

अंटार्कटिका के ऊपर 2026 में ओजोन छिद्र 48 वर्षों के रिकॉर्ड में सातवां सबसे बड़ा दर्ज किया गया।
शक्तिशाली ध्रुवीय भंवर और असामान्य मौसमी परिस्थितियों के कारण ओजोन छिद्र का आकार सामान्य से काफी बड़ा रहा।
सितंबर-अक्टूबर के दौरान ओजोन छिद्र का औसत क्षेत्रफल 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के कारण ओजोन नष्ट करने वाले रसायनों में कमी आई, जिससे नुकसान सीमित रहा।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि पुराने हानिकारक रसायनों का असर घटने से 2070 के दशक तक ओजोन परत बहाल होगी।
अंटार्कटिका के ऊपर इस साल ओजोन छिद्र ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और राष्ट्रीय समुद्री एवं वायुमंडलीय प्रशासन (नोआ) के वैज्ञानिकों के मुताबिक, 2026 में ओजोन छिद्र पिछले 48 वर्षों के रिकॉर्ड में सातवां सबसे बड़ा रहा। इसकी वजह कोई नई रासायनिक आफत नहीं, बल्कि असामान्य मौसमी परिस्थितियां और बेहद शक्तिशाली ध्रुवीय भंवर (पोलर वोर्टेक्स) रहे।
हालांकि इस बड़ी खबर के बीच राहत की बात भी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों में आई कमी ने स्थिति को और बिगड़ने से बचाया है। ओजोन परत की दीर्घकालिक बहाली अब भी सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
अमेरिका से दोगुने से ज्यादा बड़ा छिद्र
सात सितंबर से 13 अक्टूबर के बीच ओजोन छिद्र का औसत क्षेत्रफल करीब 96 लाख वर्ग मील (2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर) रहा। यह अमेरिका के कुल क्षेत्रफल से दोगुने से भी अधिक है। 18 सितंबर को इसका आकार सबसे ज्यादा, करीब 1.05 करोड़ वर्ग मील (2.71 करोड़ वर्ग किलोमीटर) दर्ज किया गया।
यह अब तक दर्ज सबसे बड़े ओजोन छिद्र से करीब 90 फीसदी छोटा नहीं, बल्कि उसके लगभग 90 फीसदी आकार के बराबर था। सबसे बड़ा ओजोन छिद्र नौ सितंबर 2000 को दर्ज किया गया था।
नासा के वैज्ञानिक के मुताबिक, इस साल का छिद्र और बड़ा हो सकता था, अगर वातावरण में ओजोन को नष्ट करने वाले रसायनों की मात्रा साल 2000 के चरम स्तर पर होती। उस स्थिति में इसका क्षेत्रफल 10 से 20 लाख वर्ग मील और बढ़ सकता था।
आखिर क्यों बढ़ा ओजोन छिद्र?
इस साल अंटार्कटिका के ऊपर ध्रुवीय भंवर असामान्य रूप से शक्तिशाली और बड़ा रहा। यह तेज हवाओं का ऐसा घेरा है, जो सर्दियों के दौरान दक्षिणी ध्रुव के आसपास ठंडी हवा को बांधकर रखता है।
आमतौर पर निचले वायुमंडल से उठने वाली बड़ी मौसमी हलचलें इस भंवर को कमजोर करती हैं। लेकिन अगस्त और सितंबर में ऐसी हलचलें कमजोर रहीं। नतीजा यह हुआ कि ध्रुवीय भंवर लंबे समय तक मजबूत बना रहा और बेहद ठंडी परिस्थितियां कायम रहीं।
नोआ की वैज्ञानिक एमी बटलर के मुताबिक, इन परिस्थितियों ने ओजोन के विनाश के लिए अनुकूल क्षेत्र को और बड़ा कर दिया। अंटार्कटिका के ऊपर बनने वाले बेहद ठंडे बादल ओजोन को नष्ट करने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं को तेज करते हैं।
ओजोन को कौन कर रहा है नुकसान?
ओजोन परत को सबसे ज्यादा नुकसान क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) और ब्रोमीन युक्त रसायनों से होता है। कभी इनका इस्तेमाल फ्रिज, एयर कंडीशनर, इन्सुलेशन सामग्री और कई दूसरे उत्पादों में बड़े पैमाने पर किया जाता था।
ये रसायन वायुमंडल में पहुंचकर सूर्य की पराबैंगनी किरणों के संपर्क में टूटते हैं। इससे क्लोरीन और ब्रोमीन जैसे तत्व निकलते हैं, जो ओजोन अणुओं को नष्ट करते हैं। पुराने उत्पादों और कचरे में मौजूद इन रसायनों का असर कई दशकों तक बना रह सकता है।
105 डॉबसन यूनिट तक पहुंचा ओजोन स्तर
वैज्ञानिक केवल उपग्रहों से ही नहीं, बल्कि गुब्बारों और जमीन पर मौजूद उपकरणों से भी ओजोन की निगरानी करते हैं। दक्षिणी ध्रुव पर किए गए माप के मुताबिक, 17 अक्टूबर को ओजोन का स्तर घटकर 105 डॉबसन यूनिट रह गया। अक्टूबर 2006 में यह अब तक के सबसे निचले स्तर 92 डॉबसन यूनिट तक पहुंचा था।
एक डॉबसन यूनिट ओजोन की मात्रा मापने की इकाई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, 100 डॉबसन यूनिट की ओजोन परत को सामान्य तापमान और दबाव पर समेटा जाए तो उसकी मोटाई महज एक मिलीमीटर होगी।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने जगाई उम्मीद
1987 में हुए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ने ओजोन परत को बचाने की वैश्विक लड़ाई में अहम भूमिका निभाई। इसके तहत ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों के उत्पादन और इस्तेमाल पर नियंत्रण लगाया गया। नतीजा यह है कि अंटार्कटिका के समताप मंडल में क्लोरीन का स्तर 1980 के दशक के मुकाबले करीब एक-तिहाई घट चुका है।
नासा और नोआ के वैज्ञानिकों का अनुमान है कि पुराने रसायनों का असर धीरे-धीरे खत्म होने के साथ ओजोन परत 2070 के दशक तक काफी हद तक बहाल हो सकती है।
मौसम की मार, लेकिन उम्मीद कायम
ओजोन परत पृथ्वी के लिए प्राकृतिक सनस्क्रीन की तरह काम करती है। यह सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी किरणों से इंसानों, जीव-जंतुओं और पौधों की रक्षा करती है। इसका कमजोर होना त्वचा कैंसर, आंखों की बीमारियों और समुद्री पारिस्थितिकी के लिए खतरा बढ़ा सकता है।
2026 का बड़ा ओजोन छिद्र बताता है कि मौसम की असामान्य परिस्थितियां इस समस्या को फिर गंभीर बना सकती हैं। लेकिन यह भी साफ है कि दुनिया के साझा प्रयासों ने नुकसान को काफी हद तक सीमित किया है। संदेश सीधा है- ओजोन परत की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई, लेकिन दुनिया सही दिशा में आगे बढ़ रही है।