

छोटे खेतों के बावजूद भारतीय किसान सरकारी मदद, फसल बीमा और आमदनी के दूसरे साधनों से जलवायु संकट का मुकाबला कर रहे हैं।
बिट्स पिलानी के अध्ययन में 162 सूखे और अर्ध-सूखे जिलों के किसानों की जलवायु से लड़ने की क्षमता का आकलन किया गया।
फसल बीमा, बैंक से कर्ज और मनरेगा जैसी योजनाएं किसानों को मौसम की मार से उबरने में मददगार साबित हुईं।
खेती के साथ पशुपालन, मजदूरी और दूसरे काम अपनाकर छोटे किसान अपनी आमदनी बढ़ा रहे हैं और जोखिम कम कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने सूखा प्रभावित इलाकों में जल संरक्षण, मौसम की जानकारी, आसान कर्ज और सरकारी सहायता बढ़ाने पर जोर दिया।
भारत के सूखे और अर्ध-सूखे इलाकों में खेती करना किसी चुनौती से कम नहीं है। कभी बारिश समय पर नहीं होती, तो कभी बादल बरसते ही नहीं। कहीं सूखा फसल को निगल जाता है, तो कहीं बेमौसम बारिश किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेर देती है। ऐसे मुश्किल हालात में भी देश के किसान हार मानने को तैयार नहीं हैं। वे खेती के नए तरीके अपना रहे हैं, आमदनी के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं और सरकारी योजनाओं का सहारा लेकर अपनी जिंदगी को सुरक्षित बनाने में जुटे हैं।
बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बिट्स), पिलानी के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने में सिर्फ बड़ा खेत ही किसानों की ताकत नहीं है। बैंक से कर्ज, फसल बीमा, सरकारी सहायता और सही समय पर मौसम की जानकारी भी किसानों को मुश्किलों से उबारने में बड़ी भूमिका निभाती है। यह शोध एनवायरमेंट, डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
खेत छोटा, लेकिन हौसला बड़ा
भारत के गांवों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमीन का बंटवारा होता रहा है। दादा की जमीन बेटों में बंटी और फिर अगली पीढ़ी में खेत और छोटे होते चले गए। नतीजा यह है कि कई किसानों के पास अब एक हेक्टेयर से भी कम जमीन बची है।
आमतौर पर माना जाता है कि छोटा खेत होने से किसान की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। लेकिन अध्ययन एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखता है। कई छोटे किसान अपने परिवार के सदस्यों की मेहनत, खेती के साथ दूसरे काम और सरकारी सहायता के सहारे बेहतर तरीके से संकट का सामना कर पा रहे हैं।
कोई खेती के साथ पशुपालन करता है, तो कोई मजदूरी या छोटा-मोटा कारोबार करके आमदनी बढ़ाता है। इस तरह फसल खराब होने पर भी परिवार के पास कमाई का दूसरा रास्ता बचा रहता है। यानी खेत का आकार छोटा हो सकता है, लेकिन समझदारी से उठाए गए कदम किसान की ताकत बढ़ा सकते हैं।
बैंक का कर्ज और फसल बीमा बने सहारा
मुसीबत के समय किसान को सिर्फ मेहनत नहीं, पैसों की भी जरूरत होती है। सूखा पड़ने पर अगली फसल बोने के लिए बीज, खाद और सिंचाई का इंतजाम करना आसान नहीं होता। ऐसे में संस्थागत कर्ज और फसल बीमा बड़ी राहत बन सकते हैं।
शोध में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई), बैंकों से मिलने वाले संस्थागत ऋण और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के जॉब कार्ड जैसे उपायों को किसानों की अनुकूलन क्षमता बढ़ाने में मददगार पाया गया।
अध्ययन के अनुसार, इन तीनों उपायों में से प्रत्येक का अनुकूलन क्षमता के सूचकांक पर लगभग आठ प्रतिशत का सकारात्मक प्रभाव दर्ज किया गया। इसका अर्थ यह है कि बीमा, कर्ज और रोजगार सहायता जैसी सुविधाएं किसानों को मौसम की मार झेलने और दोबारा खेती शुरू करने में मदद दे सकती हैं।
सही जानकारी भी है बड़ी पूंजी
किसान के लिए मौसम की जानकारी किसी खजाने से कम नहीं। अगर उसे समय रहते पता चल जाए कि बारिश देर से होगी, तो वह बुवाई की योजना बदल सकता है। नई खेती तकनीकों, सरकारी योजनाओं और बाजार की जानकारी से भी उसे नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है।
अध्ययन बताता है कि आर्थिक मदद और जानकारी एक-दूसरे की पूरक हैं। सिर्फ पैसा होने से हर समस्या हल नहीं होती और सिर्फ जानकारी होने से भी काम नहीं चलता। किसान के पास सही जानकारी हो और उसे अमल में लाने के लिए जरूरी संसाधन भी हों, तभी उसका फायदा मिलता है।
162 जिलों में परखी गई किसानों की क्षमता
शोधकर्ताओं ने भारत के 162 सूखे और अर्ध-सूखे जिलों का अध्ययन किया। इसके लिए उन्होंने 2012-13 और 2018-19 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आंकड़ों की तुलना की। साथ ही, मौसम और सूखे से जुड़ी जानकारी का भी इस्तेमाल किया।
किसानों की स्थिति समझने के लिए एक समग्र अनुकूलन क्षमता सूचकांक (एसीआई) बनाया गया। इसमें जमीन और दूसरी संपत्तियों, शिक्षा, सामाजिक सहयोग, आर्थिक संसाधनों, जानकारी और आमदनी के अलग-अलग साधनों जैसे पहलुओं को शामिल किया गया।
इससे यह समझने में मदद मिली कि किन संसाधनों के सहारे किसान जलवायु से जुड़ी चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकते हैं।
योजनाएं ऐसी हों, जो गांव की जरूरत समझें
अध्ययन का संदेश साफ है। हर इलाके के लिए एक जैसी कृषि नीति बनाना काफी नहीं होगा। जहां सूखे का खतरा ज्यादा है, वहां फसल बीमा और मौसमी कर्ज को साथ उपलब्ध कराया जा सकता है। जिन गांवों तक मौसम और खेती की जानकारी नहीं पहुंचती, वहां डिजिटल सलाह सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत है।
मनरेगा के तहत तालाब, खेत-तालाब और जल संरक्षण जैसे कामों को बढ़ावा देने से गांवों में पानी बचाने और खेती को टिकाऊ बनाने में मदद मिल सकती है।
आखिरकार, जलवायु परिवर्तन से लड़ाई केवल खेतों में नहीं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा, शिक्षा, जानकारी और सरकारी सहयोग के मोर्चे पर भी लड़ी जानी है। किसान के पास भले ही जमीन कम हो, लेकिन अगर उसे सही समय पर सही सहारा मिले, तो वह बदलते मौसम के सामने मजबूती से खड़ा हो सकता है।