

बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग दुनिया की फैशन आपूर्ति श्रृंखला की अहम कड़ी है, लेकिन इसके पीछे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता, ऊर्जा संकट और श्रमिकों की असुरक्षा की गंभीर तस्वीर भी छिपी है।
स्टैंड डॉट अर्थ रिसर्च ग्रुप (एसआरजी) के नए विश्लेषण के मुताबिक, दुनिया की 15 बड़ी फैशन कंपनियां अगर बांग्लादेश के स्वच्छ ऊर्जा बदलाव में पर्याप्त निवेश और सहयोग करें, तो 2040 तक करीब 8.59 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) उत्सर्जन रोका जा सकता है।
इन 15 कंपनियों की खरीदारी बांग्लादेश के कुल वस्त्र निर्यात का 26.3 फीसदी हिस्सा है।
विश्लेषण के अनुसार, 2040 में हर साल करीब 12.6 लाख टन सीओ₂ उत्सर्जन घटाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सिर्फ फैक्ट्रियों में सौर ऊर्जा लगाने से काम नहीं चलेगा। बिजली ग्रिड, अक्षय ऊर्जा और स्वच्छ तकनीकों के बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश की जरूरत होगी।
रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि ऊर्जा बदलाव केवल जलवायु का सवाल नहीं है। ऊर्जा संकट से उत्पादन और रोजगार प्रभावित होते हैं, जिसका सीधा असर श्रमिकों की आजीविका पर पड़ता है। ऐसे में बड़ी फैशन कंपनियों से सिर्फ स्वच्छ उत्पादन का वादा नहीं, बल्कि वित्तीय मदद, खरीद नीतियों में बदलाव और श्रमिकों की सुरक्षा के लिए ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
आज फैशन सिर्फ कपड़ों की चमक और बाजार की रफ्तार का नाम नहीं रह गया। इसके धागे अब सीधे हमारी धरती के भविष्य, ऊर्जा सुरक्षा और लाखों श्रमिकों की जिंदगी से जुड़ चुके हैं। ऐसा ही एक धागा बांग्लादेश से भी जुड़ा है।
बांग्लादेश की फैक्ट्रियों में तैयार होने वाले कपड़े आज दुनिया भर के बाजारों में पहुंचते हैं, लेकिन इनकी चमक के पीछे जीवाश्म ईंधनों पर भारी निर्भरता, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा संकट की एक गंभीर तस्वीर भी छिपी है।
एक नए विश्लेषण के मुताबिक, अगर दुनिया की सिर्फ 15 बड़ी फैशन कंपनियां बांग्लादेश के स्वच्छ ऊर्जा बदलाव में पर्याप्त निवेश और सहयोग करें, तो 2040 तक करीब 8.59 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) उत्सर्जन को रोका जा सकता है।
यानी फैशन उद्योग के छोटे-से बदलाव का असर सिर्फ कपड़ों की आपूर्ति श्रृंखला तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जलवायु संकट से जूझती धरती के लिए भी बड़ी राहत बन सकता है।
यह खुलासा स्टैंड डॉट अर्थ रिसर्च ग्रुप (एसआरजी) की नई रिपोर्ट 'फैशन्स फेयर शेयर: बांग्लादेश बायर्स क्लाइमेट अपॉर्च्युनिटी' में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन 15 कंपनियों की खरीदारी वजन के हिसाब से बांग्लादेश के कुल वस्त्र निर्यात का 26.3 फीसदी हिस्सा है।
यानी इन कंपनियों के पास न केवल देश के कपड़ा उद्योग में बदलाव की बड़ी क्षमता है, बल्कि उनके कारोबार से जुड़े ऊर्जा ढांचे को अधिक स्वच्छ और पर्यावरण अनुकूल बनाने में भूमिका निभाने की भी गुंजाइश है।
हर साल 12.6 लाख टन उत्सर्जन कम करने की संभावना
एसआरजी ने सीमा शुल्क और कंपनियों की सोर्सिंग से जुड़े आंकड़ों के आधार पर इन कंपनियों की खरीद क्षमता का आकलन किया और यह मॉडल तैयार किया कि अगर ये कंपनियां बांग्लादेश के बिजली ग्रिड और कपड़ा उद्योग में अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने में महत्वाकांक्षी कदम उठाएं तो कितना उत्सर्जन घटाया जा सकता है।
विश्लेषण के मुताबिक, 2040 में हर साल करीब 12.6 लाख टन सीओ₂ उत्सर्जन कम किया जा सकता है। 2040 तक यह कुल बचत 8.59 करोड़ टन तक पहुंच सकती है। रिपोर्ट इसे एक साल में उत्तरी अमेरिका के 30 लाख से अधिक घरों से होने वाले उत्सर्जन को खत्म करने के बराबर बताया है।
बांग्लादेश के कपड़ा निर्यात में इन कंपनियों की हिस्सेदारी भी काफी बड़ी है। 2025 में इंडिटेक्स, एच एंड एम ग्रुप और प्राइमार्क सबसे बड़े खरीदारों में शामिल थे और तीनों मिलकर देश के कपड़ा निर्यात का 11 फीसदी से अधिक हिस्सा खरीदते थे।
कपड़ों की कीमत के पीछे ऊर्जा संकट और श्रमिकों की मुश्किल
बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग फिलहाल ऊर्जा संकट से भी जूझ रहा है। जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता, बिजली की अनिश्चित आपूर्ति और गैस की कमी ने फैक्ट्रियों के संचालन को प्रभावित किया है। कई जगहों पर उत्पादन में बाधा आई है, जबकि कुछ फैक्ट्रियों में काम घटने या ईंधन की कमी के कारण बंद होने और छंटनी की स्थिति बनी है।
इसका सीधा असर उन श्रमिकों पर पड़ रहा है जिनकी रोजी-रोटी इन फैक्ट्रियों पर निर्भर है। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव केवल जलवायु संकट से निपटने का सवाल नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार और श्रमिकों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
बांग्लादेश के बिजली ग्रिड में अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी अभी 5 फीसदी से भी कम है। इसलिए केवल अलग-अलग फैक्ट्रियों में सौर ऊर्जा लगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे ऊर्जा तंत्र में बदलाव और बुनियादी ढांचे में निवेश की जरूरत है।
फैशन उद्योग का बढ़ता कार्बन बोझ
यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब फैशन उद्योग का जलवायु पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। ब्लूमबर्ग में प्रकाशित एपैरल इम्पैक्ट इंस्टीट्यूट के आंकड़ों के अनुसार, फैशन क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन 2023 में 7.5 और 2024 में 6.3 फीसदी बढ़ा है, जिससे इसका सालाना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़कर करीब 100 करोड़ टन तक पहुंच गया है।
गौरतलब है कि फैशन उद्योग में कपड़ों के उत्पादन के लिए कोयले और दूसरे जीवाश्म ईंधनों पर भारी निर्भरता है।
देखा जाए तो फैशन उद्योग दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में शामिल है और वैश्विक जलवायु प्रदूषण में करीब 4 फीसदी की हिस्सेदारी रखता है। इसका असर केवल जलवायु पर नहीं पड़ता, बल्कि प्रदूषण और खराब कामकाजी परिस्थितियों के जरिए आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े श्रमिकों और उनके समुदायों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
कंपनियों के दावों और जमीनी कार्रवाई में अंतर
एसआरजी ने अपने विश्लेषण में 15 कंपनियों की मौजूदा नीतियों और कार्रवाइयों का भी आकलन किया। इसमें पाया गया कि कंपनियों के जलवायु लक्ष्यों और वास्तविक समर्थन के बीच अभी काफी अंतर है।
सिर्फ दो कंपनियों—इंडिटेक्स और एच एंड एम ग्रुप ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला के लिए 100 फीसदी अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य तय किया है। वहीं सिर्फ चार कंपनियां आपूर्तिकर्ताओं के लिए वित्तीय सहायता से जुड़ी पहल में अपनी भागीदारी सार्वजनिक करती हैं। हालांकि, किसी के मामले में भी ऐसी अनुदान आधारित या बिना कर्ज वाली वित्तीय सहायता का मजबूत प्रमाण नहीं मिले हैं।
किसी भी कंपनी के पास अपने निर्माण केंद्रों के लिए ठोस जलवायु-अनुकूलन नीति नहीं मिली। केवल नेक्स्ट ने अपनी सप्लायरआचार संहिता में अत्यधिक गर्मी से जुड़े जोखिमों को शामिल किया है।
इसी तरह सिर्फ एच एंड एम ग्रुप, बेस्टसेलर और इंडिटेक्स ने ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के उद्देश्य से स्थानीय नीति-निर्माताओं के साथ सीधे जुड़ाव दिखाया।
रिपोर्ट के अनुसार, एच एंड एम ग्रुप ने निष्पक्ष ऊर्जा बदलाव के लिए वित्तीय सहायता और आपूर्तिकर्ताओं के समर्थन जैसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक कदम उठाए हैं। वहीं कई अन्य कंपनियों में इन क्षेत्रों में पर्याप्त कार्रवाई की कमी पाई गई।
कंपनियों से सिर्फ वादा नहीं, निवेश की मांग
स्टैंड डॉट अर्थ रिसर्च ग्रुप ने अपनी रिपोर्ट के साथ क्लीन एनर्जी इन्वेस्टमेंट पैक्ट नाम से एक नई पहल भी शुरू की है। इसके तहत 15 कंपनियों से अगले 18 महीनों में बांग्लादेश के ऊर्जा बदलाव के लिए ठोस समय और संसाधन लगाने की अपील की गई है।
संगठन चाहता है कि कंपनियां अपने आपूर्तिकर्ताओं को ऐसे अनुदान और वित्तीय सहायता दें, जिससे उन पर अतिरिक्त कर्ज का बोझ न पड़े। साथ ही, वे अक्षय ऊर्जा और बिजली आधारित स्वच्छ तकनीकों को बढ़ावा दें, अपनी कीमतों और खरीद अनुबंधों में ऊर्जा बदलाव की लागत को शामिल करें और श्रमिकों को अत्यधिक गर्मी व जलवायु आपदाओं से बचाने के ठोस उपाय करें।
इसके अलावा, कंपनियों से ऐसी सरकारी नीतियों के समर्थन में आवाज उठाने की अपील की गई है, जो अक्षय ऊर्जा की पहुंच बढ़ाने में मदद कर सकें।
स्टैंड डॉट अर्थ की सीनियर कॉरपोरेट क्लाइमेट कैंपेनर रेचल किचिन के मुताबिक, केवल साफ उत्पादन की मांग करना और उसका पूरा खर्च आपूर्तिकर्ताओं और श्रमिकों पर डाल देना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुसार, बड़ी खरीदार कंपनियों को ऊर्जा संकट का समाधान निकालने में भी भागीदार बनना होगा।
कौन चुकाएगा बदलाव की कीमत?
बांग्लादेश का कपड़ा उद्योग वैश्विक फैशन बाजार की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन जिस उत्पादन पर दुनिया की बड़ी फैशन कंपनियों का कारोबार टिका है, उसकी ऊर्जा संबंधी लागत और जलवायु जोखिम का बोझ अक्सर फैक्ट्री और श्रमिकों तक पहुंच जाता है।
ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा की ओर बदलाव का सवाल केवल यह नहीं है कि कितना कार्बन घटेगा। सवाल यह भी है कि इस बदलाव की कीमत कौन उठाएगा और क्या इसका लाभ उन श्रमिकों तक पहुंचेगा जो इस पूरी आपूर्ति श्रृंखला के सबसे निचले पायदान पर हैं।
स्टैंड डॉट अर्थ और उसके सहयोगी संगठनों का कहना है कि कंपनियों को अब वित्तीय सहायता, खरीद नीतियों में बदलाव, नीतिगत समर्थन और सार्वजनिक रूप से प्रगति की जानकारी देने के साथ आगे आना चाहिए।
लक्ष्य केवल कम कार्बन उत्सर्जन वाले कपड़े बनाना नहीं, बल्कि ऐसी आपूर्ति श्रृंखला तैयार करना होना चाहिए जिसमें धरती का तापमान कम करने के साथ श्रमिकों की सुरक्षा और आजीविका भी सुरक्षित रहे।