हर साल 134 अरब टन बर्फ गंवा रहे ग्लेशियर, मात्र 3.2% ग्लेशियरों ने गंवाई आधे से ज्यादा बर्फ

दुनिया के केवल 3.2 फीसदी ग्लेशियर 2000-2019 के दौरान कुल बर्फ नुकसान में आधे से ज्यादा के जिम्मेदार रहे; झीलों वाले ग्लेशियर 57 फीसदी तेजी से पिघले।
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on: 
सारांश
  • झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियर आकार के अनुपात में जमीन पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों से 57 फीसदी तेजी से बर्फ खो रहे हैं।

  • साल 2000 से 2019 के बीच झीलों, महासागरों और बर्फ की चादरों से जुड़े ग्लेशियरों ने सालाना 134 अरब टन बर्फ गंवाई।

  • दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

  • वैज्ञानिकों ने ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की चादरों को छोड़कर दुनिया के 2,16,502 ग्लेशियरों का विस्तृत अध्ययन किया।

  • जलवायु परिवर्तन से बनती नई ग्लेशियर झीलें जमीन पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों को झीलों तक पहुंचा रही हैं, जिससे बर्फ नुकसान बढ़ सकता है।

दुनिया के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ ग्लेशियर ऐसे भी हैं जो दूसरों के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से अपनी बर्फ खो रहे हैं? वैज्ञानिकों के नए अध्ययन में पता चला है कि झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियर आकार के हिसाब से सबसे तेजी से बर्फ गंवाने वाले ग्लेशियरों में शामिल हैं। हैरानी की बात यह है कि दुनिया के कुल ग्लेशियरों में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 3.2 प्रतिशत है, लेकिन बर्फ के कुल नुकसान में इनका योगदान बहुत बड़ा है।

‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, साल 2000 से 2019 के बीच झीलों, महासागरों या बर्फ की विशाल चादरों में खत्म होने वाले ग्लेशियरों ने हर साल औसतन 134 अरब मीट्रिक टन बर्फ खोई। यह दुनिया के ग्लेशियरों से होने वाले कुल बर्फ नुकसान के आधे से भी ज्यादा का हिस्सा है।

यह भी पढ़ें
दुनिया भर में ग्लेशियर अनुमान से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं, एंडीज की चट्टानें दे रही हैं बड़ा संकेत
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

सिर्फ 3.2 प्रतिशत ग्लेशियर, लेकिन नुकसान बहुत बड़ा

बर्मिंघम विश्वविद्यालय और लीड्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने दुनिया के 2,16,502 ग्लेशियरों का अध्ययन किया। इसमें ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका की विशाल बर्फ की चादरों को शामिल नहीं किया गया।

शोधकर्ताओं ने ग्लेशियरों को इस आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा कि वे आखिर में कहां जाकर खत्म होते हैं। कुछ ग्लेशियर जमीन पर खत्म होते हैं, कुछ झीलों में, कुछ समुद्र में और कुछ बर्फ की विशाल चादरों से जुड़ते हैं।

ग्लेशियर झीलें तीन प्रकार की होती हैं -टर्मिनस झीलें, ग्लेशियर के किनारे स्थित झीलें और प्रोग्लेशियल झीलें। अध्ययन में केवल उन ग्लेशियरों को झीलों में समाप्त होने वाला माना गया, जिनका अंतिम छोर सीधे झील के संपर्क में था।
ग्लेशियर झीलें तीन प्रकार की होती हैं -टर्मिनस झीलें, ग्लेशियर के किनारे स्थित झीलें और प्रोग्लेशियल झीलें। अध्ययन में केवल उन ग्लेशियरों को झीलों में समाप्त होने वाला माना गया, जिनका अंतिम छोर सीधे झील के संपर्क में था।स्रोत: नेचर कम्युनिकेशंस

अध्ययन में सामने आया कि झीलों, समुद्रों और बर्फ की चादरों से जुड़े ग्लेशियर आकार में काफी बड़े होते हैं। ये दुनिया के कुल ग्लेशियर क्षेत्र के आधे से भी ज्यादा हिस्से में फैले हैं। हालांकि, झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियरों का मामला खास तौर पर चिंता बढ़ाने वाला है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, जमीन पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों की तुलना में झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियर अपने आकार के अनुपात में करीब 57 प्रतिशत ज्यादा तेजी से बर्फ खो रहे हैं।

यह भी पढ़ें
जलवायु संकट: प्राचीन अंटार्कटिक द्वीप के एक चौथाई ग्लेशियर पिघल गए
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

आखिर झीलें ग्लेशियरों को तेजी से क्यों पिघलाती हैं?

इस सवाल का जवाब अभी पूरी तरह साफ नहीं है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे झीलों का पानी, ग्लेशियरों का आकार और उनकी बनावट जैसे कई कारण हो सकते हैं।

जब कोई ग्लेशियर झील में जाकर खत्म होता है, तो उसके आगे का हिस्सा पानी के संपर्क में रहता है। पानी की वजह से ग्लेशियर के निचले हिस्से में बर्फ पिघल सकती है। इसके अलावा, ग्लेशियर के मुहाने से बर्फ के बड़े-बड़े टुकड़े टूटकर झील में गिर सकते हैं। इस प्रक्रिया को ‘कैल्विंग’ कहा जाता है।

यह भी पढ़ें
जलवायु संकट: हर साल 50 सेंटीमीटर पिघल रहा है 'सनलाइट ग्लेशियर'
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

बर्फ के ये टुकड़े अलग होने से ग्लेशियर का आकार तेजी से घट सकता है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन प्रक्रियाओं में से कौन-सी सबसे ज्यादा असर डालती है।

महासागर में खत्म होने वाले ग्लेशियर भी तेजी से बहते हैं

अध्ययन में ग्लेशियरों की गति को लेकर भी दिलचस्प जानकारी सामने आई। जलवायु, आकार और ऊंचाई जैसे कारकों का हिसाब लगाने के बाद वैज्ञानिकों ने पाया कि जमीन पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों के मुकाबले झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियर औसतन 10 प्रतिशत तेज बहते हैं। वहीं, समुद्र में खत्म होने वाले ग्लेशियरों की औसत गति 44 प्रतिशत ज्यादा पाई गई।

यह भी पढ़ें
एंडीज, हिमालय व अन्य ग्लेशियरों के पिघलने से लोगों की आस्था व जीवन में आ रहा है बदलाव
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियर दुनिया के हर प्रमुख ग्लेशियर क्षेत्र में मौजूद हैं। ज्यादातर क्षेत्रों में वे जमीन या समुद्र में खत्म होने वाले ग्लेशियरों की तुलना में तेजी से बर्फ खो रहे हैं।

बदलता मौसम बदल रहा है ग्लेशियरों का भविष्य

जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों की स्थिति भी बदल रही है। आर्कटिक के कुछ हिस्सों में समुद्र तक पहुंचने वाले ग्लेशियर पीछे हटकर जमीन पर खत्म हो रहे हैं। दूसरी ओर, दुनिया के कई इलाकों में ग्लेशियरों के पिघलने से नई झीलें बन रही हैं। इससे जमीन पर खत्म होने वाले कुछ ग्लेशियर अब झीलों में जाकर खत्म हो रहे हैं।

यह भी पढ़ें
ग्लेशियर पिघलने से मधुमक्खियों में बीमारी का खतरा बढ़ने के आसार: अध्ययन
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन बदलावों के असर अलग-अलग हो सकते हैं। समुद्र से पीछे हटकर जमीन पर खत्म होने वाले ग्लेशियरों में बर्फ का नुकसान धीमा पड़ सकता है, जबकि झीलों में पहुंचने वाले ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है।

बेहतर अनुमान लगाने में मिलेगी मदद

शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लेशियरों के प्रकार को समझना भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। इससे समुद्र के बढ़ते जलस्तर, पानी की उपलब्धता और ग्लेशियर झीलों से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं का बेहतर अनुमान लगाया जा सकेगा।

यह भी पढ़ें
ग्लेशियरों के पिघलने से प्राकृतिक आपदाओं की जद में हैं पहाड़ी इलाके
दुनिया के कुल ग्लेशियरों में केवल 3.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले ग्लेशियर बर्फ के कुल नुकसान में आधे से ज्यादा योगदान देते हैं।

अध्ययन के मुताबिक, झीलों में खत्म होने वाले ग्लेशियर तेजी से बर्फ खो रहे हैं, लेकिन इसके पीछे की वजहों को समझने के लिए अभी और शोध की जरूरत है।

ग्लेशियर केवल बर्फ के पहाड़ नहीं हैं। वे नदियों को पानी देते हैं, लाखों लोगों की जल जरूरतों से जुड़े हैं और धरती के तापमान में बदलाव के संकेत भी देते हैं। ऐसे में उनका तेजी से पिघलना सिर्फ पहाड़ों की समस्या नहीं, बल्कि आने वाले समय में पानी, पर्यावरण और इंसानी जीवन से जुड़ी बड़ी चुनौती बन सकता है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in