

386 विश्व धरोहर स्थल समुद्र के करीब, जलवायु परिवर्तन, तटीय कटाव और बाढ़ से इनकी सुरक्षा पर बढ़ी चिंता।
वैज्ञानिकों ने पहली बार समुद्र किनारे स्थित विश्व धरोहर स्थलों का विस्तृत वैश्विक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया है।
डेटाबेस में 289 सांस्कृतिक, 91 प्राकृतिक और छह मिश्रित धरोहर स्थल शामिल हैं, जो जलवायु संकट से प्रभावित हैं।
शोधकर्ताओं ने 1,250 डिजिटल नक्शे हाथ से तैयार किए, क्योंकि कई धरोहर स्थलों की सीमाओं के सटीक नक्शे उपलब्ध नहीं थे।
विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक डेटाबेस उपयोगी है, लेकिन स्थानीय मौसम, बाढ़, कटाव और जलवायु आंकड़ों से जोखिम समझना जरूरी है।
दुनिया के कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक और प्राकृतिक स्थल समुद्र के बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तटीय कटाव, बाढ़ और बदलता मौसम इन स्थलों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। इसी खतरे को समझने के लिए वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की एक टीम ने समुद्र के किनारे मौजूद यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों का पहला विस्तृत वैश्विक डिजिटल डेटाबेस तैयार किया है। इस अध्ययन का नेतृत्व ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के जलवायु अनुकूलन विशेषज्ञ ने किया है।
386 विश्व धरोहर स्थलों का अध्ययन
शोधकर्ताओं ने साल 2023 तक मौजूद 1,199 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की सूची का अध्ययन किया। इनमें से उन स्थानों को चुना गया जो समुद्र के पास हैं और समुद्र तल से 20 मीटर से कम ऊंचाई पर स्थित हैं।
इस प्रक्रिया में कुल 386 विश्व धरोहर स्थल सामने आए। इनमें 289 सांस्कृतिक, 91 प्राकृतिक और छह मिश्रित स्थल हैं। इन सभी स्थलों का कुल क्षेत्रफल 23.5 करोड़ हेक्टेयर से अधिक है।
इस सूची में दुनिया के कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक और ऐतिहासिक स्थान शामिल हैं। इनमें सेनेगल का जूड्ज नेशनल बर्ड सैंक्चुअरी, मॉरिटानिया का बैंक डी'आर्गिन नेशनल पार्क, ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ और ग्रीनलैंड के कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र शामिल हैं।
हाथ से बनाए गए 1,250 नक्शे
जर्नल साइंटिफिक डेटा में प्रकाशित इस अध्ययन की सबसे खास बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इन स्थलों की सीमाओं को डिजिटल रूप में तैयार किया। इसके लिए करीब 14 लोगों की टीम ने काम किया। कई स्थानों के सही डिजिटल नक्शे पहले से उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में शोधकर्ताओं ने पुराने नक्शों, सरकारी आंकड़ों और अन्य उपलब्ध जानकारी का सहारा लिया।
कई जगहों पर सीमाएं खुद हाथ से खींची गईं। कुल 386 धरोहर स्थलों के लिए 1,250 अलग-अलग डिजिटल आकृतियां यानी पॉलीगॉन तैयार किए गए। रूस के सेंट पीटर्सबर्ग जैसे कुछ स्थानों में यह काम विशेष रूप से कठिन था, क्योंकि वहां कई छोटे-छोटे क्षेत्र, द्वीप, किले, नहरें और दूसरे हिस्से शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने साफ किया कि इस काम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई या मशीन लर्निंग का इस्तेमाल नहीं किया गया।
जलवायु परिवर्तन के साथ दूसरे खतरे भी
शोधकर्ताओं के अनुसार, इन धरोहर स्थलों पर केवल समुद्र का बढ़ता स्तर ही खतरा नहीं है। तटीय कटाव, बाढ़, तेज हवाएं, गर्म होता समुद्र और इंसानी गतिविधियां भी इन क्षेत्रों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
प्राकृतिक और सांस्कृतिक महत्व वाले स्थानों पर खतरे और भी जटिल हो सकते हैं। उदाहरण के लिए समुद्र का तापमान बढ़ने से समुद्री जीवों पर असर पड़ सकता है, जबकि उसी क्षेत्र में अवैध मछली पकड़ना समस्या को और बढ़ा सकता है।
बांग्लादेश के सुंदरबन का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। यह दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है और प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां पर्यावरणीय बदलावों के साथ आसपास होने वाला औद्योगिक विकास भी चिंता का कारण है।
स्थानीय जानकारी की भी जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि यह नया डेटाबेस बहुत उपयोगी है, लेकिन इसे अंतिम जोखिम आकलन नहीं माना जा सकता। किसी जगह पर जलवायु परिवर्तन का वास्तविक असर जानने के लिए स्थानीय स्तर के मौसम, समुद्र, बाढ़ और तटीय कटाव से जुड़े आंकड़ों की जरूरत होगी।
सेंट एंड्रयूज विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ के अनुसार, यह डेटाबेस स्थानीय प्रशासन के लिए खतरों का शुरुआती आकलन करने में मदद कर सकता है। लेकिन स्थानीय परिस्थितियों और लोगों के अनुभव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विरासत बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह डेटाबेस दुनिया भर के प्रशासन और विशेषज्ञों को यह समझने में मदद करेगा कि कौन से विश्व धरोहर स्थल सबसे ज्यादा खतरे में हैं। इसके आधार पर भविष्य में सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन की योजनाएं बनाई जा सकती हैं।
समुद्र और जलवायु का बदलता स्वरूप केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी सभ्यताओं, ऐतिहासिक इमारतों और अनोखे प्राकृतिक क्षेत्रों के लिए भी चुनौती है। ऐसे में इन स्थलों की पहचान, निगरानी और समय रहते सुरक्षा करना आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी हो गया है।