

हिमाचल प्रदेश में एक तरफ जलवायु परिवर्तन ने कृषि‑बागवानी के लिए मौसम को अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण बना दिया है, वहीं दूसरी ओर जंगली जानवरों का बढ़ता आतंक इस क्षेत्र के लिए कहीं अधिक गंभीर संकट खड़ा कर रहा है। किसानों और बागवानों के अनुसार, कई इलाकों में फसल को जंगली जानवरों से होने वाला नुकसान, मौसम की मार और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के मुकाबले कई गुना अधिक हो चुका है, जिसके कारण राज्य के अनेक गांवों में लोग खेती से किनारा करना शुरू कर रहे हैं।
वन विभाग की ओर से बंदरों की करवाई गई गणना के आंकडों के अनुसार वर्ष 2015 में इनकी संख्या 20,51,167 थी जो कि वर्ष 2019 तक 1,36,443 हो गई। बंदरों की संख्या पर नियंत्रण लगाने के लिए हिमाचल सरकार के वन विभाग की ओर से बंदर नसबंदी कार्यक्रम चलाया गया है। 2006 में चलाए गए इस कार्यक्रम के तहत अभी तक 1,86,448 बंदरों की नसबंदी की गई है। बावजूद इनसे किसानों को राहत नहीं मिल पाई है और यह समस्या दिनों दिन बढ़ती जात रही है।
जंगली जानवरों में बंदर, नीलगाय, जंगली सूअर, भालू, मोर और तोते प्रमुख हैं, जो हर साल किसानों‑बागवानों को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचा रहे हैं। वर्ष 2011 में ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा करवाई गई ‘इंपैक्ट असेसमेंट स्टडी’ में अनुमान लगाया गया कि हिमाचल में जंगली जानवरों और पक्षियों के कारण फसलों और फलों को लगभग 2300 करोड़ रुपये का वार्षिक नुकसान हो रहा है।
इसके बाद हिमाचल किसान सभा, ज्ञान विज्ञान समिति और खेती‑बाड़ी से जुड़े कई संगठनों ने वर्षों तक “खेती बचाओ अभियान” चलाया। इन दबावों के परिणामस्वरूप राज्य सरकार ने बंदरों और अन्य जंगली जानवरों से खेती की रक्षा के लिए “मुख्यमंत्री कृषि उत्पाद संरक्षण योजना” शुरू की, जबकि केंद्र सरकार ने वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम, 1972 में संशोधन कर तीन बार एक‑एक वर्ष के लिए बंदरों को ‘वर्मिन’ घोषित करते हुए उन्हें कृषि संरक्षण के लिए मारने की अनुमति भी दी। इसके अलावा केंद्र ने बंदरों को हिमाचल प्रदेश में वन्य प्राणियों की अनुसूची‑5 से बाहर रखने के आदेश भी जारी किए।
ज्ञान विज्ञान समिति की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की कुल पंचायतों में से 70 प्रतिशत से अधिक पंचायतें जंगली जानवरों के आतंक से प्रभावित पाई गईं। अध्ययन में यह भी पाया गया कि यदि किसान‑मजदूर फसलों की रखवाली करने के बजाय किसी अन्य काम में लगते, तो उनकी संभावित कमाई लगभग 1200 करोड़ रुपए आंकी जा सकती थी।
इसके अलावा रिपोर्ट में बागवानी क्षेत्र को 100 करोड़, कृषि फसलों को 200 करोड़, जंगली जानवरों के डर से छोड़ी गई परती जमीन से 500 करोड़ और कुल मिलाकर लगभग 2300 करोड़ रुपये की वार्षिक आर्थिक हानि का अनुमान लगाया गया। इन सब प्रयासों के बावजूद समस्या आज भी लगभग ज्यों‑की‑त्यों बनी हुई है और हिमाचल के लाखों किसान‑बागवान जंगली जानवरों के आतंक के कारण खेती छोड़ने की कगार पर पहुंच रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के लगभग 80.23 प्रतिशत क्षेत्र में वर्षा आधारित खेती होती है और यहां करीब 88.86 प्रतिशत किसान लघु और सूक्ष्म श्रेणी में आते हैं। प्रदेश के कुल क्षेत्रफल में से केवल लगभग 5.47 लाख हेक्टेयर भूमि ही कृषि योग्य है, जो कुल भू‑क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत है।
कृषि और बागवानी मिलकर राज्य की जीडीपी में लगभग 13 प्रतिशत योगदान देते हैं। ऐसे में जंगली जानवरों की समस्या उस क्षेत्र पर सीधी चोट है, जिससे राज्य की करीब 60 प्रतिशत आबादी को रोजगार या आजीविका मिलती है।
मंडी जिले के किसान अजय ठाकुर बताते हैं कि पिछले दो दशकों में बंदरों और अन्य जंगली जानवरों का आतंक कई गुना बढ़ गया है। उनके अनुसार, “हमने मक्की, सोयाबीन, माश और कई तरह की सब्जियां बोना लगभग बंद कर दिया है, क्योंकि बंदर और जंगली सूअर इतनी ज्यादा तबाही मचाते हैं कि जमीन खाली छोड़ना हमें कम जोखिम भरा लगता है।”
चौधरी सरवन कुमार कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर के कृषि अर्थशास्त्र विभाग के वैज्ञानिकों ने तीन वर्ष पहले ‘इंडियन जर्नल ऑफ एनिमल साइंसेज’ में प्रकाशित अपने शोध “इकोनॉमिक असेसमेंट ऑफ क्रॉप डैमेजेज बाय एनिमल मेनस इन मिड‑हिल रीजन ऑफ हिमाचल प्रदेश” में चौंकाने वाले निष्कर्ष प्रस्तुत किए।
अध्ययन के अनुसार, जंगली जानवरों के कारण कुल बोई गई क्षेत्र (ग्रॉस क्रॉप्ड एरिया) में 17.35 प्रतिशत और शुद्ध बोई गई क्षेत्र (नेट साउन एरिया) में 12.66 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। साथ ही यह भी पाया गया कि जंगली जानवरों के खतरे की वजह से खेती का पैटर्न बदल रहा है और किसान अब उन फसलों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं जिन्हें अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है, जैसे हल्दी, अरबी, भिंडी और अदरक आदि।
शिमला जिले के बागवान संजय चौहान के अनुसार, मौसम में आ रहे बदलाव के कारण जंगलों में मिलने वाली कई जंगली फल‑फूल प्रजातियां कम हो गई हैं, जिसका सीधा असर वन्य जीवों के भोजन पर पड़ रहा है। इसके चलते जो जानवर पहले जंगलों तक सीमित थे, अब गांवों, खेतों और बगीचों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वे बताते हैं कि “बंदर, भालू, तोते और चमगादड़ अकेले लगभग 20 प्रतिशत तक फल और फसलें बर्बाद कर देते हैं। अगर पूरे प्रदेश में इसका हिसाब लगाएं, तो नुकसान 500–600 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच सकता है।”
हिमाचल प्रदेश में बागवानी क्षेत्र से करीब 10 लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। बागवानी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले करीब 35 वर्षों में बागवानी क्षेत्र तेजी से बढ़ा है: वर्ष 1991‑92 में जहां कुल बागवानी क्षेत्र 1,16,338 हेक्टेयर था, जिसमें 62,828 हेक्टेयर क्षेत्र सेब के बगीचों के अंतर्गत था, वहीं वर्ष 2024‑25 में कुल बागवानी क्षेत्र बढ़कर लगभग 2,37,368 हेक्टेयर और सेब बागवानी क्षेत्र लगभग तीन गुना बढ़कर 1,63,330 हेक्टेयर तक पहुंच गया है। राज्य में अकेले सेब का सालाना कारोबार लगभग 5,000 करोड़ रुपये का माना जाता है। ऐसे में पहले से ही मौसम की मार झेल रहे बागवानों पर जब बंदर, लंगूर, भालू और तोतों का अतिरिक्त दबाव पड़ता है, तो उनकी उत्पादन लागत बढ़ने के साथ‑साथ जोखिम और असुरक्षा भी कई गुना बढ़ जाती है।
शिमला जिले के ठियोग क्षेत्र के सेब उत्पादक रोहित शर्मा बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में तोतों से बागवानी बचाना एक नई चुनौती बनकर उभरा है। वे कहते हैं, “जब सेब और अन्य फल टेनिस बॉल के आकार के होने लगते हैं, तभी तोतों के हमले सबसे ज्यादा बढ़ जाते हैं। तुड़ाई से लगभग डेढ़ माह पहले तक हमें लगातार रखवाली करनी पड़ती है। तोते अकेले लगभग 5 से 7 प्रतिशत तक फसल को नुकसान पहुंचा देते हैं।” उनके अनुसार, सुबह और शाम को इनका आतंक चरम पर होता है, जिसके चलते बागवानों को अतिरिक्त मजदूर लगाकर रखवाली करनी पड़ती है, और इससे बागवानी की लागत लगातार बढ़ रही है।
ज्ञान विज्ञान समिति के लिए इंपैक्ट असेसमेंट स्टडी करने वाले पूर्व आईएफएस अधिकारी एवं हिमाचल किसान सभा के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह तंवर का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में खासकर लंगूरों, बंदरों, जंगली सूअरों, नीलगायों, तोतों और मोरों का आतंक असामान्य रूप से बढ़ा है। वे बताते हैं, “हमने ‘खेती बचाओ अभियान’ शुरू कर ‘खेती बचाओ संघर्ष समिति’ बनाई थी और आज भी इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं। हमारी मांग है कि कैरिंग कैपेसिटी से अधिक हो चुकी जंगली जानवरों की आबादी का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाए और किसानों‑बागवानों को इनसे होने वाले नुकसान का उचित मुआवजा दिया जाए, जो अभी तक नहीं मिल पा रहा है।” तंवर का सुझाव है कि सरकार इस समस्या को प्राथमिकता देकर मनरेगा जैसी योजनाओं के तहत फसल रखवाली और फेंसिंग को मान्यता दे, ताकि किसानों‑बागवानों को कुछ वास्तविक राहत मिल सके।
हिमाचल की पहाड़ी कृषि आज जलवायु परिवर्तन और जंगली जानवरों के आतंक की दोहरी मार झेल रही है। जंगली जानवरों से होने वाला नुकसान अब एक नई आपदा की तरह उभर रहा है, जो प्राकृतिक आपदाओं से भी अधिक व्यापक और लंबे समय तक असर डालने वाला बन गया है। यदि समय रहते वैज्ञानिक, नीति–आधारित और सामुदायिक समाधान नहीं अपनाए गए, तो आने वाले वर्षों में हिमाचल की खेती, खाद्य–सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है।