जलवायु परिवर्तन: भारत में 14 करोड़ से ज्यादा बच्चे हर साल एक अतिरिक्त महीने गर्मी की चपेट में आ रहे हैं

बच्चों पर जलवायु संकट की मार, बढ़ती गर्मी के बीच पहले 2,000 दिन बेहतर स्वास्थ्य और मजबूत भविष्य की बुनियाद
तापमान 2 डिग्री बढ़ने पर भारत के 96 प्रतिशत बच्चे सालाना अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।
तापमान 2 डिग्री बढ़ने पर भारत के 96 प्रतिशत बच्चे सालाना अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु बदलाव से भारत में 14.5 करोड़ बच्चे हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी झेल रहे हैं।

  • तापमान 2 डिग्री बढ़ने पर भारत के 96 प्रतिशत बच्चे सालाना अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव से प्रभावित हो सकते हैं।

  • विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे के विकास के लिए पहले 1,000 नहीं, बल्कि जीवन के पहले 2,000 दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं।

  • पोषण के साथ प्यार, बातचीत, खेल, पर्याप्त नींद और शुरुआती विकास की नियमित जांच बच्चों के स्वस्थ भविष्य के लिए जरूरी है।

  • बढ़ती गर्मी, स्क्रीन और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के बीच बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा परिवार और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

जलवायु परिवर्तन का असर अब बच्चों के स्वास्थ्य पर भी साफ दिखाई देने लगा है। एक नए वैश्विक अध्ययन के अनुसार, भारत में करीब 14.5 करोड़ बच्चे हर साल जलवायु परिवर्तन के कारण कम से कम एक अतिरिक्त महीने खतरनाक गर्मी और उमस का सामना कर रहे हैं। यह देश के कुल बच्चों का लगभग 61 प्रतिशत है।

अध्ययन के अनुसार, दुनिया भर में शून्य से नौ साल तक की उम्र के करीब 56 करोड़ बच्चे हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव का सामना कर रहे हैं। बच्चों पर इसका असर दूसरे आयु वर्गों की तुलना में अधिक है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि छोटे बच्चों का शरीर गर्मी को नियंत्रित करने में बड़ों की तुलना में अधिक संवेदनशील होता है। यह अध्ययन साइंस एडवांसेज नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

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उमस वाली गर्मी ज्यादा खतरनाक

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल तापमान बढ़ना ही चिंता की बात नहीं है। ज्यादा नमी वाली गर्मी यानी ह्यूमिड हीट अधिक खतरनाक होती है। ऐसी स्थिति में शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इससे डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में बच्चों पर गर्मी का खतरा सबसे ज्यादा देखा जा रहा है। गरीब देशों में यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि वहां कई परिवारों के पास ठंडक के पर्याप्त साधन, बेहतर घर और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।

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तापमान बढ़ा तो खतरा और बढ़ेगा

भारत के लिए भविष्य की तस्वीर भी चिंताजनक है। अध्ययन के मुताबिक, अगर दुनिया का तापमान औद्योगिक दौर से पहले के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो भारत में करीब 16.6 करोड़ बच्चे हर साल कम से कम एक अतिरिक्त महीने गर्मी के तनाव का सामना कर सकते हैं। तापमान 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ने की स्थिति में यह संख्या करीब 16.9 करोड़ यानी 96 प्रतिशत बच्चों तक पहुंच सकती है।

इसलिए बच्चों को गर्मी से बचाने के लिए स्कूलों, आंगनवाड़ी केंद्रों और घरों में बेहतर व्यवस्था की जरूरत होगी। पर्याप्त पानी, छाया, हवा और जरूरत पड़ने पर ठंडी जगह उपलब्ध कराना जरूरी है।

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सिर्फ पहले 1,000 दिन ही नहीं

बच्चे के विकास के लिए अब तक पहले 1,000 दिनों को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यह अवधि गर्भधारण से बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक होती है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे के विकास पर ध्यान केवल दो साल की उम्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

शोध के अनुसार, बच्चे के जीवन के पहले 2,000 दिन यानी लगभग पांच साल की उम्र तक का समय भी बेहद महत्वपूर्ण है। इसी दौरान बच्चे के दिमाग, भाषा, भावनाओं, सामाजिक व्यवहार और सीखने की क्षमता का मजबूत आधार तैयार होता है।

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पोषण के साथ प्यार और बातचीत भी जरूरी

बच्चे को केवल पर्याप्त खाना देना ही उसके अच्छे विकास के लिए काफी नहीं है। उसके साथ बात करना, खेलना, उसे सुरक्षित महसूस कराना और उसकी बातों पर प्रतिक्रिया देना भी उतना ही जरूरी है।

विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे बच्चों में आयरन और विटामिन बी12 की कमी आम है। खासकर शाकाहारी परिवारों में इस पर ध्यान देना जरूरी है। खून की कमी यानी एनीमिया बच्चे के दिमाग और सीखने की क्षमता पर असर डाल सकती है।

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मोबाइल और पैकेज्ड खाना भी चुनौती

आज छोटे बच्चों में मोबाइल और दूसरे स्क्रीन उपकरणों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या केवल स्क्रीन देखने की नहीं है, बल्कि इससे बातचीत, खेल, शारीरिक गतिविधि और नींद के लिए मिलने वाला समय कम हो जाता है।

दो साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन से बचने की सलाह दी जाती है। दो से पांच साल की उम्र में भी स्क्रीन का इस्तेमाल सीमित और माता-पिता की निगरानी में होना चाहिए। इसी तरह पैकेज्ड स्नैक्स, मीठे पेय और दूसरे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का ज्यादा सेवन भी चिंता का विषय है। बचपन में बनी खाने की आदतें आगे भी बनी रह सकती हैं। घर का बना भोजन, दाल, दूध या अंडे, फल, सब्जियां और साबुत अनाज बच्चों के लिए बेहतर विकल्प हैं।

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समय पर जांच से सुधर सकता है भविष्य

बच्चों की विकास संबंधी जांच को भी नियमित स्वास्थ्य जांच का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बोलने में देरी, सुनने या देखने में परेशानी, सीखने में दिक्कत और ऑटिज्म जैसी समस्याओं की पहचान जितनी जल्दी हो, उतना बेहतर परिणाम मिल सकता है।

भारत में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों में जन्मजात समस्याओं, पोषण की कमी, बीमारियों और विकास संबंधी देरी की पहचान की जाती है।

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स्वस्थ बचपन के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी

छोटे बच्चों को पर्याप्त नींद और खेलने का समय देना भी जरूरी है। एक से दो साल के बच्चों को दिन-रात मिलाकर करीब 11 से 14 घंटे और तीन से पांच साल के बच्चों को 10 से 13 घंटे की नींद की जरूरत होती है।

बदलती जलवायु के दौर में बच्चों के स्वास्थ्य की चुनौती और बड़ी हो रही है। ऐसे में पहले 2,000 दिनों में पोषण, देखभाल, खेल, नींद, सीखने और स्वास्थ्य जांच पर निवेश करना जरूरी है। साथ ही बढ़ती गर्मी से बच्चों की सुरक्षा भी प्राथमिकता बननी चाहिए। स्वस्थ बचपन केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और सरकार की भी साझा जिम्मेदारी है।

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