मानसून में मूसलाधार बारिश, फिर भी बिजली कम क्यों गिरती है? वैज्ञानिकों ने खोला बड़ा राज

मानसून में तेज बारिश के बावजूद बिजली कम क्यों गिरती है? भारतीय वैज्ञानिकों ने बादलों और हवाओं के अध्ययन से इस रहस्य का पता लगाया।
भारतीय वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि मानसून में भारी बारिश के बावजूद बिजली कम गिरने के पीछे क्या कारण हैं।
भारतीय वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि मानसून में भारी बारिश के बावजूद बिजली कम गिरने के पीछे क्या कारण हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारतीय वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि मानसून में भारी बारिश के बावजूद बिजली कम गिरने के पीछे क्या कारण हैं।

  • अध्ययन में पाया गया कि मानसूनी हवाएं और कम दबाव की द्रोणिका बादलों में बिजली बनने को प्रभावित करती हैं।

  • वैज्ञानिकों ने 100 से अधिक सेंसरों और आधुनिक मौसम रडार की मदद से तूफानी बादलों की गतिविधियों का अध्ययन किया।

  • रडार के खास संकेतों से बिजली पैदा करने वाले बादलों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।

  • नई खोज से मौसम पूर्वानुमान बेहतर होगा और लोगों, किसानों तथा विमान सेवाओं को समय पर चेतावनी मिल सकेगी।

बारिश के मौसम में आसमान काले बादलों से घिर जाता है। देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो जाती है, लेकिन कई बार बादलों की इतनी हलचल के बावजूद बिजली बहुत कम चमकती है। इसके उलट, मानसून आने से पहले गर्मी के दिनों में उठने वाले तूफानों में बिजली ज्यादा कड़कती है।

आखिर ऐसा क्यों होता है? भारतीय वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन ने इस सवाल का अहम जवाब दिया है। शोध के मुताबिक, मानसून के दौरान बिजली गिरने का संबंध केवल बादलों की ऊंचाई या उनकी ताकत से नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर चलने वाली हवाओं और मानसूनी मौसम की गतिविधियों से भी है।

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तीन संस्थानों के वैज्ञानिकों ने की पड़ताल

यह अध्ययन भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), दिल्ली के शोधकर्ताओं ने किया। वैज्ञानिकों ने मध्य भारत के मानसूनी क्षेत्र पर विशेष ध्यान दिया। इसमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और ओडिशा के कुछ हिस्से शामिल हैं। यह अध्ययन एटमोस्फियरिक रिसर्च नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

शोध के दौरान देशभर में लगे 100 से अधिक सेंसरों वाले बिजली का पता लगाने वाले नेटवर्क की मदद ली गई। इसके साथ ही वायुमंडल में बारिश और बादलों की गतिविधियों को समझने के लिए आधुनिक डॉप्लर मौसम रडार का इस्तेमाल किया गया। यूरोपीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र के आंकड़ों से यह भी पता लगाया गया कि मानसून की कम दबाव वाली द्रोणिका (ट्रफ) किस दिशा में बढ़ रही है।

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बादलों के भीतर झांककर समझा बिजली का रहस्य

वैज्ञानिकों ने हर छह मिनट पर रडार से मिलने वाले आंकड़ों का विश्लेषण किया। इससे उन्हें अलग-अलग तूफानी बादलों की गतिविधियों को समझने और यह पहचानने में मदद मिली कि कौन-से बादल बिजली पैदा कर रहे हैं और कौन-से नहीं।

इस अध्ययन में रडार से मिलने वाले कई संकेतों को परखा गया। इनमें बादलों से लौटने वाली रेडियो तरंगों की तीव्रता, पानी की बूंदों का आकार और बर्फ के कणों की बनावट जैसे संकेत शामिल थे। इनकी मदद से वैज्ञानिकों ने बादलों के भीतर मौजूद पानी और बर्फ की स्थिति को समझने की कोशिश की।

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दरअसल, बादलों के अंदर बिजली बनने की प्रक्रिया काफी दिलचस्प है। जब तेज हवाएं पानी की बेहद छोटी बूंदों को ऊपर उठाती हैं, तो वे शून्य से नीचे के तापमान पर भी तरल बनी रह सकती हैं। बादल के इस ठंडे हिस्से में बर्फ के छोटे कण और ओले जैसे नरम बर्फीले दाने आपस में टकराते हैं। इन टक्करों से विद्युत आवेश अलग-अलग होने लगते हैं। जब बादल के भीतर धनात्मक और ऋणात्मक आवेशों का अंतर काफी बढ़ जाता है, तो बिजली चमक सकती है।

रडार ने बताए बिजली गिरने के संकेत

अध्ययन में सामने आया कि मानसून के दौरान बिजली पैदा करने वाले बादलों में एक खास स्तर से ऊपर रडार संकेत दिखाई देते हैं। शून्य से 10 डिग्री सेल्सियस नीचे के तापमान वाले स्तर के ऊपर इन बादलों की रडार परावर्तन क्षमता आम तौर पर 34 से 38 डेसिबल के बीच या उससे अधिक पाई गई।

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यह संकेत वैज्ञानिकों के लिए खास मायने रखते हैं। इनसे पता लगाया जा सकता है कि बादल के ऊपरी ठंडे हिस्से में पानी और बर्फ के कण किस तरह मौजूद हैं। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी तूफानी बादल में बिजली बनने की कितनी संभावना है।

मानसूनी हवाओं का भी है बड़ा खेल

शोध का एक अहम निष्कर्ष यह है कि मानसून के दौरान बिजली गिरने का व्यवहार गर्मी से पहले आने वाले तूफानों से अलग होता है। मानसून की कम दबाव वाली ट्रफ और उससे जुड़ी बड़े क्षेत्र की हवाएं बादलों की बनावट और उनकी गतिविधियों को प्रभावित करती हैं।

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यानी केवल यह देखना काफी नहीं है कि बादल कितना ऊंचा उठ रहा है या उसमें कितनी तेज हलचल है। यह समझना भी जरूरी है कि पूरे क्षेत्र में हवाएं किस तरह चल रही हैं और मानसूनी सिस्टम किस स्थिति में है।

बेहतर चेतावनी देने में मिलेगी मदद

वैज्ञानिकों का मानना है कि रडार के इन संकेतों को बिजली का पता लगाने वाले सेंसरों के आंकड़ों के साथ जोड़कर मौसम की ज्यादा सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। इससे कुछ ही समय पहले यह अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है कि बिजली गिरने का खतरा कहां बढ़ रहा है।

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इसका फायदा आम लोगों के साथ किसानों, विमान सेवाओं और बिजली तथा परिवहन जैसी जरूरी सुविधाओं को भी मिल सकता है। हालांकि इन संकेतों को वास्तविक समय की चेतावनी प्रणाली में शामिल करने के लिए आगे परीक्षण और मॉडल में सुधार जरूरी होंगे।

कुल मिलाकर, यह अध्ययन बताता है कि मानसून का आकाश केवल बारिश की कहानी नहीं कहता। बादलों के भीतर पानी, बर्फ और विद्युत आवेशों का जटिल खेल चलता है, जबकि दूर तक फैली हवाएं भी इस खेल की दिशा तय करती हैं। वैज्ञानिक अब इसी छिपे हुए खेल को समझकर बिजली गिरने की चेतावनी को पहले से अधिक सटीक बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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