जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा जहरीले शैवाल का खतरा, झीलों में बिगड़ रही पानी की गुणवत्ता

जलवायु परिवर्तन से झीलों में बढ़ा तापमान, बदला पोषक संतुलन, नीली-हरी शैवाल का फैलाव तेज, पानी की गुणवत्ता और स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बढ़ा
जलवायु परिवर्तन से झीलों का तापमान बढ़ा, परतें लंबे समय तक अलग रहीं, ऑक्सीजन की कमी और पोषक असंतुलन बढ़ा।
जलवायु परिवर्तन से झीलों का तापमान बढ़ा, परतें लंबे समय तक अलग रहीं, ऑक्सीजन की कमी और पोषक असंतुलन बढ़ा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • जलवायु परिवर्तन से झीलों का तापमान बढ़ा, परतें लंबे समय तक अलग रहीं, ऑक्सीजन की कमी और पोषक असंतुलन बढ़ा।

  • नाइट्रोजन घटा और फॉस्फोरस बढ़ा, जिससे नीली-हरी शैवाल को बढ़त मिली और जलाशयों में विषैले ब्लूम तेज हुए।

  • लंबे अध्ययन में पाया गया तापमान हर दशक एक डिग्री बढ़ा, जिससे झीलों का पारिस्थितिक संतुलन लगातार बिगड़ रहा है।

  • ऑक्सीजन रहित अवधि 35 दिन प्रति दशक बढ़ी, जिससे गहराई वाले जल क्षेत्र में जैविक प्रक्रियाएं गंभीर रूप से प्रभावित हुईं।

  • नीली-हरी शैवाल वातावरणीय नाइट्रोजन उपयोग कर तेजी से बढ़ी, जिससे जलाशयों में विषैले तत्व और स्वास्थ्य जोखिम बढ़े हैं।

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल मौसम तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका प्रभाव झीलों और जलाशयों के अंदर के पारिस्थितिक तंत्र पर भी साफ दिखाई देने लगा है। हाल ही में बायरेथ विश्वविद्यालय के नेतृत्व में जर्मनी के फ्रैंकोनियन लेक डिस्ट्रिक्ट में किए गए एक लंबे अध्ययन में यह सामने आया है कि बढ़ते पानी के तापमान और पानी की परतों में बदलाव के कारण हानिकारक शैवाल, विशेषकर नीली-हरी शैवाल, तेजी से बढ़ रहे हैं।

झीलों में पानी की परतों का बदलता व्यवहार

अध्ययन के अनुसार, जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, झीलों में गर्म और ठंडे पानी की परतें अधिक समय तक अलग-अलग बनी रहती हैं। सामान्य स्थिति में झीलों का पानी समय-समय पर मिल जाता है, जिससे पोषक तत्व पूरे जल में संतुलित रहते हैं। लेकिन अब गर्मी बढ़ने के कारण यह मिश्रण कम हो गया है और गर्मियों में यह परतें जल्दी बनने लगती हैं और ज्यादा समय तक बनी रहती हैं।

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इसका परिणाम यह होता है कि सतह का गर्म पानी और नीचे का ठंडा पानी अलग-अलग रहते हैं। नीचे की परतों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे वहां ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। वहीं, फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व नीचे की परतों में जमा होने लगते हैं।

पोषक तत्वों का असंतुलन और उसका असर

अध्ययन में पाया गया कि झीलों में नाइट्रोजन की मात्रा घट रही है, जबकि फॉस्फोरस की मात्रा बढ़ रही है। यह असंतुलन शैवाल के बढ़ने के लिए एक महत्वपूर्ण कारण बन रहा है। सामान्य तौर पर शैवाल को बढ़ने के लिए नाइट्रोजन और फॉस्फोरस दोनों की जरूरत होती है। जब नाइट्रोजन कम हो जाता है, तो शैवाल की वृद्धि रुक सकती है।

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लेकिन नीली-हरी शैवाल एक विशेष क्षमता रखती है। ये शैवाल हवा में मौजूद नाइट्रोजन को सीधे उपयोग में ला सकती हैं। इसलिए जब पानी में नाइट्रोजन कम हो जाता है, तब भी ये तेजी से बढ़ती रहती हैं और अन्य शैवाल को पीछे छोड़ देती हैं।

लंबे समय का अध्ययन और महत्वपूर्ण निष्कर्ष

शोधकर्ताओं ने 2000 से 2019 तक का 19 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें चार झीलों का अध्ययन किया गया, जिनमें अल्टम्यूलसी और ब्रॉम्बाख जलाशय शामिल हैं। अध्ययन में पाया गया कि हर दशक में पानी का तापमान लगभग 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ रहा है। साथ ही, पानी की परतों का अलगाव लगभग 18 दिन प्रति दशक बढ़ गया है। ऑक्सीजन की कमी की अवधि भी 35 दिन तक बढ़ गई है।

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जल गुणवत्ता पर बढ़ता खतरा

इस बदलाव के कारण झीलों की पानी की गुणवत्ता तेजी से खराब हो रही है। नीली-हरी शैवाल के बढ़ने से पानी में जहरीले तत्व पैदा हो सकते हैं, जो इंसानों और जानवरों दोनों के लिए हानिकारक होते हैं। खासकर उन जलाशयों में खतरा अधिक है जिनका उपयोग पीने के पानी के रूप में किया जाता है।

जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चुनौती

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन पहली बार लंबे समय के वास्तविक आंकड़ों के आधार पर यह साबित करता है कि जलवायु परिवर्तन झीलों के अंदर पोषक तत्वों के चक्र को बदल रहा है। इसके कारण जहरीले शैवाल के फैलने का खतरा लगातार बढ़ रहा है।

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वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले दशकों में जलाशयों और झीलों का पानी और अधिक प्रदूषित हो सकता है। इससे न केवल पीने के पानी की समस्या बढ़ेगी, बल्कि जलीय जीवन और पूरे पारिस्थितिक तंत्र पर भी गंभीर असर पड़ेगा।

वाटर रिसोर्सेज नामक पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह झीलों के भीतर होने वाली रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं को भी बदल रहा है। बढ़ते तापमान और बदलते पोषक तत्व संतुलन के कारण नीली-हरी शैवाल का खतरा बढ़ रहा है, जिससे पानी की गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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