बिगड़ती प्रकृति की घड़ी: बढ़ते तापमान ने बदला मधुमक्खियों-ततैयों का जीवन चक्र, अस्तित्व पर बढ़ा संकट

स्टडी से पता चला है कि ग्लोबल वार्मिंग ने कीटों के जीवन चक्र को बिगाड़ दिया है, जिसके चलते मधुमक्खियां और ततैया कमजोर हो रहे हैं और परागण पर खतरा बढ़ रहा है।
अपने घोसले की सुरक्षा में ततैया के लार्वा; फोटो: आईस्टॉक
अपने घोसले की सुरक्षा में ततैया के लार्वा; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • बढ़ते तापमान ने प्रकृति की लय को असंतुलित कर दिया है, जिसका असर मधुमक्खियों और ततैयों जैसे अहम परागणकर्ताओं पर दिख रहा है। नए अध्ययन के मुताबिक, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ये कीट तय समय से पहले ही अपनी शीतनिद्रा से बाहर आ रहे हैं, लेकिन उस समय न तो उन्हें पर्याप्त भोजन मिल पाता है और न ही उनके शरीर में उतनी ऊर्जा बची होती है।

  • नतीजतन, वे कमजोर पड़ रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता घट रही है और उनकी जीवित रहने की संभावना कम होती जा रही है।

  • चिंता की बात है कि इसका सबसे ज्यादा असर मादा कीटों पर पड़ा। कुछ मामलों में तो उनके शरीर का वजन 34 फीसदी तक घट गया। यह गिरावट उनके प्रजनन पर सीधा असर डाल सकती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरे की घंटी है।

  • यह बदलाव सिर्फ कीटों तक सीमित नहीं है। मधुमक्खियां और ततैया परागण की प्रक्रिया के केंद्र में हैं, जिस पर फसलों, खाद्य उत्पादन और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन निर्भर करता है। अगर ये परागणकर्ता कमजोर होते हैं, तो इसका सीधा असर कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।

धरती का बढ़ता तापमान अब केवल मौसम में बदलाव ही नहीं कर रहा, बल्कि जीवन की बुनियाद को भी हिला रहा है। ऐसा ही कुछ मधुमक्खियां और ततैयों के मामले में देखा गया। यह वे नन्हें जीव हैं जिन पर फूल, फसलें, और जीवन का संतुलन टिका है।

इस बारे में किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि दुनिया में बढ़ते तापमान के कारण मधुमक्खियां और ततैया तय समय से पहले ही अपने कोकून से बाहर आ रही हैं और यही जल्दी उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है।

आमतौर पर अधिकांश जंगली मधुमक्खियां सर्दियों के दौरान जमीन, लकड़ी या सुरक्षित जगहों में कोकून के भीतर शीतनिद्रा (हाइबरनेशन) में रहती हैं। वहीं कुछ प्रजातियां जो बसंत की शुरुआत में बाहर आती है कोकून के भीतर ही पूरी तरह विकसित हो चुकी होती हैं।

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वहीं जो प्रजातियां गर्मियों में निकलती हैं, उन्हें वसंत में बाहर आने से पहले अपना विकास पूरा करना पड़ता है। लेकिन चिंता की बात है कि जलवायु में आता बदलाव अब इस प्राकृतिक चक्र को बिगाड़ रहा है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। 

परागण पर खतरा: फसल और खाद्य सुरक्षा पर असर

बढ़ती गर्मी की वजह से ये कीट समय से पहले अपनी शीतनिद्रा से बाहर तो आ जाते हैं, पर उस समय उनके लिए जरूरी फूल अभी खिले नहीं होते, भोजन उपलब्ध नहीं होता और उनके शरीर की बची-खुची ऊर्जा भी तेजी से खत्म होने लगती है। साथ ही ज्यादा गर्मी में शीतनिद्रा के दौरान उनकी ऊर्जा यानी शरीर में जमा वसा तेजी से खत्म होने लगता है, जिससे उनके जीवित रहने और प्रजनन करने की संभावना घट जाती है।

एक लाल मेसन मधुमक्खी (ओस्मिया बाइकोर्निस) सर्दियों के अपने सुरक्षित ठिकाने, रीड के खोखले डंठल में दिखाई दे रही है। अंडे से निकलने के बाद यह अब घर छोड़कर बाहर की दुनिया में कदम रखने को तैयार है। (इमेज: क्रिस्टीना गनुजा/ यूनिवर्सिटी ऑफ वुर्जबर्ग)
एक लाल मेसन मधुमक्खी (ओस्मिया बाइकोर्निस) सर्दियों के अपने सुरक्षित ठिकाने, रीड के खोखले डंठल में दिखाई दे रही है। अंडे से निकलने के बाद यह अब घर छोड़कर बाहर की दुनिया में कदम रखने को तैयार है। (इमेज: क्रिस्टीना गनुजा/ यूनिवर्सिटी ऑफ वुर्जबर्ग)

इस प्रभाव को समझने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ वुर्जबर्ग से जुड़े वैज्ञानिकों ने जर्मनी के बवेरिया क्षेत्र में 160 से अधिक स्थानों से एकत्र किए करीब 15,000 कीटों का अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने इन्हें अलग-अलग तापमान वाली परिस्थितियों में रखकर यह समझने की कोशिश की कि बदलती जलवायु का उन पर क्या असर पड़ता है।

अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले थे। सभी प्रजातियां गर्म मौसम में जल्दी बाहर आ गईं। लेकिन हर प्रजाति की हालत एक जैसी नहीं थी। गर्म इलाकों के कीट बेहतर स्थिति में थे, वे जल्दी बाहर आए और उनका शरीर भी ज्यादा मजबूत था।

वहीं ठंडे क्षेत्रों के कीट ज्यादा कमजोर पाए गए, क्योंकि वे तेजी से अपनी ऊर्जा खो बैठे और कमजोर शुरुआत के साथ जीवन की दौड़ में पीछे रह गए।

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चिंता की बात है कि इसका सबसे ज्यादा असर मादा कीटों पर पड़ा। कुछ मामलों में तो उनके शरीर का वजन 34 फीसदी तक घट गया। यह गिरावट उनके प्रजनन पर सीधा असर डाल सकती है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरे की घंटी है।

क्या बदलती जलवायु के साथ ढल पाएंगे कीट?

प्रतिष्ठित जर्नल फंक्शनल इकोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन ने कई नए गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं, क्या ये कीट इतनी तेजी से बदलती जलवायु के साथ खुद को ढाल पाएंगे? क्या कमजोर कीट प्रभावी परागण कर पाएंगे? और अगर नहीं, तो इसका हमारी फसलों, परागण और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर कितना गहरा असर होगा?

अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर क्रिस्टीना गनुजा का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, "ठंडे क्षेत्रों के कीट, जो बसंत में सक्रिय होते हैं, गर्म होती जलवायु के सामने सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। वे जल्दी अपनी ऊर्जा खो देते हैं, इसलिए उनकी शुरुआत कमजोर होती है।"

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शोधकर्ताओं के मुताबिक इसका असर महज इन कीटों तक सीमित नहीं है। मधुमक्खियां और ततैये, परागण में अहम भूमिका निभाते हैं। अगर ये कमजोर पड़ते हैं, तो पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और हमारी खाद्य व्यवस्था पर भी खतरा बढ़ सकता है।

देखा जाए तो यह बदलाव महज मधुमक्खियों और ततैयों तक सीमित नहीं है। यह उस नाज़ुक प्राकृतिक संतुलन के दरकने का संकेत है, जिस पर हमारी पूरी दुनिया टिकी है। जब ये छोटे-से परागणकर्ता कमजोर पड़ते हैं, तो असर खेतों की हरियाली से लेकर हमारी थाली तक साफ दिखाई देता है।

अब सवाल सिर्फ उनके बचने का नहीं, बल्कि हमारे भविष्य का है, क्या हम वक्त रहते अपनी बदलती दुनिया को संभाल पाएंगे, या फिर यह खामोश संकट हमारी आंखों के सामने ही बेकाबू हो जाएगा?

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