सिर्फ साफ हवा काफी नहीं, बेहतर इलाज और गरीबी से मुक्ति भी बनते हैं जीवन की ढाल

नए वैश्विक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि 1990 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण से मौतों में आई गिरावट का आधे से अधिक श्रेय बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, गरीबी में कमी और सामाजिक सुधारों को जाता है।
फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • नया वैश्विक अध्ययन बताता है कि वायु प्रदूषण से जंग केवल हवा साफ से नहीं जीती जा सकती। पिछले तीन दशकों में प्रदूषण से होने वाली मौतों में आई बड़ी गिरावट के पीछे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबी में कमी और जीवन स्तर में सुधार की उतनी ही अहम भूमिका रही है जितनी उत्सर्जन घटाने की।

  • अध्ययन स्पष्ट करता है कि जब तक समाज के कमजोर वर्गों को बेहतर इलाज, पोषण और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक जहरीली हवा का सबसे घातक असर उन्हीं पर पड़ता रहेगा।

  • यानी प्रदूषण के खिलाफ असली लड़ाई सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सामाजिक असमानता के मोर्चे पर भी लड़नी होगी।

हर साल जहरीली हवा दुनिया भर में लाखों लोगों की सांसें छीन लेती है और अनगिनत परिवारों को अपनों से बिछड़ने का दर्द दे जाती है। लेकिन अब एक नए वैश्विक अध्ययन ने यह अहम सच सामने रखा है कि वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को रोकने के लिए केवल उत्सर्जन को कम करना काफी नहीं।

अध्ययन में खुलासा हुआ है कि, गरीबी में कमी, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और इलाज तक आसान पहुंच ने भी दुनिया भर में लाखों जिंदगियों को बचाने में उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह सही है कि साफ हवा जीवन बचाने का अहम जरिया है, लेकिन पिछले तीन दशकों में वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में आई बड़ी कमी के पीछे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, गरीबी में कमी और लोगों की जीवन-स्थितियों में सुधार की भी निर्णायक भूमिका रही है।

नतीजे दर्शाते हैं कि 1990 से 2019 के बीच दुनिया भर में वायु प्रदूषण से होने वाली मृत्युदर में 45 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। अहम बात यह है कि इस कमी का करीब 52 फीसदी हिस्सा महज प्रदूषण घटने से नहीं, बल्कि बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं, गरीबी में कमी और जीवन स्तर में सुधार की वजह से संभव हुआ।

रिपोर्ट से पता चला है कि इस दौरान कई क्षेत्रों में तो हवा की गुणवत्ता में खास सुधार नहीं हुआ, फिर भी मौतों में कमी आई, सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां लोगों की ‘संवेदनशीलता’ कम हुई। बता दें कि यहां 'लोगों की संवेदनशीलता' का तात्पर्य उस स्थिति या कमजोरी से है जो किसी व्यक्ति को वायु प्रदूषण से होने वाले नुकसान के प्रति अधिक असुरक्षित बनाती है।

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यह अध्ययन स्टॉकहोम एनवायरमेंट इंस्टीट्यूट (एसईआई) और यूनिवर्सिटी ऑफ यॉर्क से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित हुए हैं।

हो सकती थे 17 लाख अतिरिक्त मौतें

शोधकर्ताओं ने इस बात का भी अंदेशा जताया है कि अगर दुनिया भर में गरीबी कम न होती, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर न हुई होतीं और लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार न आया होता, तो सिर्फ 2019 में ही वायु प्रदूषण से 17 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती थी।

मतलब कि किसी व्यक्ति पर वायु प्रदूषण का असर केवल इस बात से तय नहीं होता कि हवा कितनी जहरीली है, बल्कि यह भी मायने रखता है कि उसकी आर्थिक स्थिति कैसी है, उसे गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं या नहीं, उसे पहले से कोई बीमारी है या नहीं। वह धूम्रपान करता है या नहीं और उसके आसपास चिकित्सा सुविधाएं कितनी सुलभ हैं।

गरीबी में भारी गिरावट बनी ‘अदृश्य ढाल’

शोधकर्ताओं के अनुसार, वैश्विक गरीबी 1990 में 45 फीसदी से घटकर 2019 में 21 फीसदी रह गई, जिसने वायु प्रदूषण के घातक असर से लोगों को बचाने में एक “अदृश्य सुरक्षा कवच” का काम किया।

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अध्ययन में पाया गया कि 1990 से 2019 के बीच यूरोप और उत्तरी अमेरिका दोनों में प्रदूषण के स्तर में समान रूप से कमी आई, लेकिन यूरोप में प्रदूषण से होने वाली मौतों में गिरावट करीब दोगुनी रही, क्योंकि वहां स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार ज्यादा तेजी से हुए।

अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर क्रिस मैली का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “हवा को साफ करना बेहद जरूरी है, लेकिन यह समाधान का महज एक हिस्सा है।

यदि हम लोगों को प्रदूषण से होने वाले नुकसान से सच में बचाना चाहते हैं, तो हमें गरीबी घटाने, स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने और उन कारणों पर काम करना होगा जो लोगों को प्रदूषण के प्रति ज्यादा कमजोर बनाते हैं।“

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संदेश बेहद स्पष्ट है कि वायु प्रदूषण से जंग केवल चिमनियों और गाड़ियों का धुआं कम करने से नहीं जीती जा सकती। जब तक गरीबी, खराब स्वास्थ्य सेवाएं, धूम्रपान, मोटापा और अन्य सामाजिक-स्वास्थ्य समस्याएं दूर नहीं होंगी, तब तक प्रदूषण लाखों जिंदगियों पर कहर बरपाता रहेगा।

साफ हवा जरूरी है, लेकिन मजबूत समाज उससे भी ज्यादा जरूरी है, क्योंकि प्रदूषण सबसे ज्यादा उन्हीं की जान लेता है जो पहले से कमजोर हैं।

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