जीवन के शुरूआती दिनों में बढ़ती गर्मी का असर बच्चों में 'थैलेमस' के विकास को कर रहा है धीमा: रिसर्च

स्टडी में पाया गया कि गर्भावस्था और जन्म के शुरुआती महीनों में बढ़ती गर्मी से बच्चों के मस्तिष्क के 'थैलेमस' का विकास धीमा पड़ सकता है, जिससे आगे चलकर व्यवहार पर भी असर पड़ने की आशंका है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु परिवर्तन का खतरा अब केवल मौसम या पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के मस्तिष्क के विकास तक पहुंच चुका है।

  • नई रिसर्च में सामने आया है कि गर्भावस्था और जन्म के शुरुआती पांच महीनों के दौरान अत्यधिक गर्मी का सामना करने वाले बच्चों के मस्तिष्क के महत्वपूर्ण हिस्से 'थैलेमस' का विकास धीमा पड़ सकता है।

  • यही हिस्सा सीखने, समझने, महसूस करने और व्यवहार को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाता है।

  • अध्ययन के अनुसार, ऐसे बच्चों में किशोरावस्था तक पहुंचने पर चिड़चिड़ापन, आक्रामकता और नियम तोड़ने जैसे व्यवहार अधिक देखने को मिले, हालांकि उनकी बौद्धिक क्षमता पर स्पष्ट असर नहीं पाया गया।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ती गर्मी गर्भनाल, रक्त प्रवाह, ऑक्सीजन की आपूर्ति और मस्तिष्क के विकास से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है।

  • विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान के बीच गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को भीषण गर्मी से बचाना अब केवल स्वास्थ्य संबंधी सलाह नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ मस्तिष्क और बेहतर भविष्य की सुरक्षा का महत्वपूर्ण कदम है।

बदलते मौसम और बढ़ती तपिश का असर अब सिर्फ हमारे शरीर पर ही नहीं, बल्कि अजन्मे बच्चों और नवजातों के नाजुक दिमाग पर भी पड़ रहा है। एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि गर्भावस्था और जन्म के शुरुआती दिनों में अत्यधिक गर्मी का सामना करने वाले बच्चों के दिमाग का एक खास हिस्सा उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ पाता। इसकी वजह से उनके मानसिक विकास पर असर पड़ सकता है।

यह अध्ययन 'बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ' से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एनवायरमेंट इंटरनेशनल में प्रकाशित हुए हैं।

दिमाग का 'कंट्रोल रूम' हो रहा है प्रभावित

वैज्ञानिकों का कहना है कि जीवन के शुरुआती दौर में गर्मी का असर वर्षों बाद भी बच्चों के मस्तिष्क पर दिखाई दे सकता है। रिसर्च से पता चला है कि शुरुआती जीवन में अत्यधिक गर्मी के कारण दिमाग के एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्से, जिसे 'थैलेमस' कहते हैं, उसका विकास धीमा हो जाता है।

बता दें कि थैलेमस हमारे दिमाग का वह मुख्य 'कंट्रोल रूम' या रिले केंद्र है जो हमारी आंखों, कानों और त्वचा से मिलने वाली जानकारियों को प्रोसेस करके दिमाग के बाकी हिस्सों तक पहुंचाता है। यह सीखने, समझने, महसूस करने और प्रतिक्रिया देने जैसी कई अहम प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ऐसे में जब इसका विकास धीमा होता है, तो आगे चलकर बच्चों के व्यवहार में बदलाव आने लगता है।

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वैज्ञानिकों के अनुसार, थैलेमस का विकास गर्भावस्था के शुरुआती चरण में ही शुरू हो जाता है। यही कारण है कि यह बढ़ते तापमान और गर्भ में होने वाले जैविक बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है।

इस रिसर्च में नीदरलैंड के 3,251 बच्चों के जन्म से लेकर उनकी किशोरावस्था तक का अध्ययन किया गया। वैज्ञानिकों ने जब इन बच्चों के 10 और 14 साल की उम्र में ब्रेन एमआरआई स्कैन किए, तो हैरान करने वाले नतीजे मिले।

किशोरावस्था में चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार

जिन बच्चों की माओं ने गर्भावस्था में या जिन बच्चों ने खुद जन्म के शुरुआती पांच महीनों में ज्यादा गर्मी झेली थी, 15 साल की उम्र तक आते-आते उनका थैलेमस छोटा रह गया। इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन, नियम तोड़ना और आक्रामक (गुस्सैल) व्यवहार ज्यादा देखा गया। हालांकि, इस स्टडी में बच्चों की बौद्धिक क्षमता (कॉग्निटिव परफॉर्मेंस) पर कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं पाया गया।

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अध्ययन में यह भी सामने आया है कि गर्भावस्था और जन्म के बाद के पहले पांच महीने बच्चे के मानसिक विकास के लिए सबसे 'नाजुक' समय होते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस दौरान थैलेमस बहुत तेजी से विकसित हो रहा होता है और वहां खून का दौरा बहुत ज्यादा होता है। जब एक गर्भवती महिला या नवजात अत्यधिक गर्मी (औसत 20.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक के निरंतर तापमान) का सामना करते हैं, तो गर्मी के तनाव से मां के हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं।

इसका सीधा असर गर्भनाल (प्लेसेंटा) पर पड़ता है, जिससे बच्चे के दिमाग तक खून और ऑक्सीजन का प्रवाह प्रभावित होता है।

राहत की बात यह रही कि ठंड तापमान का बच्चों के दिमाग पर ऐसा कोई बुरा असर नहीं देखा गया।

कैसे असर डालती है गर्मी?

हालांकि स्टडी में इसके जैविक कारणों की सीधे जांच नहीं की गई, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्मी मां के तनाव हार्मोन, प्लेसेंटा के कामकाज, भ्रूण तक रक्त प्रवाह और मस्तिष्क के विकास से जुड़े रासायनिक संकेतों को प्रभावित कर सकती है। गर्मी से होने वाली सूजन और ऑक्सीडेटिव तनाव भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं।

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इस स्टडी की मुख्य सूत्रधार और प्रोफेसर मोनिका गुक्सेंस का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, "अध्ययन में शामिल बच्चे 2002 से 2006 के बीच पैदा हुए थे। आज ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण दुनिया का तापमान कहीं ज्यादा बढ़ चुका है। ऐसे में यह बेहद जरूरी हो गया है कि हम गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को भीषण गर्मी और लू से बचाने के लिए पुख्ता कदम उठाएं। यह सिर्फ मौसम से बचने का मामला नहीं है, यह हमारे बच्चों के सुनहरे भविष्य और स्वस्थ दिमाग को बचाने की जंग है।"

विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को अत्यधिक गर्मी से बचाने के उपाय अपनाना भविष्य की पीढ़ियों के मस्तिष्क के स्वस्थ विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के भविष्य और उनके मानसिक विकास से भी गहराई से जुड़ता जा रहा है।

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ऐसे में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि गर्मियों के मौसम में गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चों की माएं धूप में निकलने से बचें, खुद को पूरी तरह हाइड्रेटेड रखें (खूब पानी और तरल पदार्थ पिएं) और घर के तापमान को ठंडा रखने की कोशिश करें, क्योंकि आपका एक छोटा सा प्रयास आपके बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को जीवनभर के लिए सुरक्षित रख सकता है।

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