

जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम का संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह बीमारियों के भूगोल को भी बदल रहा है। एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते तापमान के साथ चिकनगुनिया जैसी बीमारियां उन ठंडे क्षेत्रों तक भी पहुंच सकती है, जिन्हें अब तक अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था।
अध्ययन के अनुसार, सदी के अंत तक उत्तर-पूर्वी उत्तरी अमेरिका, मध्य यूरोप और पूर्वी एशिया चिकनगुनिया के नए हॉटस्पॉट बन सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बदलाव के पीछे एशियाई टाइगर मच्छर (एडीज एल्बोपिक्टस) की बढ़ती भूमिका है, जो ठंडे मौसम में भी जीवित रह सकता है।
फिलहाल दुनिया के 139 देश या क्षेत्र, जो पृथ्वी के 21.3 फीसदी भूभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं, चिकनगुनिया के जोखिम में हैं। अंदेशा है कि भविष्य में वायरस के प्रसार का 70 फीसदी हिस्सा इसी मच्छर के जरिए हो सकता है।
भारत के लिए भी खतरा कम नहीं है। अनुमान है कि यदि बीमारी नए इलाकों में फैलती है, तो 1.21 करोड़ भारतीय इसकी जद में आ सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि मच्छरों की निगरानी, स्वास्थ्य ढांचे की तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया योजनाओं पर अभी से निवेश नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में चिकनगुनिया एक बड़े वैश्विक स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकता है।
कभी बीमारियों की सीमाएं मौसम और भूगोल तय करते थे। दुनिया के कुछ हिस्से ऐसे थे, जहां चिकनगुनिया जैसी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा लगभग न के बराबर माना जाता था। लेकिन अब बदलती जलवायु इन सरहदों को तेजी से मिटा रही है।
धरती पर बढ़ते तापमान के साथ मच्छर नए इलाकों में पहुंच रहे हैं और उनके साथ ऐसी बीमारियां भी, जो कभी केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों तक सीमित थीं, वो भी नए इलाकों में तेजी से पैर पसार रही हैं। चिकनगुनिया भी उन्हीं बीमारियों में से एक है।
इस बारे में एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जलवायु परिवर्तन के कारण चिकनगुनिया का प्रसार तेजी से बढ़ सकता है और सदी के अंत तक यह बीमारी अमेरिका और यूरोप जैसे अपेक्षाकृत ठंडे क्षेत्रों में भी दस्तक दे रही है।
जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा मच्छरों का दायरा
प्रतिष्ठित जर्नल फ्रंटियर्स इन सेलुलर एंड इन्फेक्शन माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि सदी के अंत तक जलवायु में आ रहे बदलावों के कारण चिकनगुनिया का वायरस उत्तर की ओर बढ़ेगा। इसका सबसे बड़ा असर उत्तर-पूर्वी अमेरिका, मध्य यूरोप और पूर्वी एशिया के ठंडे इलाकों पर देखने को मिल सकता है।
बता दें कि चिकनगुनिया उन बीमारियों में से एक है, जो अपने पीछे असहनीय दर्द छोड़ जाती है। अफ्रीका की किमाकोंडे भाषा में 'चिकनगुनिया' का सीधा सा मतलब है —‘वह जो शरीर को मरोड़ दे।‘
यह नाम उस बीमारी के लक्षणों को बयां करता है, जिसमें जोड़ों का दर्द और जकड़न इतनी गंभीर हो सकती है कि व्यक्ति के लिए सीधा खड़ा होना तक मुश्किल हो जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने चिकनगुनिया को उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों की श्रेणी में रखा है। यह बीमारी एडीज प्रजाति के मच्छरों (मुख्यतः एडीज एजिप्टी और एडीज एल्बोपिक्टस) के जरिए फैलती है। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, जोड़ों और मांसपेशियों में असहनीय दर्द, पीठ दर्द, सिरदर्द, थकान, मतली और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं।
यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल (ईसीडीसी) द्वारा साझा आंकड़ों के मुताबिक 2026 में अब तक दुनिया भर में चिकनगुनिया के करीब 33,000 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 9 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है।
इनमें सबसे ज्यादा मामले दक्षिण अमेरिका में सामने आए हैं। फिलहाल यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह बीमारी स्थानीय रूप से नहीं फैलती, बल्कि संक्रमित क्षेत्रों से लौटने वाले यात्रियों के माध्यम से ही मामले सामने आते हैं। लेकिन अब नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चेताया है कि आने वाले समय में यह बीमारी इन क्षेत्रों में भी फैल सकती है।
मच्छर की नई नस्ल बदल रही है खेल
वैज्ञानिकों ने इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए अध्ययन में जानकारी दी है कि अब तक चिकनगुनिया मुख्य रूप से एडीज एजिप्टी मच्छरों के जरिए फैलता था, जो गर्म और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मानव बस्तियों के आसपास पनपता है।
लेकिन 2005-06 में हिंद महासागर के द्वीपों और भारत में फैली बड़ी महामारी के दौरान वैज्ञानिकों ने वायरस में एक महत्वपूर्ण आनुवंशिक बदलाव (ई1-ए226वी) की पहचान की। गौरतलब है कि इस दौरान करीब 2.66 लाख लोग बीमार पड़े थे, जबकि कम से कम 254 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।
इस म्यूटेशन के बाद वायरस एशियाई टाइगर मच्छर (एडिस एल्बोपिक्टस) के जरिए भी प्रभावी ढंग से फैलने लगा। चिंता की बात यह है कि यह मच्छर अपेक्षाकृत ठंडे मौसम को भी सहन कर सकता है।
कौन से क्षेत्र बन सकते हैं नए हॉटस्पॉट?
अध्ययन के अनुसार, मौजूदा समय में भारत सहित दुनिया के 139 देश या क्षेत्र, जो पृथ्वी के करीब 21.3 फीसदी भूभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं, चिकनगुनिया के खतरे की जद में हैं। वैज्ञानिकों ने मच्छरों और वायरस की मौजूदगी से जुड़े हजारों भौगोलिक आंकड़ों का विश्लेषण किया और जलवायु परिवर्तन के 16 अलग-अलग परिदृश्यों के आधार पर सदी के अंत तक इस बीमारी के विस्तार का अनुमान लगाया। इसके निष्कर्ष दर्शाते हैं कि मौसम बदलने के साथ यह दायरा बहुत तेजी से बढ़ेगा।
नतीजों से पता चला है कि भविष्य में इस वायरस के फैलने की 70 फीसदी वजह यही एशियन टाइगर मच्छर होगा। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे धरती का तापमान बढ़ेगा, यह मच्छर उन ठंडे इलाकों में भी अपनी कॉलोनी बना लेगा जहां पहले यह जीवित नहीं रह सकता था।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उत्तर-मध्य यूरोप, उत्तर-पूर्वी उत्तरी अमेरिका और पूर्वी एशिया भविष्य में चिकनगुनिया के प्रमुख हॉटस्पॉट बन सकते हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में 2040 तक मच्छरों की निगरानी प्रणाली, स्वास्थ्य ढांचे की तैयारी और त्वरित प्रतिक्रिया योजनाएं विकसित करने की सलाह दी है।
भारत में भी बढ़ रहा है खतरा
लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन, नागासाकी विश्वविद्यालय और इंटरनेशनल वैक्सीन इंस्टीट्यूट से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए एक अन्य अध्ययन में भी सामने आया है कि हर साल दुनिया में करीब 1.44 करोड़ लोगों पर चिकनगुनिया का खतरा मंडरा रहा है। इनमें से 51 लाख लोग भारतीय हैं। वैज्ञानिकों ने इस खतरे को भी उजागर किया है कि यदि बीमारी नए क्षेत्रों में फैलती है, तो यह खतरा दुनिया भर में 3.49 करोड़ लोगों को अपनी जद में ले सकता है।
चिंता की बात है कि इनमें से 1.21 करोड़ लोग भारतीय होंगे। मतलब कि भारत के वे ठन्डे इलाके जो इन बीमारियों से बचे थे, वहां भी यह बीमारी अपने पैर पसार सकती है।
तैयारी के लिए 2040 तक का समय
शोधकर्ताओं का कहना है कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन स्वास्थ्य तंत्र को अभी से इसके लिए तैयार होना होगा। मच्छरों की निगरानी, डॉक्टरों को बीमारी की शीघ्र पहचान के लिए प्रशिक्षित करना, मच्छर नियंत्रण कार्यक्रमों को मजबूत बनाना और संभावित प्रकोप से निपटने के लिए आपात योजनाएं तैयार करना समय की मांग है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को सीमित करने के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों में निवेश किया जाए, तो भविष्य में चिकनगुनिया के बड़े प्रकोपों की आशंका को काफी हद तक कम किया जा सकता है।