कोरोना काल के अलावा सामान्य वर्षों में भी बनी रही।

साफ शब्दों में कहें तो पैसा उपलब्ध था, लेकिन योजना और संवेदनशीलता की कमी के कारण वह यात्रियों तक नहीं पहुंच पाया।

एक सवाल जो हर यात्री का है...

रेलवे देश की जीवनरेखा है। हर दिन लाखों लोग उम्मीद, काम, पढ़ाई, इलाज और अपनों से मिलने के लिए ट्रेन पकड़ते हैं। ऐसे में स्टेशन पर साफ पानी, बैठने की जगह, काम करता शौचालय और सुरक्षित प्लेटफॉर्म जैसी सुविधाएं महज सरकारी मानक नहीं, बल्कि यात्रियों के सम्मान और सुरक्षा से जुड़ी बुनियादी जरूरतें हैं।

ऐसे में जब नए-नए दावों और हाई-स्पीड ट्रेनों का प्रचार होता है, तब कैग की यह रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि तरक्की सिर्फ चमचमाती ट्रेनों से नहीं नापी जाती। तरक्की तब मानी जाएगी जब कड़कड़ाती धूप में किसी बुजुर्ग यात्री को स्टेशन पर बैठने की सीट मिल जाए, जब किसी प्यासे बच्चे को नल से साफ सुरक्षित पानी नसीब हो और जब रेलवे का बजट कागजों में सिमटने के बजाय आम आदमी के जीवन में सहूलियत बनकर उतरे।

अब रेलवे को केवल ट्रेनों की रफ्तार नहीं, यात्रियों के अनुभव और उनकी बुनियादी जरूरतों की तरफ भी उतनी ही गंभीरता से देखना होगा।

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