डाउन टू अर्थ की खोजी पड़ताल बताती है कि देश के लगभग हर हिस्से में फसलों पर बढ़ते जानवरों के हमलों ने किसानों की आजीविका को संकट में डाल दिया है और कई परिवार खेती छोड़ने की कगार पर पहुंच गए हैं। इस पड़ताल को राज्य-दर-राज्य अलग कड़ियों में प्रकाशित किया जा रहा है। कल आपने झारखंड की ग्राउंड रिपोर्ट पढ़ी। आज पढ़ें अगली कड़ी-
बिहार का पूरा उत्तरी और दक्षिणी मैदान पिछले दस-बारह सालों से एक नए संकट से जूझ रहा है। नीलगाय, जंगली सूअर और कुछ इलाकों में बंदरों की वजह से किसान उन फसलों को छोड़ने को मजबूर है, जिनसे उनकी अच्छी खासी कमाई हो जाती थी।
गोपालगंज जिले के सिल्वरिया प्रखंड के शाहपुर पंचायत में रहने वाले किसान अब्दुल मन्नान बताते हैं कि हर साल जुलाई से मार्च के बीच नीलगाय 50–60 के झुंड में खेतों पर धावा बोलती हैं और पूरी मेहनत को क्षण भर में बर्बाद कर जाती हैं। गाना (बांस का जाल) लगाते हैं, नीलगाय उसे भी तोड़ देती है।
नीलगाय और जंगली सूअर की वजह से अब किसानों ने दाल और मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती छोड़ दी है। फसल बीमा करवाने के बावजूद किसानों को मुआवजा नहीं मिल पा रहा है।
मन्नान बताते हैं कि पुलिस प्रशासन से शिकायत करने के बाद नीलगायों को मारने के लिए शूटर भेजे, जिससे इस बार हमलों में कुछ कमी आई है। नीलगायों को खेतों से दूर रखने के लिए किसान देसी तरीकों, जैसे फटाका, धुआं और घरेलू छिड़काव का सहारा लेते हैं, लेकिन अब इनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। कितना भी उपाय कर लें, असर अब नहीं के बराबर है।
पूर्वी चंपारण, बिहार चिरैया प्रखंड के दीपही गांव के किसान विनोद प्रसाद बताते हैं कि इलाके में जंगली जानवरों का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले दस वर्षों में नीलगाय की संख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि पिछले तीन–चार साल से जंगली सूअर भी खेतों को भारी नुकसान पहुंचाने लगे हैं।
विनोद प्रसाद कहते हैं, “पहले नीलगाय नहीं थी, लेकिन जंगल कम होने के बाद वे भोजन की तलाश में गांव की तरफ आने लगीं।” उनके अनुसार, नीलगाय और जंगली सूअर सबसे ज्यादा उन फसलों को निशाना बनाते हैं जिन्हें सब्जी के रूप में उगाया जाता है जैसे गोभी, आलू, सरसों और धनिया। “जंगली सूअर खासकर आलू, गोभी और मक्का को चट कर जाते हैं,” वे बताते हैं।
प्रसाद का कहना है कि जंगली जानवरों के लगातार बढ़ते हमलों के कारण अब फसल की पैदावार में भारी कमी आ गई है। नतीजतन, उन्होंने और आसपास के 100 से अधिक किसानों ने मक्के की खेती पूरी तरह बंद कर दी है। “मक्का कभी बहुत मुनाफे वाला था, लेकिन अब नुकसान ही मिलता है। मजबूरी में गेहूं की खेती करनी पड़ रही है।”
नीलगाय मार्च से जून के बीच मक्का पर सबसे ज्यादा हमला करती है, जबकि गेहूं और धान की फसल को सीधे नहीं खाती, लेकिन खेत में दौड़ने से फसल गिर जाती है और नुकसान हो जाता है।
विनोद बताते हैं, कीटनाशक दवा का छिड़काव करते हैं या मिट्टी के घड़े में मछली सड़ाकर उसकी दुर्गंध मेड़ पर डालते हैं, इससे कुछ दिन खेत बच जाता है, लेकिन असर खत्म होते ही जानवर फिर आ जाते हैं।
मुआवजे के सवाल पर कहते हैं, “पैक्स और सहकारिता से जुड़े लोगों को ही मुआवजा मिलता है।
मुजफ्फरपुर में भी लोग मक्के की जगह अब गेहूं की खेती बढ़ रही है। बोचहां रंजीत कुमार बताते हैं कि उन्होंने सब्जियां व मक्का उगाना पूरी तरह बंद कर दिया है। जहांगीरपुर गांव के किसान भोला ठाकुर बताते हैं कि उन्होंने कुल 113 डिसिमिल के रकबे में से बड़ी हिम्मत करके केवल 5 डिसिमिल में आलू बोया है, जिसे बांस की करची से घेरकर सुरक्षित करेंगे। उन्होंने पांच-सात साल में जंगली (बनैय्या) सूअर और नीलगाय की वजह से आलू और मक्के की खेती करना छोड़ ही दिया है।
दरभंगा जिले के माधोपट्टी गांव के रहने वाले किसान प्रशांत बताते हैं कि उनके इलाके में पिछले कई वर्षों से बंदरों का आतंक लगातार बढ़ा है। करीब 15 साल पहले किसी दूसरे इलाके से बंदरों को यहां छोड़ दिया गया था, जिसके बाद उनकी संख्या तेजी से बढ़ती गई और अब वे खेती के लिए बड़ी समस्या बन चुके हैं। प्रशांत कहते हैं कि बंदरों के कारण किसानों ने मक्का, गन्ना, सब्जियां और आलू जैसी फसलें उगाना लगभग बंद कर दिया है, क्योंकि ये फसलें सबसे ज्यादा नुकसान झेलती हैं।
वह बताते हैं कि पहले आम के पेड़ का ठेका व्यापारी 50 हजार रुपये तक में लेते थे, लेकिन अब वही 25 हजार में भी मुश्किल से लेते हैं, क्योंकि बंदर ज्यादातर फल खराब कर देते हैं, वे कहते हैं।
करीब 8 एकड़ में खेती करने वाले नवादा जिले के दूधपानियां गांव के किसान ईश्वरी प्रसाद कहते हैं कि उन्होंने बैंगन की फसल तैयार की थी, लेकिन नीलगाय पूरी फसल चट कर गई, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। वन विभाग से मुआवजा पाने की प्रक्रिया बहुत जटिल है।
गांव बठवाड़ा की महिला किसान तेतरी देवी बताती हैं कि हम लोग पशुओं के चारा के लिए जौ बोते थे, लेकिन सूअरों की वजह से जौ की खेती बंद करनी पड़ी। हम छोटे किसान बंटई पर खेती करते हैं। हमारे लिए खेत के मालिकों को जवाब देना बड़ा मुश्किल हो जाता है। कई बार फसल नुकसान की भरपाई कर्ज लेकर करनी पड़ती है। सरकार की ओर से कोई सुध लेनेवाला नहीं है। हम अपनी खेत की सुरक्षा भी नहीं कर सकते हैं–यह भी खर्चीला होता है। बड़े और पैसेवाले किसान अपनी खेतों को काँटातार लगाकर सुरक्षित रखते हैं।
4300 नील गायों का आखेट
बिहार की वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की 2024–25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, नीलगाय और जंगली सूअर से फसल-नुकसान राज्यभर में तेज़ी से बढ़ा है, खासकर जंगलों से दूर बसे ग्रामीण इलाकों में। सरकार ने जुलाई 2024 में इस नुकसान को औपचारिक रूप से मान्यता दी और मुआवज़ा देने की प्रक्रिया शुरू की। 9 सितंबर 2024–28 फरवरी 2025 के बीच छह जिलों—पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, मुज़फ्फरपुर, सीतामढ़ी, मुंगेर और नवादा में विशेष नियंत्रण अभियान चलाया गया। इसी अवधि में इन जिलों में 4,279 नीलगाय का आखेट किया गया।
कृषि विशेषज्ञ इश्तियाक अहमद बताते हैं कि जंगली जानवरों से होने वाली फसल-क्षति को लेकर वर्षों से विभागों के बीच भ्रम बना हुआ है। कृषि विभाग किसानों को वन विभाग के पास भेज देता है, और वन विभाग कहता है कि नीलगाय वन्यजीव की श्रेणी में ही नहीं आती। नतीजा यह होता है कि किसान को राहत नहीं मिलती।
इश्तियाक अहमद बताते हैं कि नीलगाय और जंगली सूअर के हमलों ने खेतों की पारंपरिक खेती-पद्धति को नुकसान पहुचाया है। पहले किसान कॉर्प रोटेशन अपनाते थे, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती थी और खेतों में फसल विविधता रहती थी। अब मजबूरी में किसान सीमित फसलें उगा रहे हैं, क्योंकि उन्हीं पर थोड़ा कम खतरा होता है।
इस कारण एग्रो बायोडायवर्सिटी घट रही है, जिसका सीधा असर मिट्टी, उत्पादन और किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है। वे बताते हैं कि मक्का सबसे लाभदायक फसल थी, लेकिन नीलगाय के लगातार हमले की वजह से किसानों ने इसे छोड़कर गेहूं जैसी कम मुनाफे वाली फसलें अपनाना शुरू कर दिया है। इससे किसानों की आमदनी घट रही है और आजीविका पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।