रंगीन माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ रही है धरती की गर्मी: काले‑नीले कण सूर्य की किरणें सोखकर जलवायु के लिए नया खतरा

हवा में मइक्रोप्लास्टिक से जलवायु गर्म होने का नया खतरा, अध्ययन में खुलासा कि ये कण सूर्य की किरणें सोखकर तापमान बढ़ा रहे हैं
मइक्रोप्लास्टिक वायुमंडल में सूर्य की किरणें सोखकर वातावरण को गर्म कर रहे हैं, नया अध्ययन गंभीर जलवायु खतरे की चेतावनी देता है
मइक्रोप्लास्टिक वायुमंडल में सूर्य की किरणें सोखकर वातावरण को गर्म कर रहे हैं, नया अध्ययन गंभीर जलवायु खतरे की चेतावनी देता हैफोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • माइक्रोप्लास्टिक वायुमंडल में सूर्य की किरणें सोखकर वातावरण को गर्म कर रहे हैं, नया अध्ययन गंभीर जलवायु खतरे की चेतावनी देता है

  • रंगीन माइक्रोप्लास्टिक अधिक गर्मी अवशोषित करते हैं, काले और नीले कणों का असर सबसे ज्यादा पाया गया वैज्ञानिक शोध में

  • अध्ययन के अनुसार वायु में प्लास्टिक कण वैश्विक स्तर पर 0.039 वाट प्रति वर्ग मीटर गर्मी बढ़ाते हैं

  • वैज्ञानिकों ने बताया कि सूक्ष्म प्लास्टिक पहले अनुमान से कहीं अधिक जलवायु पर असर डालते हैं, मॉडलिंग से नए आंकड़े सामने आया

  • माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक जलवायु को दोहरा नुकसान पहुंचा रहे हैं, गर्मी बढ़ाने के साथ कार्बन चक्र पर भी प्रभाव डालते हैं

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में चेतावनी दी है कि हवा में मौजूद रंगीन सूक्ष्म प्लास्टिक (माइक्रोप्लास्टिक) सिर्फ पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के तापमान को भी प्रभावित कर सकते हैं। पहले से ही यह माना जाता था कि ये छोटे-छोटे प्लास्टिक कण पानी, मिट्टी और जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। लेकिन अब पता चला है कि ये वायुमंडल में भी गर्मी बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि हवा में तैरते रंगीन सूक्ष्म और नैनो प्लास्टिक कण सूर्य की रोशनी को अवशोषित करके वातावरण को गर्म कर सकते हैं।

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माइक्रोप्लास्टिक (सूक्ष्म) प्लास्टिक क्या हैं

माइक्रोप्लास्टिक बहुत छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं, जिनका आकार पांच मिलीमीटर से लेकर अरबवें हिस्से (नैनो स्तर) तक हो सकता है। ये बड़े प्लास्टिक उत्पादों के धीरे-धीरे टूटने से बनते हैं। कपड़े के सिंथेटिक रेशे, प्लास्टिक बोतलें और पैकेजिंग इसका प्रमुख स्रोत हैं। ये कण आज लगभग हर जगह पाए जाते हैं, पीने के पानी में, समुद्री जीवों के शरीर में और यहां तक कि अंटार्कटिका की बर्फ में भी।

कैसे बढ़ा नया खतरा सामने आया

पहले किए गए अध्ययनों में माना गया था कि हवा में मौजूद रंगीन प्लास्टिक कण जलवायु पर बहुत कम असर डालते हैं। लेकिन उन शोधों में रंग और प्रकार के अंतर को ठीक से नहीं देखा गया था।

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नए शोध में वैज्ञानिकों ने विभिन्न रंगों के प्लास्टिक कणों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि रंग इस बात को प्रभावित करता है कि कोई कण कितनी धूप को सोखता है और कितनी परावर्तित करता है। गहरे रंग जैसे काला, नीला और लाल अधिक सूर्य प्रकाश को सोख लेते हैं और उसे गर्मी में बदल देते हैं।

कंप्यूटर मॉडल से हुआ विश्लेषण

वैज्ञानिकों ने पहले प्रयोगशाला में अलग-अलग रंगों के प्लास्टिक कणों की प्रकाश अवशोषण क्षमता मापी। इसके बाद हवा के पैटर्न और मौसम के आंकड़ों का उपयोग करके यह अनुमान लगाया गया कि ये कण कहां-कहां मौजूद हैं।

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इन सभी आंकड़ों को एक जटिल कंप्यूटर मॉडल में डाला गया, जिसे रेडिएटिव ट्रांसफर मॉडल कहा जाता है। इससे पता चला कि सूक्ष्म प्लास्टिक पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्मी को वातावरण में रोक सकते हैं।

जलवायु पर असर

शोध के अनुसार, ये कण वैश्विक स्तर पर लगभग 0.039 वाट प्रति वर्ग मीटर तक गर्मी बढ़ा सकते हैं। यह संख्या सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन जलवायु विज्ञान में यह एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। कुछ क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रशांत महासागर में इनका असर और भी अधिक पाया गया, जहाँ ये कण स्थानीय स्तर पर धुएं के लगभग पांच गुना तक गर्मी पैदा कर सकते हैं।

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एक नया पर्यावरणीय खतरा

वैज्ञानिकों का कहना है कि सूक्ष्म प्लास्टिक “दोहरा खतरा” पैदा करते हैं। एक तरफ ये वातावरण को गर्म करते हैं और दूसरी तरफ कार्बन चक्र को भी प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि यह अभी शुरुआती शोध है और इसके प्रभावों पर और अध्ययन की आवश्यकता है।

यह नया अध्ययन बताता है कि प्लास्टिक प्रदूषण का असर हमारी सोच से कहीं अधिक गहरा हो सकता है। अब यह सिर्फ समुद्र या जमीन तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि हवा और जलवायु प्रणाली तक फैल चुका है। इससे यह साफ होता है कि प्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करना जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए भी जरूरी होता जा रहा है।

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