

जलवायु संकट अब सिर्फ बढ़ते तापमान और बदलते मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारी सांसों में भी घुल रहा है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की नई रिपोर्ट ने वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के बीच बढ़ते खतरनाक संबंध को उजागर किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, 1990 के दशक के बाद से दुनिया में भारी धुएं वाली जंगल की आग की घटनाएं करीब तीन गुना बढ़ गई हैं, जिनसे 2010–2018 के दौरान हर साल करीब 1 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान है।
जंगलों की आग से हर साल करीब 14.3 करोड़ टन जहरीले कार्बनिक प्रदूषक हवा में पहुंच रहे हैं, जबकि पारंपरिक मॉडल इनके स्वास्थ्य प्रभावों और मौतों को 93 फीसदी तक कम आंक सकते हैं।
बढ़ती गर्मी और लू जमीन के पास ओजोन प्रदूषण को भी बढ़ा रही है, जिससे समय से पहले मौतों का खतरा और गहरा सकता है।
भारत के लिए चिंता और बड़ी है, क्योंकि 2025 में यहां पीएम2.5 का स्तर लंबे समय के औसत से ऊपर रहा।
डब्ल्यूएमओ का संदेश साफ है—साफ हवा और स्थिर जलवायु की लड़ाई अब अलग-अलग नहीं लड़ी जा सकती।
साफ हवा में सांस लेना हर इंसान का अधिकार है, लेकिन बदलती जलवायु इस अधिकार को लगातार चुनौती दे रही है। जंगलों में भड़कती आग, बढ़ती गर्मी और लंबे समय तक चलने वाली लू न केवल तापमान को बढ़ा रही हैं, बल्कि हवा में घुलने वाले जहरीले प्रदूषकों के बोझ को भी बढ़ा रही हैं। इससे वायु गुणवत्ता में सुधार लाने और मानव स्वास्थ्य व पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की वैश्विक कोशिशों पर असर पड़ सकता है।
7 सितंबर को ‘इंटरनेशनल डे ऑफ क्लीन एयर फॉर ब्लू स्काइज’ के अवसर पर विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने अपनी नई रिपोर्ट में वायु गुणवत्ता और जलवायु परिवर्तन के बीच गहरे संबंध को उजागर किया है।
रिपोर्ट ने चेताया है कि जलवायु परिवर्तन और जहरीली हवा अब दो अलग-अलग संकट नहीं रहे, बल्कि एक-दूसरे को और विकराल बनाने वाले खतरनाक चक्र में बदल चुके हैं। बढ़ती गर्मी प्रदूषण को हवा में और जहरीला बना रही है, जबकि प्रदूषण जलवायु संकट को और गहरा कर रहा है। इस दुष्चक्र की सबसे भारी कीमत इंसानी सेहत, जंगलों, खेती और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को चुकानी पड़ रही है।
रिपोर्ट में डब्ल्यूएमओ के ग्लोबल एटमॉस्फियर वॉच नेटवर्क से मिले आंकड़ों और दुनिया भर के वैज्ञानिकों के शोध को शामिल किया है। संदेश बेहद स्पष्ट है कि वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को अलग-अलग समस्याओं की तरह नहीं देखा जा सकता। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, इसलिए इनके समाधान के लिए भी समन्वित नीतियों की जरूरत है।
पीएम2.5: फेफड़ों से खून तक पहुंचने वाला खतरा
गौरतलब है पीएम2.5, प्रदूषण के बेहद महीन कण होते हैं, जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर से भी कम होता है। यही महीन आकार उन्हें बेहद खतरनाक बनाता है। ये सांस के साथ फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और रक्त में भी प्रवेश कर सकते हैं। इनका उत्सर्जन उद्योगों, परिवहन, कृषि, घरों में ईंधन जलाने, जंगल की आग और धूल भरी आंधियों सहित कई स्रोतों से होता है।
डब्ल्यूएमओ के अनुसार, 2025 में उत्तरी कनाडा, रूस के कुछ हिस्सों और पश्चिम-मध्य अफ्रीका में पीएम2.5 का स्तर लंबे समय के औसत से अधिक रहा। इसकी बड़ी वजह आग की बढ़ती घटनाएं रहीं। पश्चिमी-मध्य स्पेन भी 2025 की गर्मियों के अंत में लगी असाधारण जंगल की आग के कारण प्रदूषण का हॉटस्पॉट बना। वहीं, दक्षिण अमेरिका के अमेजोनिया क्षेत्र में 2025 में आग से होने वाला प्रदूषण पिछले वर्षों की तुलना में कम रहा।
चीन में मानवीय गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन में कमी के कारण पीएम2.5 का स्तर लंबे समय के औसत से नीचे रहा। इसके विपरीत भारत में पीएम2.5 का स्तर औसत से अधिक बना रहा। इसके पीछे बायोमास जलाने और अन्य प्रदूषण स्रोतों की बड़ी भूमिका रही।
इस बार डब्ल्यूएमओ ने पहली बार चार अलग-अलग मॉडलिंग स्रोतों के परिणामों को शामिल किया। मॉडलों और उनके इनपुट में अंतर होने के बावजूद उनके नतीजे काफी हद तक एक-दूसरे के अनुरूप रहे, जिससे वायुमंडलीय प्रक्रियाओं की समझ को मजबूती मिलती है।
जंगल की आग से पैदा धुआं बन रहा है नया स्वास्थ्य संकट
रिपोर्ट के मुताबिक जंगलों में धधकती आग अब महज जंगलों तक सीमित समस्या नहीं रही। उसका धुआं दूर-दूर तक पहुंचकर लाखों लोगों की सांसों में जहर घोल सकता है।
डब्ल्यूएमओ ने पुष्टि की है कि, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में उद्योगों और परिवहन से होने वाले पीएम2.5 उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन जंगल की आग से निकलने वाले महीन कणों के संपर्क में बढ़ोतरी हुई है।
रिपोर्ट में शामिल एक अध्ययन के अनुसार, 1990 के दशक के बाद से दुनिया में भारी धुएं वाली जंगल की आग की घटनाएं करीब तीन गुणा बढ़ गई हैं। 2010 से 2018 के बीच इनसे हर साल करीब 100,000 अतिरिक्त मौतें होने का अनुमान लगाया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे भी अधिक हो सकती है।
एक अध्ययन के मुताबिक जंगलों की आग से हर साल 14.3 करोड़ टन जहरीले कार्बनिक प्रदूषक हवा में घुल रहे हैं, जो पिछले अनुमानों से 21 फीसदी अधिक है।
चिंता की एक और वजह यह है कि जंगल की आग के धुएं को सामान्य पीएम2.5 जितना ही खतरनाक मान लेना जोखिम को कम करके आंक सकता है। एक अध्ययन के अनुसार, पारंपरिक जोखिम मॉडल जंगल की आग से होने वाली मौतों का अनुमान 93 फीसदी तक कम कर सकते हैं, क्योंकि आग से निकलने वाले कण कहीं अधिक जहरीले हो सकते हैं।
डब्ल्यूएमओ ने चेतावनी दी है कि आने वाले वर्षों में जंगल की भीषण आग की घटनाएं और बढ़ सकती हैं। इससे हवा में प्रदूषण का खतरा भी बढ़ेगा और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सुरक्षित वायु गुणवत्ता मानकों को हासिल करना और मुश्किल हो जाएगा।
बढ़ती गर्मी के साथ ओजोन का खतरा
वैज्ञानिकों के मुताबिक लू सिर्फ शरीर को नहीं तपाती, बल्कि हवा की रासायनिक संरचना को भी बदल देती है।
जमीन के पास बनने वाला ओजोन मानव स्वास्थ्य, कृषि और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से खासतौर पर सांस संबंधी बीमारियों के कारण होने वाली मौतों का जोखिम बढ़ सकता है।
इसी तरह बढ़ता तापमान, हवा का एक जगह ठहर जाना और तेज धूप जमीन के पास ओजोन बनने के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करते हैं। दक्षिण-पूर्वी अमेरिका, यूरोप और चीन में लू के दौरान किए गए अध्ययनों में इसका पुख्ता प्रमाण मिले हैं।
मतलब साफ है कि जैसे-जैसे गर्मी बढ़ेगी, ओजोन प्रदूषण का खतरा भी बढ़ सकता है और इससे समय से असमय मौतों की संख्या में हजारों की वृद्धि हो सकती है। डब्ल्यूएमओ के अनुसार, आने वाले वर्षों में ओजोन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम और गंभीर होने की आशंका है।
सीमाएं नहीं मानते हवा में उड़ते प्रदूषक
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि एयरोसोल के महीन कण हवा के साथ हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं। वे समुद्र और महाद्वीपों को पार कर सकते हैं और वायुमंडल में पहुंचकर सूर्य के प्रकाश के परावर्तन को प्रभावित कर सकते हैं।
चिंता की बात है कि इनका असर केवल हवा तक सीमित नहीं रहता। वे जमीन और जलस्रोतों की रासायनिक प्रकृति को बदल सकते हैं और उन जगहों को भी प्रदूषित कर सकते हैं जो उनके स्रोत से बहुत दूर हैं।
इसका एक उदाहरण ब्लैक कार्बन यानी कालिख है। जब यह बर्फ और हिम पर जमती है तो सूर्य के प्रकाश को वापस परावर्तित करने की क्षमता कम हो जाती है। इससे बर्फ तेजी से पिघल सकती है और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार और बढ़ सकती है।
माइक्रोप्लास्टिक: हवा में भी पहुंच चुका प्लास्टिक
एक और समस्या प्लास्टिक को लेकर है, जो अब केवल जमीन और समुद्र की समस्या नहीं रहा। धूप और दूसरे प्राकृतिक कारकों से प्लास्टिक टूटकर बेहद छोटे कणों में बदल जाता है, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहते हैं। ये कण वायुमंडल, जमीन और समुद्र, हर जगह पाए जा रहे हैं।
एक अर्थ सिस्टम मॉडल के अनुमान के अनुसार, जमीन पर करीब 5.1 करोड़ टन और समुद्र में करीब 2.2 करोड़ टन माइक्रोप्लास्टिक मौजूद हो सकता है। यही कण आगे चलकर वायुमंडल में भी पहुंच सकते हैं। हालांकि, इनके वास्तविक स्तर को लेकर अभी काफी अनिश्चितता है, क्योंकि लंबे समय और व्यापक स्तर पर निगरानी की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
डब्ल्यूएमओ के अनुसार, दुनिया में प्लास्टिक उत्पादन और खासकर गलत तरीके से प्रबंधित प्लास्टिक कचरा बढ़ता रहा तो दूरदराज के इलाकों तक माइक्रोप्लास्टिक के पहुंचने और जमने की प्रक्रिया पर निगरानी बेहद जरूरी होगी। तभी पृथ्वी की जलवायु और पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके वास्तविक प्रभाव को समझा जा सकेगा।
संदेश साफ है: साथ लड़नी होगी हवा और जलवायु की लड़ाई
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट एक अहम चेतावनी देती है, जलवायु बदल रही है तो हवा भी बदल रही है, और हवा में बदलाव जलवायु को फिर प्रभावित कर रहा है।
जंगल की आग पीएम2.5 बढ़ा रही है, बढ़ती गर्मी जमीन के पास ओजोन का निर्माण बढ़ा रही है और माइक्रोप्लास्टिक व ब्लैक कार्बन जैसे कण हवा से दूर-दूर तक पहुंच रहे हैं। इसका असर अंततः इंसानी फेफड़ों, खेती, पानी, जंगलों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहा है।
इसलिए साफ हवा के लिए सिर्फ प्रदूषण के स्रोतों को कम करना पर्याप्त नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाना, जंगलों को बचाना, प्रदूषण की बेहतर निगरानी करना और वायु गुणवत्ता व जलवायु नीतियों को एक साथ लागू करना अब समय की जरूरत है। क्योंकि आखिरकार, साफ आसमान केवल बेहतर मौसम की निशानी नहीं, यह स्वस्थ जीवन की पहली शर्त है।