अध्ययन के अनुसार, उत्तर-पश्चिम भारत में गर्म और कम बारिश वाले अर्ध-शुष्क स्टेपी क्षेत्र का विस्तार हुआ है।  फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

प्रशांत महासागर का ‘विक्टोरिया मोड’ बदल रहा भारत की जलवायु, कहीं सूखा तो कहीं बढ़ रही गर्मी

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों के अध्ययन में पाया गया कि उत्तर भारत में सूखे का दायरा बढ़ रहा है

Dayanidhi

  • प्रशांत महासागर का विक्टोरिया मोड भारत की जलवायु बदलने में भूमिका निभा रहा है, जिससे कई क्षेत्रों में बारिश प्रभावित हो रही है।

  • उत्तर-पश्चिम भारत में शुष्क स्टेपी जलवायु का विस्तार हुआ, जबकि समशीतोष्ण जलवायु का क्षेत्रफल लगातार घटता दिखाई दिया है।

  • पूर्वोत्तर भारत और गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल में सवाना जलवायु का दायरा घटा, जबकि समशीतोष्ण क्षेत्र बढ़ा है।

  • दक्षिण भारत में अर्ध-शुष्क क्षेत्र सिकुड़ा, जबकि कोंकण, गोवा, तटीय कर्नाटक और केरल में मानसूनी जलवायु का विस्तार हुआ।

  • वैज्ञानिकों ने चेताया कि जलवायु में बदलाव से खेती, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और स्थानीय आबादी के विस्थापन की समस्याएं बढ़ सकती हैं।

भारत में मौसम का मिजाज धीरे-धीरे बदल रहा है। कहीं बारिश कम हो रही है, तो कहीं तापमान बढ़ने के साथ जलवायु का पुराना स्वरूप बदल रहा है। अब वैज्ञानिकों ने इस बदलाव के पीछे प्रशांत महासागर में होने वाली एक कम चर्चित समुद्री घटना की भूमिका की ओर इशारा किया है। इसे ‘विक्टोरिया मोड’ कहा जाता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के वैज्ञानिकों का यह अध्ययन मौसम विज्ञान की पत्रिका ‘मौसम’ में प्रकाशित किया गया है।

उत्तर भारत में बढ़ रहा सूखे का दायरा

अध्ययन के अनुसार, उत्तर-पश्चिम भारत में गर्म और कम बारिश वाले अर्ध-शुष्क स्टेपी क्षेत्र का विस्तार हुआ है। साल1951-80 में इस क्षेत्र का हिस्सा 25.7 प्रतिशत था, जो 1991-2020 में बढ़कर 33.1 प्रतिशत हो गया। इसके उलट, अपेक्षाकृत ठंडी और समशीतोष्ण जलवायु वाला क्षेत्र 25.8 प्रतिशत से घटकर 18.7 प्रतिशत रह गया।

इस बदलाव का असर उत्तर प्रदेश में भी दिखाई दे रहा है। स्टेपी जलवायु का पूर्वी किनारा पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आगे बढ़कर राज्य के पूर्वी हिस्से तक पहुंच गया है। पश्चिम विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे इलाके, जो पहले अधिकतर उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु में आते थे, अब बड़े पैमाने पर शुष्क स्टेपी क्षेत्र में शामिल हो गए हैं।

स्टेपी का मतलब रेगिस्तान नहीं है। यह ऐसी जलवायु है जहां बारिश सीमित होती है और साल का औसत तापमान आम तौर पर 18 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक रहता है।

पूर्वोत्तर और बंगाल में भी बदला मौसम

देश के पूर्वोत्तर हिस्से में भी जलवायु का नक्शा बदल रहा है। यहां गर्म उष्णकटिबंधीय सवाना क्षेत्र का हिस्सा 18.4 प्रतिशत से घटकर 11.8 प्रतिशत रह गया। वहीं, समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्र का विस्तार 74.8 प्रतिशत से बढ़कर 82.5 प्रतिशत हो गया।

गंगा के मैदानी हिस्से वाले पश्चिम बंगाल में भी सवाना जलवायु से समशीतोष्ण जलवायु की ओर बदलाव दर्ज किया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों, बिहार तथा गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल में बारिश की कमी इस बदलाव की अहम वजह हो सकती है।

क्या है विक्टोरिया मोड?

विक्टोरिया मोड प्रशांत महासागर के उत्तरी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाले बदलावों का एक नियमित पैटर्न है। इसमें समुद्र के कुछ हिस्से अपेक्षाकृत गर्म और कुछ ठंडे होते हैं। यह प्रशांत महासागर के एक अन्य चर्चित जलवायु पैटर्न ‘पैसिफिक डेकाडल ऑसिलेशन’ (पीडीओ) से अलग है।

अध्ययन के मुताबिक, विक्टोरिया मोड के नकारात्मक चरण में उत्तरी भारत की ओर आने वाली नमी कम हो सकती है। इससे बारिश प्रभावित होती है और लंबे समय में क्षेत्र की जलवायु का स्वरूप बदल सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में विक्टोरिया मोड और अल नीनो के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं किया है।

दक्षिण भारत में बढ़ा मानसूनी जलवायु क्षेत्र

जहां उत्तर भारत में शुष्क जलवायु का विस्तार हुआ, वहीं प्रायद्वीपीय भारत में इसका उलटा रुझान दिखाई दिया। यहां गर्म और अर्ध-शुष्क स्टेपी क्षेत्र का हिस्सा 1951-80 के 30.3 प्रतिशत से घटकर 1991-2020 में 16.4 प्रतिशत रह गया। इसके मुकाबले उष्णकटिबंधीय सवाना क्षेत्र 61.6 प्रतिशत से बढ़कर 75.7 प्रतिशत हो गया।

कोंकण, गोवा, तटीय कर्नाटक, केरल और माहे में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु का विस्तार भी दर्ज किया गया। वहीं, पश्चिमी सौराष्ट्र और कच्छ में पूरी तरह शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों का कुछ हिस्सा अर्ध-शुष्क श्रेणी में आ गया।

खेती, पानी और लोगों पर क्या होगा असर?

जलवायु में इस तरह के बदलाव केवल मौसम के आंकड़ों तक सीमित नहीं हैं। बारिश का पैटर्न बदलने से खेती, भूजल, जलाशयों और स्थानीय आजीविका पर असर पड़ सकता है। यदि किसी क्षेत्र में लंबे समय तक नमी और बारिश घटती है, तो किसानों को फसल चुनने और सिंचाई की व्यवस्था बदलने की जरूरत पड़ सकती है।

अध्ययन के लेखकों ने चेतावनी दी है कि सवाना और समशीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों के लगातार सिकुड़ने या खत्म होने से खाद्य सुरक्षा और स्थानीय आबादी के विस्थापन जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

तीस साल के आंकड़ों से समझा बदलाव

वैज्ञानिकों ने भारत के मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए देश को तापमान और बारिश के आधार पर अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों में बांटा। इसके लिए लगभग 25 किलोमीटर के वर्गों में उपलब्ध मौसम आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। फिर पांच अलग-अलग 30-वर्षीय अवधियों में इन क्षेत्रों के फैलाव और बदलाव की तुलना की गई।

यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन की कहानी हर जगह एक जैसी नहीं है। कहीं सूखे का दायरा बढ़ रहा है, तो कहीं मानसूनी जलवायु फैल रही है। विक्टोरिया मोड की भूमिका को बेहतर ढंग से समझना आने वाले वर्षों में भारत के मौसम, खेती और जल सुरक्षा की चुनौतियों का अनुमान लगाने में मददगार हो सकता है।