तेजी से पिघल रहीं एशिया की ‘जल टंकियां’, हर साल गायब हो रही औसतन 1,390 करोड़ टन बर्फ

नतीजे दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में हर साल औसतन करीब 1,390 करोड़ टन बर्फ खत्म हो रही है। ऐसे में यदि पिछले 20 वर्षों का हिसाब लगाए तो इस दौरान ग्लेशियरों से करीब 27,800 करोड़ टन बर्फ गायब हो चुकी है।
ग्लेशियरों से गायब होती बर्फ; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
ग्लेशियरों से गायब होती बर्फ; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • एशिया की “जल टंकियां” तेजी से खाली हो रही हैं। चिंता की बात है कि एशिया के ऊंचे पहाड़ों से हर साल करीब 1,390 करोड़ टन बर्फ गायब हो रही है। मतलब कि पिछले दो दशकों में यह क्षेत्र करीब 27,800 करोड़ टन से ज्यादा बर्फ खो चुका है। देखा जाए तो यह महज पहाड़ों पर होता बदलाव नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जल सुरक्षा, कृषि और भविष्य पर मंडराता गंभीर संकट है।

  • अध्ययन ने चेताया है कि ग्लेशियरों का पिघलना सिर्फ पानी की कमी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नई और अस्थिर ग्लेशियल झीलों का निर्माण होगा, जो अचानक आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं को जन्म दे सकती हैं। दूसरी तरफ तेजी से पिघलती बर्फ की वजह से भविष्य में पानी की किल्लत का सामना करना पड़ सकता है।

  • दिलचस्प बात यह है कि सभी क्षेत्रों में स्थिति एक जैसी नहीं है। उदाहरण के लिए, पूर्वी कुनलुन में कुछ हद तक बर्फ बढ़ी है, जबकि पश्चिमी तियान शान में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नतीजे दर्शाते हैं कि जहां पूर्वी कुनलुन में हर साल करीब 110 करोड़ टन बर्फ बढ़ने के संकेत मिले हैं। वहीं पश्चिमी तियान शान सबसे ज्यादा संकट में है, जहां हर साल करीब 190 करोड़ टन बर्फ पिघल रही है।

  • वैज्ञानिक मानते हैं कि इस उतार-चढ़ाव के लिए दुनिया में बढ़ता तापमान, बारिश के पैटर्न में आता बदलाव और सौर विकिरण जैसे कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।

  • अध्ययन में इस बात का भी खुलासा किया है कि भविष्य की तस्वीर और भी ज्यादा चिंताजनक है। उनके मुताबिक अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ता (एसएसपी585) रहा, तो ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार हर साल 1,950 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। ऐसे में समस्या कहीं ज्यादा विकराल रूप ले सकती है।

एशिया की जीवनरेखा कहे जाने वाले ऊंचे पहाड़ अब एक खामोश लेकिन खतरनाक बदलाव से गुजर रहे हैं। हाई माउंटेन एशिया जिसमें हिमालय, तिब्बती पठार और आसपास की विशाल पर्वत श्रृंखलाएं शामिल हैं, वहां ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। यह बदलाव महज बर्फ के घटने की कहानी नहीं, बल्कि आने वाले बड़े जल संकट की चेतावनी है।

नासा के ग्रेस मिशन के दौरान उपग्रह से प्राप्त डेटा और जलवायु संबंधी आंकड़ों के विश्लेषण से सामने आया है कि 2002 से 2023 के बीच इन बर्फीले भंडारों ने भारी मात्रा में अपना द्रव्यमान खो दिया है।

नतीजे दर्शाते हैं कि 2002-03 से 2022-23 के बीच यहां हर साल औसतन करीब 1,390 करोड़ टन (13.9 ± 3.6 गीगाटन) बर्फ खत्म हो रही है। ऐसे में यदि पिछले 20 वर्षों का हिसाब लगाए तो इस दौरान ग्लेशियरों से करीब 27,800 करोड़ टन बर्फ गायब हो चुकी है।

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ग्लेशियरों से गायब होती बर्फ; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

20 वर्षों में गायब हो चुकी है 27,800 करोड़ टन बर्फ

बता दें कि ये वही ग्लेशियर हैं जिन्हें “एशिया की जल टंकियां” या “वॉटर टावर्स” भी कहा जाता है, क्योंकि ये सालभर करोड़ों लोगों के लिए पानी की आपूर्ति बनाए रखते हैं। लेकिन अब इनका तेजी से पिघलना एक दोहरे खतरे को जन्म दे रहा है। एक और जहां इनके बेहद तेजी से पिघलने से बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है, वहीं आगे चलकर यह पिघलन पानी की भीषण कमी में बदल सकती है।

ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता जयदेव धारपुरे के मुताबिक, “ग्लेशियरों का सिकुड़ना केवल पर्यावरणीय बदलाव नहीं, बल्कि इंसानी जीवन के लिए सीधा खतरा है। इससे बुनियादी ढांचे पर असर पड़ सकता है और जान-माल की हानि का जोखिम बढ़ सकता है।“

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गौरतलब है कि हाई माउंटेन एशिया दुनिया के सबसे विविध जलवायु और जटिल भौगोलिक क्षेत्रों में से एक है। यह क्षेत्र करीब 50 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें चीन, भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कई देश शामिल हैं। इस क्षेत्र में हिमालय, काराकोरम, हिंदू कुश, पामीर और तियान शान जैसी प्रमुख पर्वत श्रृंखलाएं शामिल हैं।

अध्ययन के मुताबिक इस क्षेत्र में 95,000 से अधिक ग्लेशियर हैं, जो करीब एक लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं। ये ग्लेशियर सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र, मेकोंग, येलो, और यांग्त्जे जैसी कई बड़ी नदियों का सहारा देते हैं, जिन पर करोड़ों लोगों का जीवन निर्भर है।

अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में सूक्ष्म बदलावों का विश्लेषण कर यह समझा है कि यहां मौजूद बर्फ और पानी के भंडार कितनी तेजी से घट रहे हैं। साथ ही, आंकड़ों की कमी को पूरा करने के लिए मशीन लर्निंग तकनीकों का भी सहारा लिया गया है।

सबसे ज्यादा खतरे में तियान शान, कुनलुन में दिखी राहत

दिलचस्प बात यह है कि सभी क्षेत्रों में स्थिति एक जैसी नहीं है। उदाहरण के लिए, पूर्वी कुनलुन में कुछ हद तक बर्फ बढ़ी है, जबकि पश्चिमी तियान शान में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। नतीजे दर्शाते हैं कि जहां पूर्वी कुनलुन में हर साल करीब 110 करोड़ टन (1.1 ± 0.2 गीगाटन) बर्फ बढ़ने के संकेत मिले हैं।

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वहीं पश्चिमी तियान शान सबसे ज्यादा संकट में है, जहां हर साल करीब 190 करोड़ टन (1.9 ± 0.4 गीगाटन) बर्फ पिघल रही है।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।

वैज्ञानिक मानते हैं कि इस उतार-चढ़ाव के लिए दुनिया में बढ़ता तापमान, बारिश के पैटर्न में आता बदलाव और सौर विकिरण जैसे कारण जिम्मेदार हो सकते हैं।

बढ़ते तापमान के साथ भविष्य पर मंडरा रहा खतरा

वैज्ञानिकों ने अध्ययन में इस बात का भी खुलासा किया है कि भविष्य की तस्वीर और भी ज्यादा चिंताजनक है। उनके मुताबिक अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से बढ़ता (एसएसपी585) रहा, तो ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार हर साल 1,950 करोड़ टन (19.5 ± 11.3 गीगाटन) तक पहुंच सकती है।

हालांकि, साथ ही वैज्ञानिकों ने इस बात की भी उम्मीद जताई है कि यदि तेजी से बढ़ते उत्सर्जन पर नियंत्रण (एसएसपी126) किया जाए तो इस गिरावट को काफी हद तक धीमा (2.3 ± 0.3 गीगाटन/वर्ष) किया जा सकता है।

अध्ययन ने चेताया है कि ग्लेशियरों का पिघलना सिर्फ पानी की कमी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नई और अस्थिर ग्लेशियल झीलों का निर्माण होगा, जो अचानक बाढ़ (जीएलओएफ) जैसी आपदाओं को जन्म दे सकती हैं। इसका असर कृषि, जल सुरक्षा, जलविद्युत परियोजनाओं और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

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बता दें कि यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा और वर्जीनिया टेक से जुड़े वैज्ञानिकों ने एक अन्य अध्ययन में दावा किया था कि एशिया के उंचें पहाड़ों (हाई माउंटेन एशिया) पर ग्लेशियर हर साल 22 गीगाटन से अधिक बर्फ खो रहे हैं।

अध्ययन एक कड़ी चेतावनी देता है कि यह संकट महज पहाड़ों की समस्या नहीं, बल्कि उन करोड़ों जिंदगियों का सवाल है जो इन बर्फीले भंडारों पर टिकी हैं। यदि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन पर अब भी लगाम न लगाई गई यह संकट और गहराता जाएगा। चिंता की बात है कि यदि अभी ठोस कदम न उठाए गए, तो एशिया की ये “जल टंकियां” आने वाले समय में सूखती हुई उम्मीदों का प्रतीक बन सकती हैं।

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