बद्रीनाथ पर मंडरा रहा है ग्लेशियर टूटने का खतरा, 398 इमारतें खतरे की जद में

इसमें भारतीय विज्ञान संस्थान, ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के वैज्ञानिकों के अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा किया गया है
बदरीनाथ मंदिर को सीधे हिमस्खलन की चपेट में आने का खतरा नहीं, लेकिन चट्टानों और मलबे से नुकसान की आशंका।
बदरीनाथ मंदिर को सीधे हिमस्खलन की चपेट में आने का खतरा नहीं, लेकिन चट्टानों और मलबे से नुकसान की आशंका।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • बद्रीनाथ में ग्लेशियर टूटने पर 398 इमारतें, 2.66 किलोमीटर सड़कें, दो पुल और हेलीपैड क्षतिग्रस्त होने का खतरा।

  • वैज्ञानिक अध्ययन में तीन लटकते ग्लेशियरों की पहचान, दूसरे ग्लेशियर से सबसे ज्यादा तबाही की आशंका जताई गई।

  • दूसरे ग्लेशियर में 53.2 लाख घन मीटर बर्फ, टूटने पर बहाव की रफ्तार 283 किलोमीटर प्रतिघंटा तक पहुंच सकती है।

  • बदरीनाथ मंदिर को सीधे हिमस्खलन की चपेट में आने का खतरा नहीं, लेकिन चट्टानों और मलबे से नुकसान की आशंका।

  • डीआरडीओ समर्थित शोध में हिमालयी ग्लेशियरों पर निगरानी, खतरे वाले क्षेत्रों की मैपिंग और नए निर्माण पर नियंत्रण की सिफारिश।

उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध तीर्थस्थल बद्रीनाथ पर कुदरत के एक बड़े खतरे का साया मंडरा रहा है। हिमालय की ऊंची चोटियों पर जमे तीन लटकते ग्लेशियरों में से अगर सबसे बड़ा ग्लेशियर टूटकर नीचे आ गिरा, तो बद्रीनाथ में भारी तबाही मच सकती है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, ऐसी स्थिति में करीब 398 इमारतें, 2.66 किलोमीटर सड़क, दो पुल, एक हेलीपैड और पार्किंग क्षेत्र को नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह सबसे खराब स्थिति का मॉडल है। इसका मतलब यह नहीं है कि ग्लेशियर कभी भी टूटने वाला है।

यह अध्ययन 28 अक्टूबर को प्रतिष्ठित शोध पत्रिका 'लैंडस्लाइड्स' में प्रकाशित हुआ है। इसमें भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी), ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के वैज्ञानिक शामिल रहे हैं। अध्ययन का मकसद बद्रीनाथ के आसपास मौजूद लटकते ग्लेशियरों की स्थिति और उनसे पैदा होने वाले खतरे को समझना है।

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4700 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर छिपा खतरा

बद्रीनाथ समुद्र तल से करीब 3415 मीटर की ऊंचाई पर अलकनंदा नदी के किनारे बसा है। इसके ऊपर पहाड़ों पर 4700 से 5465 मीटर की ऊंचाई के बीच तीन लटकते ग्लेशियर मौजूद हैं। ये ग्लेशियर सामान्य ग्लेशियरों से अलग होते हैं। ये पहाड़ों की खड़ी ढलानों या चट्टानों पर टिके रहते हैं और नीचे घाटी तक नहीं पहुंचते।

ऐसे ग्लेशियरों का संतुलन बिगड़ने पर बर्फ का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे गिर सकता है। इसके साथ चट्टानें, मिट्टी और मलबा भी तेजी से नीचे आ सकता है। कई बार ऐसी घटनाएं पानी और मलबे के तेज बहाव का रूप ले लेती हैं, जिससे रास्ते में आने वाली बस्तियों और निर्माणों को भारी नुकसान पहुंच सकता है।

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दूसरे ग्लेशियर से सबसे ज्यादा खतरा

वैज्ञानिकों ने तीनों ग्लेशियरों की बर्फ की मात्रा, मोटाई और ढलान का अध्ययन किया। इसके लिए हाई रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों और ऊंचाई से जुड़े डिजिटल मॉडल का इस्तेमाल किया गया। जिन ग्लेशियरों की औसत ढलान 30 डिग्री या उससे अधिक थी, उन्हें संभावित रूप से अस्थिर मानकर अध्ययन में शामिल किया गया।

तीनों में दूसरे ग्लेशियर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने की क्षमता वाला पाया गया। इसमें करीब 53.2 लाख घन मीटर बर्फ होने का अनुमान है। इसकी औसत ढलान 34.57 डिग्री है। वैज्ञानिकों के कंप्यूटर मॉडल के मुताबिक, अगर यह ग्लेशियर टूटता है तो बर्फ का बहाव 78.5 मीटर प्रति सेकंड यानी करीब 283 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार तक पहुंच सकता है। इसकी ऊंचाई 73.5 मीटर तक हो सकती है।

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मंदिर को सीधा खतरा नहीं, मलबे से हो सकता है नुकसान

अध्ययन में एक राहत की बात भी सामने आई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लेशियर टूटने की स्थिति में बद्रीनाथ धाम के मुख्य मंदिर पर बर्फ का सीधा बहाव पहुंचने की आशंका नहीं है। लेकिन इसके साथ आने वाली चट्टानें और मलबा मंदिर के आसपास जमा होकर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए मंदिर को पूरी तरह सुरक्षित मानकर निश्चिंत होना भी ठीक नहीं होगा।

बढ़ते तापमान से कमजोर हो सकती है बर्फ

वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों की आंतरिक स्थिति बदल रही है। बर्फ के आधार पर पकड़ कमजोर होने से उसके अचानक खिसकने या टूटने का खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि हिमालय के ऊंचे इलाकों में मौजूद लटकते ग्लेशियरों पर लगातार नजर रखना जरूरी है।

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समय रहते संभलने की जरूरत

शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि बद्रीनाथ के आसपास हिमस्खलन क्षेत्र और सुरक्षित दूरी वाले बफर जोन चिह्नित किए जाएं। सबसे खराब स्थिति में बर्फ, चट्टान और मलबा कहां तक पहुंच सकता है, इसका नक्शा तैयार किया जाना चाहिए। संवेदनशील इलाकों में नए निर्माण और बुनियादी ढांचे के विस्तार पर सख्त नियम लागू करने की भी जरूरत बताई गई है।

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि खतरा केवल एक ग्लेशियर तक सीमित नहीं है। बाकी दो ग्लेशियरों को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। इससे पहले अप्रैल में प्रकाशित एक अन्य शोध में हिमालय क्षेत्र के 219 लटकते ग्लेशियरों की पहचान की गई थी। इनमें करीब 30 प्रतिशत अलकनंदा बेसिन में पाए गए थे और उनके बर्फीले हिस्से अस्थिर बताए गए थे।

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अभी खतरे की तारीख तय नहीं

वैज्ञानिकों ने यह भी माना है कि अध्ययन में बर्फ की मोटाई और मात्रा का अनुमान सैटेलाइट तस्वीरों और गणितीय मॉडल के आधार पर लगाया गया है। ऐसे में वास्तविक स्थिति में नुकसान और बहाव का स्वरूप अलग हो सकता है। फिलहाल यह शोध किसी तुरंत हादसे की चेतावनी नहीं, बल्कि भविष्य के बड़े खतरे को समझने और उससे बचने की तैयारी करने का संकेत है।