सूखा व जलवायु परिवर्तन एंटीबायोटिक प्रतिरोध को और भी बदतर बना सकता है: वैज्ञानिक

सूखा मिट्टी में बैक्टीरिया का तनाव बढ़ाकर एंटीबायोटिक प्रतिरोध की प्रक्रिया तेज करता है, जिससे पर्यावरण व स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं
जलवायु परिवर्तन से सूखा बढ़ने पर पर्यावरणीय बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ने का खतरा स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव डाल सकता है।
जलवायु परिवर्तन से सूखा बढ़ने पर पर्यावरणीय बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ने का खतरा स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव डाल सकता है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • सूखे से मिट्टी में बैक्टीरिया का तनाव बढ़ता है, जिससे एंटीबायोटिक प्रतिरोध विकसित होने की आशंका बढ़ सकती है।

  • मिट्टी के बैक्टीरिया प्रतिस्पर्धा में अधिक एंटीबायोटिक बनाते हैं और खुद को बचाने के लिए प्रतिरोध जीन विकसित करते हैं।

  • बैक्टीरिया आपस में जीन साझा कर सकते हैं, जिससे प्रतिरोध गुण मानव-रोगजनक बैक्टीरिया तक पहुंचने का अंदेशा रहता है।

  • जलवायु परिवर्तन से सूखा बढ़ने पर पर्यावरणीय बैक्टीरिया में प्रतिरोध बढ़ने का खतरा स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव डाल सकता है।

  • एंटीबायोटिक प्रतिरोध केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि पर्यावरण, कृषि और जलवायु से जुड़ा जटिल वन हेल्थ मुद्दा है।

एंटीबायोटिक प्रतिरोध या एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक ऐसी स्थिति है जब बैक्टीरिया पर दवाओं का असर कम या खत्म हो जाता है। इसका मतलब है कि जो दवाएं पहले आसानी से संक्रमण को ठीक कर देती थीं, वे अब काम नहीं करतीं। इससे इलाज मुश्किल हो जाता है और मरीजों को अस्पताल में ज्यादा समय तक रहना पड़ता है। कभी-कभी डॉक्टरों को बहुत प्रभावशाली दवाएं देनी पड़ती हैं जिन्हें “आखिरी विकल्प” माना जाता है।

अब तक माना जाता था कि इसका मुख्य कारण अस्पतालों में दवाओं का ज्यादा इस्तेमाल और खेती में एंटीबायोटिक का उपयोग है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक नया कारण भी बताया है, जो है जलवायु परिवर्तन और सूखा। यह अध्ययन 'नेचर माइक्रोबायोलॉजी' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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मिट्टी और बैक्टीरिया का संबंध

मिट्टी में लाखों तरह के बैक्टीरिया पाए जाते हैं। ये बैक्टीरिया हमेशा एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते रहते हैं। कुछ बैक्टीरिया अपने बचाव के लिए एंटीबायोटिक जैसे पदार्थ बनाते हैं ताकि दूसरे बैक्टीरिया को मार सकें। वहीं कुछ बैक्टीरिया ऐसे होते हैं जिनमें इन दवाओं से बचने की क्षमता होती है, जिसे प्रतिरोध कहा जाता है।

सामान्य परिस्थितियों में मिट्टी में नमी होती है, जिससे बैक्टीरिया अपेक्षाकृत स्थिर वातावरण में रहते हैं। लेकिन जब सूखा पड़ता है, तो मिट्टी सूख जाती है और पानी छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाता है। इससे बैक्टीरिया बहुत करीब आ जाते हैं और उनके बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है।

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सूखे का असर और “जंग” जैसी स्थिति

सूखे के समय बैक्टीरिया के लिए जीवित रहना मुश्किल हो जाता है। भोजन और पानी की कमी के कारण वे एक-दूसरे पर अधिक हमला करते हैं। इस स्थिति में वे अधिक एंटीबायोटिक जैसे पदार्थ बनाते हैं और खुद को बचाने के लिए अधिक प्रतिरोध विकसित करते हैं।

इसे एक तरह की “जंग” कहा जा सकता है, जहां हर बैक्टीरिया दूसरे से बचने और उसे हराने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में नए प्रतिरोध जीन बनते हैं और फैलते हैं।

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जीन का आदान-प्रदान कैसे होता है

बैक्टीरिया की एक खास क्षमता होती है कि वे एक-दूसरे के साथ अपने जीन साझा कर सकते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में “जीन ट्रांसफर” कहा जाता है। आसान भाषा में इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे कोई अपने दोस्त को कोई खास ट्रिक या कोड सिखा दे।

अगर मिट्टी में किसी बैक्टीरिया में दवाओं से बचने की क्षमता विकसित हो जाती है, तो वह यह क्षमता दूसरे बैक्टीरिया को भी दे सकता है। कभी-कभी ये बैक्टीरिया आगे चलकर इंसानों में संक्रमण पैदा करने वाले बैक्टीरिया के साथ भी जुड़ सकते हैं।

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जलवायु परिवर्तन का संबंध

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी बढ़ेगी और सूखा अधिक पड़ेगा। ब्रिटेन जैसे देशों में भी भविष्य में गर्म और सूखे मौसम के आसार बढ़ रहे हैं।

कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि सूखे क्षेत्रों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या ज्यादा देखी जाती है। हालांकि यह सीधा कारण नहीं है, लेकिन एक मजबूत संबंध जरूर दिखाई देता है।

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अस्पतालों पर असर

अस्पतालों में पहले से ही एंटीबायोटिक प्रतिरोध एक बड़ी समस्या है। जब आम दवाएं काम नहीं करतीं, तो मरीजों को लंबे समय तक इलाज की जरूरत पड़ती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ता है।

अगर पर्यावरण में भी प्रतिरोध बढ़ता है, तो भविष्य में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। इसलिए वैज्ञानिक इस पर गहराई से अध्ययन कर रहे हैं।

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वन हेल्थ की सोच

अब वैज्ञानिक “वन हेल्थ” की बात करते हैं। इसका मतलब है कि इंसानों का स्वास्थ्य, जानवरों का स्वास्थ्य और पर्यावरण का स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

अगर मिट्टी और पर्यावरण में बदलाव होता है, तो उसका असर अंततः इंसानों पर भी पड़ सकता है। इसलिए एंटीबायोटिक प्रतिरोध को केवल मेडिकल समस्या नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय समस्या भी माना जा रहा है

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सूखा और जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर सुपरबग नहीं बनाते, लेकिन वे ऐसे वातावरण को जरूर बढ़ावा दे सकते हैं जहां बैक्टीरिया अधिक मजबूत और दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनते हैं।

इसलिए एंटीबायोटिक प्रतिरोध से लड़ने के लिए सिर्फ अस्पतालों और दवाओं के इस्तेमाल पर ही ध्यान देना काफी नहीं है। हमें पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन को भी गंभीरता से समझना होगा।

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