

"जेठ की दुपहरी में दिन भर खटना और जंगलों- पहाड़ों से वनोपज जुटाना। इन सबके बीच आने वाली बारिश में धान की खेती तथा घर के खर्चे को लेकर महुआ, मड़ुआ, आम आदि जो भी जमा करके रखे थे, हाथियों ने तहस-नहस कर दिया. जान बच गई, पर संकट गहरा है।"
झारखंड के आदिवासी बहुल खूंटी जिले के रनिया प्रखंड के जराटोली गांव के बिचा पाहन यह कहते-कहते बूदबुदाने लगते हैं।
उनके यहां सात-आठ मई की दरमियानी रात पांच-छह हाथियों के झुंड ने धावा बोला। घर की दीवार ढहा दी। किसी तरह जान बचाकर बाहर निकले, लेकिन घर में रखे महुआ, मड़ुआ, आम और धान की बुआई के बीज को हाथियों ने खाने के साथ बर्बाद कर दिया।
वैसे भी इस बार वनोपज कम हुआ है। जंगलों में डेढ़-दो महीने की मशक्कत से एक क्विटंल से अधिक महुआ चुन कर लाए थे। स्थानीय हाट-बाजार में व्यापारियों के पास बेचना था, ताकि तेल-नून व रोजमर्रा के सामान का खर्च निकले।
रनिया के जराटोली समेत दर्जनों गांवों में आदिवासियों, किसानों की जिंदगी महीनों से खौफ के साये में गुजर रही है। जबकि जंगल- पहाड़ ही आदिवसियों के जीवन का आधार है। इस घटना की खबर पर रनिया ब्लॉक के ग्राम प्रधान संघ के अध्यक्ष सुरेश कोंगाड़ी, सामाजिक कार्यकर्ता जॉन कंडुलना पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे।
उन्होंने बिचा पाहन के परिवार को भरोसा दिलाया कि मुआवजा दिलाने का प्रयास करेंगे। ग्राम प्रधान ने हाथियों को भगाने के लिए ग्रामीणों को पटाखे भी दिए।
खूंटी जिला मुख्यालय से लगभग 60 किमी दूर इस गांव में यह आम हो गया है। सुरेश कोंगाड़ी डाउन टू अर्थ से कहते हैं, “किसान, आदिवासी दो पाट में पीस रहे हैं। लोगों की जान जा रही है और आजीविका भी खतरे में है। आदिवासी घर, खेत छोड़कर तो दूसरी जगह नहीं जा सकते। वन विभाग जंगली जानवरों को भगाने अथवा जान-माल की सुरक्षा के मामले में बिल्कुल उदासीन रहा है। सैकड़ों किसान, आदिवासी मुआवजे के लिए दावे (क्लेम) ही नहीं करते। दरअसल, उन्हें कागजी प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती। अलबत्ता, मुआवजे के इंतजार में पीड़ित परिवारों के महीनों गुजर जाते हैं।”
गौरतलब है कि रनिया प्रखंड के ही सुदूर इलाके में हाथियों के अलावा जंगली सूअरों और जंगली बंदरों के खतरे से भी ग्रामीण और किसान परेशान हैं। इसी सिलसिले में पिछले साल 2025 में 10 अक्टूबर को हजारों की संख्या में महिला और पुरूष रनिया ब्लॉक मुख्यालय में जुटे थे। एक बड़ी और रोषपूर्ण सभा कर वन विभाग के रवैये के खिलाफ आंदोलन की मुनादी की गई थी।
बेबसी का अंतहीन सिलसिला
डाउन टू अर्थ ने कई पीड़ित किसानों, आदिवासियों से बातें कीं और जमीनी हालात का जायजा लिया। उनके बीच से हताशा और निराशा के स्वर सुनाई पड़ते हैं। ऐसा स्वर, जिसका सरकारी तंत्र पर बहुत असर होता नहीं दिखता। अमूमन हर दिन राज्य के किसी इलाके से यह खबर सामने आती रही है कि हाथियों ने किसी व्यक्ति को मार डाला अथवा, खेतों में लगी फसलों को नष्ट कर दिया । ग्रामीणों के घरों में तोड़फोड़ की और अनाज खा गए। जाहिर तौर पर यह संघर्ष एक सामाजिक-आर्थिक चुनौती के रूप में भी उभरा है।
झारखंड में पिछले पांच सालों में हाथियों द्वारा फसलों के नुकसान पहुंचाने के हर साल औसतन 9245 और अनाज क्षति के 1146 मामले दर्ज किए गए। सैकड़ों घटनाओं की रिपोर्टिंग तक नहीं हुई।
दूसरी तरफ इस साल के साढ़े चार महीने के दौरान राज्य के अलग-अलग हिस्सों में हाथियों ने कम से कम 60 लोगों को मार डाला। इनमें अधिकतर आदिवासी, छोटे किसान और मजदूर हैं। भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत वन्यजीव संस्थान और प्रोजेक्ट एलिफेंट द्वारा किए गए प्रासंगिक शोध और अध्ययनों से पता चला है कि साल 2000 से 2023 के दौरान हाथियों के हमलों में 1,340 लोगों की मौत हुई और 400 लोग घायल हुए।
राज्य सरकार के वन विभाग के ही आंकड़े के मुताबिक पिछले चार वर्षों (2021-2025 मार्च) तक में हाथियों ने 397 लोगों की जान ली है।
छोटे व सीमांत किसान, मुआवजे की उलझनें
झारखंड के 79.71 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल में 48 प्रतिशत खेती योग्य जमीन है। राज्य में सबसे ज्यादा 24 लाख छोटे व सीमांत किसान हैं, जिनके पास औसत 1.74 हेक्टेयर जमीन है। राज्य की लगभग 70 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है, जिनमें अधिकांश वर्षा आधारित है।
गरमा धान, गेंहू मकई और आलू की फसलें
खूंटी के अलावा पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला, पूर्वी सिंहभूम, रांची, लातेहार, गढ़वा, रामगढ़, गिरिडीह, कोडरमा, हजारीबाग जिले के कई इलाके, हाथियों के उत्पात और जान-माल की क्षति को लेकर बेहद संवेदनशील रहे हैं। इन दिनों सरायकेला, पश्चिम सिंहभूम, रांची, रामगढ़ लातेहार, पूर्वी सिंहभूम के कई इलाके में किसान मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। गर्मा धान और मकई की फसलें हाथियों के निशाने पर हैं। रात के समय भोजन की तलाश में गांवों में घुस रहे हाथी घरों की दीवारें और छप्पर तोड़कर अंदर रखे धान, चावल, वनोपज और अन्य खाद्यान्न खा जा रहे हैं।
लातेहार जिले के बरियातू प्रखंड के आदिवासी बहुल कटई टोला के सधन उरांव, विजय उरांव समेत कई आदिवासी परिवार पांच महीने बाद भी फसलों के नुकसान से उबर नहीं पाए हैं। सधन उरांव और विजय उरांव डाउन टू अर्थ को बताते हैं, “ जाड़े की वह रात भयावह थी, जब हाथियों के झुंड ने खलिहान में रखे दो सौ बोझे धान को पहले जितना चाहा खाया और फिर नष्ट कर दिया। खेतों में लगी आलू की फसलों को रौंद डाला। बड़े जोतदार हैं नहीं, जो संभल पाते। दुख में बीते हैं ये पांच महीने।" सधन उरांव के मिट्टी के घर को भी हाथियों ने ढहा दिया।
पलामू में नीलगायों का उत्पात
पलामू प्रमंडल के पलामू और गढ़वा उत्तरी क्षेत्र में नीलगायें किसानों के लिए संकट का सबब बनी हैं। मकई, दलहन, तेलहन और रबी फसलों की अच्छी पैदावार वाले इस इलाके में बड़ी संख्या में किसानों की खेती नीलगायें बर्बाद करती रही हैं।
उत्तरी वन प्रमंडल क्षेत्र गढ़वा के ही भवनाथपुर, कांडी, मेराल और गढ़वा प्रखंड में पिछले तीन सालों में 268 हेक्टेयर भूमि पर फसलों को नीलगायों ने नष्ट कर दिया। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक क्षतिपूर्ति के लिए 828 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें बतौर मुआवजा 73 लाख 56 हजार रुपए का भगुतान किया गया।
किसान मित्र के तौर पर सक्रिय रहे कांडी के किसान भोला मेहता बताते हैं, “नीलगाय बेधड़क झुंड में घुसकर अरहर, आलू, गेहूं, सरसों, लहसून, प्याज की फलियां चट कर जाती हैं। सैकड़ों किसान थक- हारकर जमीन परती छोड़ने को विवश हैं।”
मुआवजे की बात पर भोला मेहता झुंझला जाते हैं। वे कहते हैं, “मुआवजा पाना किसी बड़े संघर्ष से कम नहीं। मुखिया को घटना की जानकारी देने के बाद अंचल ऑफिस जाकर जमीन वेरीफिकेशन कराएं।। फिर आवेदन पर वन क्षेत्र पदाधिकारी का मंतव्य दर्ज कराएं। फसल क्षति की तस्वीर दीजिए। सरकारी बाबुओं की खुशामद कीजिए। कहां-कहां भटके किसान।”
गढ़वा के वन प्रमडंल पदाधिकारी अंशुमान डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि पलामू प्रक्षेत्र में नीलगायों की संख्या को लेकर कोई गणना नहीं की गई है। लेकिन इनकी संख्या एक हजार से अधिक हो सकती हैं। नीलगायों की आबादी को काबू में करने के अलावा फसलों को नुकसान से बचाने के लिए कई प्लान तैयार कर विभाग को भेजे गए हैं।
मुआवजे और सवाल?
राज्य में भूमिधारी किसानों के द्वारा स्वयं फसल उपजाने के मामले में क्षतिपूर्ति के तौर पर 32,500 रुपए और बटाईदार को 21,667 रुपए प्रति हेक्टेयर दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि इसके लिए भी अधिकतम राशि क्रमशः 65,000 और 43,324 रुपए ही दिए जाने का प्रावधान है। जबकि अनाज (भंडारण) के नुकसान पर 2,600 रुपए क्विंटल के हिसाब से भुगतान किया जाता है।
रांची जिले के पांच परगना इलाके के रहने वाले शनि मुंडा कहते हैं, “एक एकड़ में 15-22 किवंटल धान की उपज होती है। इस धान को अगर हम सरकार की धान अधिप्राप्ति केंद्र में बेच दें, तो हमें लगभग लगभग 45-50 हजार रुपए मिलेंगे। लेकिन अगर इसी एक एकड़ में लगी धान की फसल को हाथी नुकसान पहुंचाता है तो झारखंड सरकार का ही वन विभाग अधिकतम केवल 12 हजार रुपए प्रति एकड़ का मुआवजा दे कर छुट्टी पा लेता है। वह भी कब मिलेगा, बताना मुश्किल है।”
राज्य के प्रधान मुख्य संरक्षक (वन्य प्राणी) रवि रंजन डाउन टू अर्थ से कहते हैं, “जंगली जानवरों के हमले से होने वाली क्षति पर पीड़ित परिवारों/किसानों को अति शीघ्र मुआवजे भुगतान के लिए एक प्रस्ताव तैयार कर सरकार को भेजे जाने की तैयारी है। इसमें प्रकिया को सरल बनाया जा रहा। साथ ही मुआवजे की राशि भी भी बढ़ायी जाएगी। लंबित मुआवजे के भुगतान के लिए अधिकारियों को पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।”
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