2025-26 में गाजियाबाद सबसे प्रदूषित, उत्तर भारत में लगातार बिगड़े हालात: रिपोर्ट

रिपोर्ट में सामने आया है कि सबसे बड़ी कामयाबी देहरादून ने हासिल की, जहां 2017-18 की तुलना में पीएम10 में 75 फीसदी की गिरावट आई है।
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सारांश
  • एनसीएपी के सात वर्ष बाद भी देश में साफ हवा की लड़ाई अधूरी नजर आ रही है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के ताजा विश्लेषण से पता चला है कि 2025-26 में गाजियाबाद सबसे प्रदूषित शहर रहा, जहां पीएम10 स्तर माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया, जबकि दिल्ली और नोएडा भी तीन गुना से ज्यादा प्रदूषण के साथ दूसरे-तीसरे स्थान पर रहे।

  • हालांकि 79 शहरों में सुधार दर्ज हुआ और देहरादून ने 75 फीसदी की गिरावट के साथ मिसाल पेश की, लेकिन 14 शहरों में प्रदूषण बढ़ना चिंता बढ़ाता है।

  • मार्च 2026 में भी हालात बेहतर नहीं दिखे इस दौरान गुरुग्राम सबसे प्रदूषित रहा और महज तीन शहर ही डब्ल्यूएचओ के सुरक्षित मानकों तक पहुंच पाए। हरियाणा और उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में रहे।

  • साफ है कि सुधार के बावजूद देश के ज्यादातर शहर अब भी जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं और ठोस, वैज्ञानिक कदमों के बिना यह संकट और गहराने का खतरा है।

देश में साफ हवा का सपना अब भी हकीकत से दूर है। राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के सात साल पूरे होने के बावजूद, वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि बहुत कम शहर ही तय लक्ष्यों तक पहुंच पाए हैं। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 के बीच 96 शहरों के पीएम10 से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण में यह सच्चाई सामने आई है।

इस दौरान सबसे चिंताजनक तस्वीर उत्तर भारत से सामने आई। आंकड़ों के मुतबिक 2025-26 के दौरान गाजियाबाद में पीएम10 का वार्षिक औसत 215 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो राष्ट्रीय मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) के तीन गुणा से भी अधिक है।

उत्तर भारत में सबसे खराब हालात

इसके बाद दिल्ली 201 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के साथ दूसरे जबकि नोएडा (195 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) तीसरे स्थान पर रहा। यानी राजधानी और उसके आसपास के शहरों में लोग अब भी जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं।

हालांकि, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। 2017-18 के बेसलाइन की तुलना में 79 शहरों में सुधार दर्ज किया गया, लेकिन 14 शहरों में प्रदूषण बढ़ा है, जबकि तीन में कोई बदलाव नहीं हुआ।

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सबसे बड़ी राहत यह रही कि 27 शहरों में पीएम10 स्तर 40 फीसदी से ज्यादा घटा है। उत्तर प्रदेश के नौ शहर इस लिस्ट में शामिल हैं, जबकि महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, पंजाब और राजस्थान के कई शहरों ने भी उल्लेखनीय प्रगति दिखाई।

रिपोर्ट में सामने आया है कि सबसे बड़ी कामयाबी देहरादून ने हासिल की, जहां 2017-18 की तुलना में पीएम10 में 75 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं विशाखापट्टनम में हालात उलटे रहे, यहां प्रदूषण का स्तर 73 फीसदी तक बढ़ गया। दिल्ली ने 17 फीसदी की कमी दर्ज की, लेकिन यह कमी अब भी सुरक्षित स्तर से बहुत दूर है।

देहरादून बना मिसाल, विशाखापट्टनम में बढ़ा खतरा

राज्यवार देखें तो पीएम10 में बढ़ोतरी के मामले में ओडिशा सबसे आगे रहा, जहां पांच शहरों में प्रदूषण बढ़ा। इसके बाद मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश के दो-दो शहरों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। वहीं असम, बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में एक-एक शहर में बेसलाइन वर्ष की तुलना में प्रदूषण बढ़ा है।

विशेषज्ञों की मानें तो चिंता की वजह साफ है। सीआरईए के विश्लेषक मनोज कुमार का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है कि "कई शहर अभी भी लक्ष्य से काफी पीछे हैं, और कुछ जगहों पर प्रदूषण बढ़ना गंभीर संकेत है।"

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उनके अनुसार, अब अगले चरण में जरूरी है कि वैज्ञानिक और ठोस उपाय अपनाए जाएं, और फंडिंग सीधे उन प्रमुख स्रोतों पर खर्च हो जहां से सबसे ज्यादा प्रदूषण फैल रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में कई नए शहर ‘नॉन-अटेनमेंट’ श्रेणी में आ गए हैं, इसलिए उभरते प्रदूषण हॉटस्पॉट्स को शामिल करना, क्षेत्रीय स्तर पर रणनीति बनाना और सख्त उत्सर्जन मानकों को लागू करना बेहद जरूरी है।

विश्लेषण में मार्च 2026 से जुड़े आंकड़े भी साझा किए हैं, वो भी कुछ ऐसी ही कहानी कहते हैं। सीआरईए रिपोर्ट दर्शाती है कि 251 शहरों में से 220 शहर पीएम2.5 के लिए जारी राष्ट्रीय मानक के भीतर जरूर रहे, लेकिन महज तीन शहर ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सख्त मानकों (15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) पर खरे उतरे।

इस दौरान गुरुग्राम देश का सबसे प्रदूषित शहर रहा, जहां पीएम2.5 का औसत स्तर 116 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। इसके बाद बहादुरगढ़, फरीदाबाद, सिंगरौली, मंडीदीप, गाजियाबाद, मानेसर, भिवाड़ी, नोएडा और नांदेड़ जैसे शहर टॉप-10 प्रदूषित शहरों में शामिल रहे।

राज्यों की तस्वीर भी चिंता बढ़ाने वाली है। हरियाणा सबसे ज्यादा प्रभावित रहा, जहां 24 में से नौ शहर राष्ट्रीय मानकों से ऊपर दर्ज किए गए। उत्तर प्रदेश भी पीछे नहीं रहा, यहां 21 में से 8 शहरों ने तय सीमा को पार कर दिया।

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साफ है कि यह आंकड़े महज संख्या नहीं बल्कि एक चेतावनी भी हैं। साफ हवा के लिए जारी जंग अब निर्णायक मोड़ पर है। ऐसे में अगर अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में सांस लेना और भी मुश्किल हो सकता है।

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