दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया से लड़ने की नई उम्मीद: सिंथेटिक बैक्टीरियोफेज

वैज्ञानिकों ने पहली बार बैक्टीरियोफेज को पूरी तरह सिंथेटिक तरीके से बनाकर दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया से लड़ने की नई तकनीक विकसित की।
सिंथेटिक फेज को अलग-अलग बैक्टीरिया पहचानने और संक्रमण देखने के लिए विशेष जीन जोड़कर आसानी से बदला जा सकता है।
सिंथेटिक फेज को अलग-अलग बैक्टीरिया पहचानने और संक्रमण देखने के लिए विशेष जीन जोड़कर आसानी से बदला जा सकता है।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार :आई-स्टॉक
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सारांश
  • नई प्रणाली में कंप्यूटर आधारित डीएनए जानकारी से फेज बनाए जाते हैं, जिससे प्राकृतिक वायरस खोजने की जरूरत समाप्त हो जाती है।

  • गोल्डन गेट असेंबली तकनीक फेज जीनोम को सुरक्षित, तेज और सटीक तरीके से प्रयोगशाला में जोड़ने में मदद करती है।

  • सिंथेटिक फेज को अलग-अलग बैक्टीरिया पहचानने और संक्रमण देखने के लिए विशेष जीन जोड़कर आसानी से बदला जा सकता है।

  • यह तकनीक भविष्य में फेज थेरेपी को मजबूत बनाकर एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की गंभीर समस्या से निपटने में सहायक हो सकती है।

आज दुनिया भर में एंटीबायोटिक दवाओं का असर कम होता जा रहा है। कई बैक्टीरिया ऐसे हो गए हैं जिन पर आम दवाएं काम नहीं करतीं। इस समस्या को एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कहा जाता है। यह स्थिति अस्पतालों और आम लोगों दोनों के लिए बहुत खतरनाक है। वैज्ञानिक लगातार ऐसे नए तरीकों की खोज कर रहे हैं, जिनसे इन दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया को खत्म किया जा सके।

बैक्टीरियोफेज क्या होते हैं

बैक्टीरियोफेज ऐसे वायरस होते हैं जो केवल बैक्टीरिया पर हमला करते हैं। ये इंसानों या जानवरों को नुकसान नहीं पहुंचाते। जब कोई बैक्टीरियोफेज बैक्टीरिया के अंदर जाता है, तो वह उसे नष्ट कर देता है। बैक्टीरियोफेज का उपयोग बैक्टीरियल संक्रमण के इलाज में लगभग 100 साल पहले भी किया जाता था, लेकिन आधुनिक चिकित्सा में इनका प्रयोग सीमित रहा है।

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पुरानी तकनीक की सीमाएं

पहले बैक्टीरियोफेज को इस्तेमाल करने में कई समस्याएं थीं। वैज्ञानिकों को प्राकृतिक फेज ढूंढने पड़ते थे और उन्हें जीवित बैक्टीरिया के अंदर बदलना होता था। यह प्रक्रिया बहुत धीमी, कठिन और जोखिम भरी थी। खासकर जब खतरनाक बैक्टीरिया के साथ काम करना हो, तो सुरक्षा की समस्या भी रहती थी। इसी वजह से फेज थेरेपी आगे नहीं बढ़ पाई।

नई सिंथेटिक तकनीक का विकास

अब अमेरिका की न्यू इंग्लैंड बायोलैब्स (एनईबी) और येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक नई तकनीक विकसित की है। उन्होंने पहली बार बैक्टीरियोफेज को पूरी तरह सिंथेटिक तरीके से बनाने का तरीका खोजा है। इसमें किसी प्राकृतिक वायरस की जरूरत नहीं होती। वैज्ञानिक केवल कंप्यूटर में मौजूद डीएनए जानकारी के आधार पर फेज तैयार कर सकते हैं।

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सिंथेटिक फेज को अलग-अलग बैक्टीरिया पहचानने और संक्रमण देखने के लिए विशेष जीन जोड़कर आसानी से बदला जा सकता है।

कैसे बनाए गए सिंथेटिक फेज

इस शोध में वैज्ञानिकों ने स्यूडोमोनास एरुगिनोसा नाम के बैक्टीरिया पर काम किया। यह बैक्टीरिया बहुत खतरनाक होता है और कई एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं करता। वैज्ञानिकों ने इसके खिलाफ काम करने वाला फेज 28 छोटे सिंथेटिक डीएनए टुकड़ों से प्रयोगशाला में तैयार किया। इसके लिए उन्होंने गोल्डन गेट असेंबली नाम की आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया।

नई तकनीक की खास खूबियां

इस नई प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूरा फेज जीनोम शरीर के बाहर ही तैयार किया जाता है। इससे प्रक्रिया ज्यादा सुरक्षित हो जाती है। वैज्ञानिक फेज के जीन में आसानी से बदलाव कर सकते हैं। वे ऐसे जीन जोड़ सकते हैं, जिनसे फेज अलग-अलग बैक्टीरिया को पहचान सके। वे चमकने वाले जीन भी डाल सकते हैं, जिससे संक्रमण को देखा जा सके।

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समय और सुरक्षा दोनों में फायदा

पहले फेज को बदलने में महीनों या सालों लग जाते थे। नई सिंथेटिक तकनीक से यह काम बहुत जल्दी हो सकता है। इसके अलावा, खतरनाक बैक्टीरिया को बार-बार उगाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे जैव-सुरक्षा का खतरा भी कम हो जाता है। यह तकनीक ज्यादा सटीक और भरोसेमंद मानी जा रही है।

भविष्य में फेज थेरेपी की भूमिका

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक फेज थेरेपी के क्षेत्र में क्रांति ला सकती है। इससे दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों के लिए नए और प्रभावी इलाज तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि, इंसानों पर इसका इस्तेमाल करने से पहले और परीक्षण जरूरी हैं, ताकि उसकी सुरक्षा और असर को पूरी तरह समझा जा सके।

सिंथेटिक बैक्टीरियोफेज का विकास आधुनिक चिकित्सा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस जैसी गंभीर समस्या के बीच यह खोज एक नई उम्मीद बनकर सामने आई है। आने वाले समय में यह तकनीक कई जानें बचाने में मदद कर सकती है।

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