

जून 2026 ने दुनिया को जलवायु परिवर्तन की गंभीरता का एक और स्पष्ट संकेत दिया। यह वैश्विक स्तर पर इतिहास का दूसरा सबसे गर्म जून रहा, जबकि पश्चिमी यूरोप ने अपने इतिहास के सबसे गर्म जून का सामना किया।
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार, वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक-काल से पहले की तुलना 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा और समुद्र की सतह का तापमान भी जून के लिए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।
इस बढ़ती गर्मी ने यूरोप में भीषण लू, सूखे, जंगलों में आग, नदियों के घटते जलस्तर और गर्मी से जुड़ी मौतों जैसी गंभीर परिस्थितियां पैदा कीं। दूसरी ओर, उत्तरी अमेरिका, पूर्वी एशिया, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कई हिस्सों में भारी बारिश और बाढ़ देखने को मिली, जबकि कई अन्य क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई।
आर्कटिक और अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का सिकुड़ना भी लगातार जारी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ये घटनाएं अलग-अलग मौसमीय संयोग नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जलवायु का संकेत हैं। बढ़ती गर्मी अब स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों, अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुकी है।
जिस पृथ्वी को हम जानते हैं, वो अब पहले जैसी नहीं रही। धरती और समुद्र लगातार गर्म हो रहे हैं और इसका असर अब दुनिया के हर कोने में स्पष्ट दिखाई देने लगा है। ऐसा ही कुछ पिछले महीने जून 2026 में भी देखा गया, जब दुनिया ने जलवायु इतिहास के दूसरे सबसे गर्म जून का सामना किया।
वहीं पश्चिमी यूरोप में स्थिति कहीं ज्यादा खराब रही, जिसे अपने इतिहास के सबसे गर्म जून का सामना करना पड़ा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह महज एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि तेजी से बदलती जलवायु का स्पष्ट संकेत है।
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में पुष्टि की है कि जून 2026 में वैश्विक औसत तापमान 16.54 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, जो औद्योगिक काल से पहले के की तुलना में 1.39 डिग्री सेल्सियस अधिक है। गौरतलब है कि जून 2024 के बाद यह दूसरा मौका है जब धरती ने इतने ज्यादा तापमान का सामना किया है।
चिंता की बात यह है कि सिर्फ धरती ही नहीं, बल्कि समुद्र भी तेजी से उबल रहे है। हालात यह रहे कि जून में समुद्र का वैश्विक औसत तापमान अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। रुझानों से पता चला है कि जून के दौरान अतिरिक्त-ध्रुवीय महासागरों में समुद्री सतह का औसत तापमान 20.86 डिग्री सेल्सियस रहा, जो जून के महीने में अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है।
देखा जाए तो समुद्रों का इस तरह उबलना पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बिगाड़ रहा है और ध्रुवों पर जमी बर्फ को तेजी से पिघला रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत हो रही अल नीनो की स्थिति भी इस असामान्य गर्मी को बढ़ा रही है।
यूरोप बना गर्मी का सबसे बड़ा 'हॉटस्पॉट'
इस वैश्विक गर्मी का सबसे गंभीर असर पश्चिमी यूरोप में देखने को मिला। यहां जून 2026 अब तक का सबसे गर्म जून रहा, जहां औसत तापमान सामान्य से 3.06 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया। जून के दूसरे पखवाड़े में भीषण लू ने फ्रांस, स्पेन, इटली, पुर्तगाल और कई अन्य देशों को अपनी चपेट में ले लिया। नतीजन कई स्थानों पर जून महीने के ही नहीं, बल्कि अब तक के सर्वाधिक तापमान के रिकॉर्ड भी टूट गए।
चिंता की बात यह है कि यह गर्मी अचानक नहीं आई। मई में भी यूरोप भीषण लू से जूझ चुका था और जुलाई की शुरुआत में लू की एक और घटना ने दस्तक दे दी। लगातार चल रही लू अब नई सामान्य स्थिति बनती दिख रही है।
सिर्फ तापमान नहीं, इंसानी जिंदगी भी प्रभावित
भीषण गर्मी के साथ लंबे समय तक बारिश न होने से यूरोप के कई हिस्सों में सूखे का खतरा भी बढ़ गया है। स्पेन और पुर्तगाल समेत आइबेरियन प्रायद्वीप तथा दक्षिणी फ्रांस में जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ीं हैं। कई नदियों का जलस्तर सामान्य से काफी नीचे चला गया, जिससे कृषि, पेयजल और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ा।
सबसे चिंताजनक बात यह रही कि इस भीषण गर्मी के कारण हीट स्ट्रोक और गर्मी से जुड़ी मौतों की खबरें भी सामने आईं। अस्पतालों पर दबाव बढ़ा और बुजुर्गों, बच्चों तथा कमजोर तबकों के लिए हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो गए हैं।
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस में जलवायु मामलों की रणनीतिक प्रमुख सामंथा बर्गेस का इस बारे में कहना है, "जून 2026 दिखाता है कि हमारी जलवायु कितनी तेजी से बदल रही है। पश्चिमी यूरोप ने अपना सबसे गर्म जून दर्ज किया है और वैश्विक महासागर लगातार रिकॉर्ड गर्म बने हुए हैं।“
“इसका मतलब है कि पृथ्वी लगातार पहले से कहीं ज्यादा गर्मी सोख रही है, जिससे लू, सूखा और चरम मौसमी घटनाएं भविष्य में और अधिक गंभीर रूप ले सकती हैं।"
दुनिया में जारी रहा चरम मौसमी घटनाओं का कहर
यूरोप के अलावा दुनिया के कई अन्य हिस्सों में भी मौसम के अलग-अलग रूप सामने आए हैं। उत्तरी अमेरिका, पूर्वी एशिया, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ आई, जबकि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अमेरिका, मध्य एशिया, मध्य पूर्व और रूस के कई इलाकों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई।
ध्रुवीय क्षेत्रों में भी स्थिति खराब रही। रिपोर्ट से पता चला है कि ध्रुवों पर जमा बर्फ लगातार घट रही है। जून 2026 में आर्कटिक की समुद्री बर्फ सामान्य से करीब पांच फीसदी और अंटार्कटिका में आठ फीसदी कम रही।
एक चेतावनी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
वैज्ञानिकों का कहना है कि ये आंकड़े महज रिकॉर्ड नहीं हैं, बल्कि आने वाले समय की चेतावनी हैं। बढ़ती गर्मी अब केवल मौसम का विषय नहीं रही। इसका असर इंसानी स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों, अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र पर लगातार गहराता जा रहा है।
जून 2026 ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन भविष्य का नहीं, बल्कि आज का सबसे बड़ा वैश्विक संकट बन चुका है।