2026 में दर्ज हुआ जलवायु इतिहास का तीसरा सबसे गर्म अप्रैल, अल नीनो की आहट से बढ़ रहा 'बुखार'

दुनिया तेजी से जलवायु आपातकाल की ओर बढ़ रही है, जहां अप्रैल 2026 में वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया
गर्मी की परवाह किए बिना अपने परिवार की दो जून की रोटी का इंतजाम करने के लिए भरी दोपहरी में फसल काटता किसान; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
गर्मी की परवाह किए बिना अपने परिवार की दो जून की रोटी का इंतजाम करने के लिए भरी दोपहरी में फसल काटता किसान; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • अप्रैल 2026 ने दुनिया को एक बार फिर चेतावनी दी है कि जलवायु संकट अब भविष्य नहीं, बल्कि मौजूदा समय की कड़वी बड़ी सच्चाई बन चुका है।

  • कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) के मुताबिक, यह इतिहास का संयुक्त रूप से तीसरा सबसे गर्म अप्रैल रहा, जब वैश्विक औसत तापमान 14.89 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक है, यानी दुनिया पेरिस समझौते की 1.5 डिग्री की खतरनाक सीमा के बेहद करीब पहुंच चुकी है।

  • इस दौरान धरती के बढ़ते ‘बुखार’ का असर हर ओर दिखा। अरब देशों में अचानक आई बाढ़ ने जानें लीं, दक्षिणी अफ्रीका सूखे से झुलसता रहा और समुद्रों का तापमान 21 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो अप्रैल के लिए दूसरा सबसे ऊंचा स्तर है।

  • वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अल नीनो की वापसी से आने वाले महीनों में सूखा, बाढ़ और भीषण गर्मी और बढ़ सकती है।

  • उधर, आर्कटिक में समुद्री बर्फ सामान्य से पांच फीसदी कम रही, जबकि अंटार्कटिका में भी बर्फ तेजी से घट रही है। देखा जाए तो यह महज तापमान बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि उन करोड़ों किसानों-आम लोगों की आपबीती है जिनकी फसलें सूख रही हैं, घर बाढ़ में बह रहे हैं और जिनका भविष्य अब मौसम की अनिश्चितता के हवाले होता जा रहा है।

बढ़ते तापमान के बीच धरती मानो लगातार 'बुखार' में तप रही है। अप्रैल 2026 में दुनिया ने एक साथ कई जलवायु आपदाओं का सामना किया, जहां अरब देशों में अचानक आई बाढ़ ने लोगों की जिंदगियां निगल ली।

दक्षिणी अफ्रीका सूखे से तड़पता रहा, अल नीनो की आहट से समुद्र असामान्य रूप से गर्म हो गए और आर्कटिक की बर्फ तेजी से सिकुड़ती चली गई। सच यह है कि धरती पर बदलते मौसम का सबसे बड़ा बोझ अब आम लोग उठा रहे हैं। किसान सूखे से परेशान हैं, शहर बाढ़ से डूब रहे हैं और लाखों लोग असामान्य गर्मी के बीच जीने को मजबूर हैं।

अप्रैल 2026 के ताजा जलवायु आंकड़े बताते हैं कि यह संकट हर गुजरते साल के साथ और गहरा होता जा रहा है।

डेढ़ डिग्री सेल्सियस: खतरे की सीमा के करीब दुनिया

यूरोपीय जलवायु एजेंसी कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) ने अपने ताजा आंकड़ों में खुलासा किया है, कि पिछला महीना वैश्विक स्तर पर अब तक का तीसरा सबसे गर्म अप्रैल था। कॉपरनिकस द्वारा साझा आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल 2026 में वैश्विक स्तर पर सतह का औसत तापमान 14.89 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो 1991-2020 के औसत से 0.52 डिग्री सेल्सियस अधिक है।

वहीं यदि औद्योगिक काल से पहले (1850-1900) के आंकड़ों से तुलना करें तो पिछले महीने तापमान सामान्य से 1.43 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। बता दें कि इससे पहले अप्रैल 2020 में भी तापमान इतना ही दर्ज किया गया था।

 गौरतलब है कि पेरिस समझौते के तहत दुनिया ने तापमान में हो रही वृद्धि को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। लेकिन जिस तरह वैश्विक तापमान में इजाफा हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि जल्द ही यह लक्ष्मण रेखा पीछे रह जाएगा।

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विश्लेषण से पता चला है कि इससे पहले अब तक का सबसे गर्म अप्रैल 2024 में दर्ज किया गया था, जब सतह का औसत तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.58 डिग्री सेल्सियस अधिक था। वहीं दूसरे सबसे गर्म अप्रैल का रिकॉर्ड 2025 के नाम दर्ज है जब तापमान सामान्य से 1.51 डिग्री सेल्सियस अधिक रिकॉर्ड किया गया था।

देखा जाए तो यह महज तापमान के बढ़ते आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों जिंदगियों का सवाल है जो इस बढ़ते तापमान और चरम मौसम का शिकार बन रहे हैं।

वैज्ञानिक भी चेतावनी दे रहे हैं कि यह केवल मौसम में बदलाव नहीं, बल्कि एक ऐसी जलवायु आपातस्थिति का संकेत है, जिसका असर अब सीधे लोगों की जिंदगी, भोजन, पानी और भविष्य पर पड़ रहा है।

समुद्रों में बढ़ी गर्मी, तेज हुई अल नीनो की आहट

समुद्रों की हालत भी चिंताजनक है। रिपोर्ट में सामने आया है कि अप्रैल 2026 में समुद्र की सतह का औसत तापमान भी रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया। इस दौरान समुद्र की सतह का औसत तापमान 21 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो अप्रैल महीने के लिए अब तक का दूसरा सबसे ऊंचा स्तर है।

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वैज्ञानिकों के मुताबिक, आने वाले महीनों में अल नीनो की स्थिति बन सकती है। इसके संकेत पहले ही प्रशांत महासागर में दिखने लगे हैं, जहां समुद्री हीटवेव (लू) तेजी से बढ़ रही हैं। मध्य प्रशांत से लेकर अमेरिका और मेक्सिको के पश्चिमी तट तक समुद्र का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

गर्म होते समुद्र केवल आंकड़ों की कहानी बयां नहीं करते। इसका असर मछलियों, समुद्री पारिस्थितिकी, तूफानों और दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। यही गर्म समुद्र आगे चलकर अधिक तीव्र चक्रवात, भारी बारिश और सूखे जैसी चरम मौसमी आपदाओं को जन्म देते हैं।

अप्रैल 2026 यूरोप के लिए भी विरोधाभासों से भरा रहा। इस दौरान वहां औसत तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा, जिससे यह वहां का दसवां सबसे गर्म अप्रैल बन गया। यूरोप में अब तक का सबसे गर्म अप्रैल 2018 में दर्ज किया गया था।

हालांकि तस्वीर पूरे यूरोप में एक जैसी नहीं है। दक्षिण-पश्चिमी यूरोप में तेज गर्मी पड़ी और स्पेन ने अपना सबसे गर्म अप्रैल दर्ज किया। वहीं पूर्वी यूरोप में सामान्य से कम तापमान देखने को मिला।

बाढ़-सूखे की दोहरी मार

इस दौरान बारिश के पैटर्न में भी बड़ा अंतर दिखा। पश्चिमी और मध्य यूरोप सूखे की चपेट में रहे, जबकि ब्रिटेन, आयरलैंड, आइसलैंड, इटली, स्पेन के कुछ हिस्सों और पूर्वी यूरोप में सामान्य से अधिक बारिश हुई।

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इसी तरह दुनिया भर में पिछले महीने चरम मौसमी घटनाओं का कहर जारी रहा। अरब प्रायद्वीप में अचानक आई बाढ़ ने तबाही मचा दी। ईरान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब और सीरिया में भारी बारिश, भूस्खलन और बाढ़ ने लोगों की जिंदगियां निगल ली। दूसरी ओर दक्षिणी अफ्रीका सूखे की मार झेलता रहा।

अमेरिका, कनाडा, उत्तरी मेक्सिको, चीन, जापान और न्यूजीलैंड के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई, जबकि ऑस्ट्रेलिया, मध्य एशिया और दक्षिण अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में हालात अधिक शुष्क रहे।

तेजी से घट रही आर्कटिक में बर्फ

रुझानों पर नजर डालें तो धरती के उत्तरी ध्रुव यानी आर्कटिक में समुद्री बर्फ का विस्तार अप्रैल में सामान्य से करीब पांच फीसदी कम रहा।

यह पिछले 48 वर्षों के रिकॉर्ड में अप्रैल का दूसरा सबसे कम स्तर है। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2026 के दौरान आर्कटिक में समुद्री बर्फ का विस्तार 1.36 करोड़ वर्ग किलोमीटर रहा, जो सामान्य से 7 लाख वर्ग किलोमीटर कम है।

चिंता की बात यह है कि नवंबर 2025 से लगातार हर महीने आर्कटिक में समुद्री बर्फ रिकॉर्ड के सबसे निचले तीन स्तरों में बनी हुई है। वैज्ञानिक इसे तेजी से बदलती जलवायु का स्पष्ट संकेत मान रहे हैं।

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कुछ ऐसी ही स्थिति अंटार्कटिका में भी देखी गई, जहां बर्फ सामान्य से करीब 10 फीसदी कम रही।

सिर्फ आंकड़े नहीं, करोड़ों लोगों के भविष्य का सवाल

वैज्ञानिकों के मुताबिक, दुनिया अब उस खतरनाक सीमा के बेहद करीब पहुंच चुकी है, जिसके बाद सूखा, बाढ़, तूफान और लू जैसी आपदाएं और विनाशकारी हो सकती हैं।

कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) की उप निदेशक डॉक्टर सामंथा बर्गेस का इस बारे में कहना है, “अप्रैल 2026 यह साफ संकेत दे रहा है कि दुनिया में गर्मी लगातार बढ़ रही है। समुद्र का तापमान रिकॉर्ड स्तर के करीब है, समुद्री हीटवेव बढ़ रही हैं, आर्कटिक की बर्फ तेजी से घट रही है और यूरोप में तापमान व बारिश के पैटर्न में तीखे अंतर दिख रहे हैं। ये सभी एक ऐसी जलवायु के संकेत हैं जो लगातार चरम स्थितियों की ओर बढ़ रही है।”

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सच कहें तो धरती का यह बढ़ता 'बुखार' अब महज आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उन किसानों की चिंता है जिनकी फसलें सूख रही हैं, उन परिवारों का दर्द है जो बाढ़ में घर खो रहे हैं, और उन करोड़ों लोगों का भविष्य है जिनकी जिंदगी अब मौसम की अनिश्चितता पर निर्भर होती जा रही है।

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