भारत में समुद्री शैवाल की पहचान व संरक्षण के लिए डीएनए बारकोडिंग जरूरी: शोध

शोध के मुताबिक, मजबूत और गुणवत्ता-संपन्न डीएनए बारकोड डेटाबेस से समुद्री कृषि, जैव सुरक्षा, नई प्रजातियों की खोज और संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा।
भारत में मात्र 11 फीसदी शैवाल प्रजातियों का डीएनए अनुक्रमित, अधिकतर आर्थिक और पारिस्थितिकी महत्व वाले शैवालों पर शोध बाकी।
भारत में मात्र 11 फीसदी शैवाल प्रजातियों का डीएनए अनुक्रमित, अधिकतर आर्थिक और पारिस्थितिकी महत्व वाले शैवालों पर शोध बाकी।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारत में समुद्री शैवाल पारिस्थितिकी और औद्योगिक दोनों नजरियों से महत्वपूर्ण हैं और समुद्री जीवन के लिए आवश्यक हैं।

  • शैवाल के रूप, रंग और आकार में परिवर्तन होने के कारण केवल दिखावट से सही पहचान मुश्किल है।

  • डीएनए अनुक्रम का उपयोग कर शैवाल की सही पहचान होती है, जिससे पारंपरिक तरीकों की सीमाएं पूरी तरह दूर होती हैं।

  • भारत में मात्र 11 फीसदी शैवाल प्रजातियों का डीएनए अनुक्रमित, अधिकतर आर्थिक और पारिस्थितिकी महत्व वाले शैवालों पर शोध बाकी।

समुद्र की गहराइयों में पाए जाने वाले समुद्री शैवाल, जिन्हें मैक्रोएल्गी कहा जाता है, जीवन से भरपूर पारिस्थितिकी तंत्र की नींव रखते हैं। ये असंख्य समुद्री जीवों को भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं और समुद्र को संतुलित एवं स्वस्थ बनाए रखते हैं। साथ ही, इनका महत्व औद्योगिक क्षेत्र में भी तेजी से बढ़ रहा है।

इनमें से कई शैवालों से दवाओं के लिए आवश्यक कच्चे माल हासिल होते हैं। भारत के हजारों किलोमीटर लंबे समुद्री तट जहां विभिन्न प्रकार के समुद्री शैवाल पाए जाते हैं।

हालांकि शैवाल की पहचान करना बहुत कठिन काम है। शैवाल अपने आकार और रंग में बहुत परिवर्तनशील होते हैं। यह परिवर्तन उनके पर्यावरण, उम्र और प्रजनन अवस्था के अनुसार बदलता रहता है। इस कारण पारंपरिक तरीके से केवल दिखावट देखकर शैवाल की सही पहचान करना मुश्किल होता है और इससे अक्सर गलत पहचान हो जाती है।

इसी समस्या का समाधान आधुनिक विज्ञान ने डीएनए बारकोडिंग के माध्यम से खोजा है। डीएनए बारकोडिंग एक ऐसी तकनीक है जिसमें किसी जीव के डीएनए का छोटा और मानक हिस्सा पढ़कर उसकी सही पहचान की जाती है। उदाहरण के लिए, आरबीसीएल और आईटीएस जैसे जीनों के हिस्सों का उपयोग करके शैवाल की पहचान की जाती है। इस तकनीक में शैवाल की दिखावट या आकार से कोई फर्क नहीं पड़ता, इसलिए यह पारंपरिक तरीकों की तुलना में अधिक विश्वसनीय है। यह शोध जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में प्रकाशित किया गया है

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भारत में शैवाल के डीएनए बारकोड की वर्तमान स्थिति जानने के लिए सेंट्रल साल्ट एंड मरीन केमिकल्स रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएसआईआर) और अकादमी ऑफ सायंटिफिक एंड इनोवेटिव रिसर्च (एसीएसआईआर) के शोधकर्ताओं ने एक डिजिटल अध्ययन किया।

उन्होंने ग्रीन, रेड और ब्राउन शैवाल के लिए जिनबैंक डेटाबेस से डीएनए अनुक्रम एकत्र किए। इसके बाद उन्होंने ब ऑफ साइंस, स्कोपस और पबमेड जैसे बड़े शोध डेटाबेस से तुलना की और गलत जानकारी या डुप्लिकेट आंकड़ों को हटा दिया। इस प्रक्रिया के बाद उन्हें 207 अनूठे डीएनए अनुक्रमों का एक साफ और विश्वसनीय सेट मिला।

इस अध्ययन में पता चला कि भारत में केवल लगभग 11 फीसदी शैवाल की विविधता का डीएनए अनुक्रमित किया गया है। इसके अलावा, शोध में एक बड़ा झुकाव पाया गया। ज्यादातर शोध केवल आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण शैवाल पर केंद्रित हैं, जबकि अधिकांश शैवाल जिनकी पारिस्थितिकी महत्व है, उनके बारे में जानकारी बहुत कम है। इस कमी को पूरा करने के लिए एक मजबूत और गुणवत्ता-संपन्न डीएनए बारकोड लाइब्रेरी बनाना आवश्यक है।

डीएनए बारकोडिंग के कई फायदे हैं। पहले, यह समुद्री शैवाल की पहचान को तेज और सटीक बनाता है, जिससे अकाल फसल या आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है। दूसरे, यह हानिकारक शैवालों के खिलने और आक्रामक प्रजातियों का जल्दी पता लगाने में मदद करता है, जिससे तटीय क्षेत्र की सुरक्षा मजबूत होती है। तीसरे, यह नई प्रजातियों की खोज और भारत के समुद्री पारिस्थितिकी के बेहतर अध्ययन में सहायक है।

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वर्तमान में भारत में डीबीइंडाल्गे जैसे डेटाबेस मौजूद हैं जो शैवाल की सूची प्रदान करती हैं, लेकिन इनमें डीएनए आधारित डेटा की पूर्णता और गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं होती। इस नई अध्ययन ने पहली बार भारत के समुद्री शैवाल के लिए एक गुणवत्ता-संपन्न और एकीकृत डीएनए बारकोड सूची तैयार की है। यह सूची दशकों के अधूरे रिकॉर्ड् को एक विश्वसनीय इन्वेंटरी में बदलती है।

भारत में समुद्री शैवाल की डीएनए बारकोडिंग पर अधिक ध्यान देने से न केवल समुद्री जैव विविधता की सुरक्षा होगी, बल्कि समुद्री कृषि और औद्योगिक विकास में भी मदद मिलेगी। यह शोध समुद्री शैवाल की पहचान, तटीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है।

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