खतरे में खेती: राजस्थान में 70–80% तक फसल बर्बाद कर रहे जानवर, तारबंदी में फंसकर गंवा रहे हैं जान

राजस्थान में तारबंदी योजना पर 579 करोड़ खर्च, 5.38 करोड़ मीटर तार बिछने के बावजूद जानवरों ने बाड़ तोड़ने के नए तरीके खोज लिए हैं
यह तस्वीर पर्यावारणविद स्वर्गीय राधेश्याम पेमानी की फेसबुक वाल से ली गई है।
यह तस्वीर पर्यावारणविद स्वर्गीय राधेश्याम पेमानी की फेसबुक वाल से ली गई है।
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सारांश
  • राजस्थान के कई जिलों में निराश्रित सांड, जंगली सुअर, नीलगाय, ऊंट और गधों के झुंड रात में खेतों पर धावा बोलकर 70-80% तक फसलें बर्बाद कर रहे हैं।

  • किसान महंगी तारबंदी, हल्के करंट और अस्थाई गौशालाओं जैसे उपायों के बावजूद नुकसान झेल रहे हैं।

  • सख्त गोवंश कानून, जटिल पशु बाजार नियम और बीमा में मुआवजा न मिलने से खेती की लागत बढ़ी, लाभ घटा और पशु खुले छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी।

  • सरकार की तारबंदी योजना और सब्सिडी के बावजूद सांड व सुअर खंभे उखाड़कर खेतों में घुस जाते हैं, जबकि करंटयुक्त बाड़ से जानवरों और इंसानों की जान जा रही है।

रामवतार चौधरी अपने दो अन्य भाइयों के साथ 10 बीघा में खेती करते हैं। राजस्थान की मुंडावर तहसील के नांगल बावला गांव में पिछले साल चौधरी एक बीघे में बाजरे की लावणी नहीं कर पाए। वजह जंगली सुअर थे। सुअरों ने पूरे खेत को ही खोद दिया।

कटा हुआ बाजरा खुरों से रौंद दिया। स्थानीय स्तर पर किसानों की राजनीति करने वाले रामवतार बताते हैं, “हमारे इलाके में निराश्रित सांड, जंगली सुअर और नीलगायों का आतंक है। ये रात में हमला करते हैं। सांड 90-100 और सुअर 40-50 के समूह में आते हैं और एक बार खेत में घुस गए तो 70-80% नुकसान करके जाते हैं। नीलगाय पुरानी समस्या है, लेकिन नुकसान के पैमाने पर सांड और सुअरों ने नीलगाय को पीछे छोड़ दिया है। क्योंकि नीलगाय 8-10 की संख्या में आती हैं।”

रामवतार के पड़ोसी पचास बसंत जी चुके लीलूराम बीते एक दशक से समस्या को गंभीर मान रहे हैं। बताते हैं, “करीब 50 के झुंड में आए सुअरों ने आधे बीघा में प्याज की खेती बर्बाद कर दी। खेत एक बीघे का था। उगे प्याज को लंबे दांतों से उखाड़ते हैं और कटे हुए को रौंद देते हैं।”

पूर्वी राजस्थान खासकर मेवात इलाके में एक बीघे में करीब 16 क्विंटल गेहूं होता है। रामवतार बताते हैं, “अगर किसान एक दिन भी खेत की रखवाली ना करे और सांड या सुअर खेत में आ जाए तो 70-80% फसल बर्बाद होनी तय है। यह इलाका प्याज की खेती के लिए देशभर में प्रसिद्ध है, लेकिन इसमें सबसे ज्यादा नुकसान सुअरों से हो रहा है।”

निराश्रित पशुओं की समस्या पूरे राजस्थान की है। सिर्फ नुकसान करने वाले जानवर बदल जाते हैं। जैसलमेर के पर्यावरणविद् और जैविक खेती करने वाले किसान पार्थ जगाणी डाउन-टू-अर्थ को बताते हैं कि पूरे पश्चिमी राजस्थान में गधे, ऊंट और जंगली सुअरों का आतंक है। जालौर, नागौर और दक्षिण राजस्थान के पहाड़ी इलाकों में कई किसान खेती छोड़ने को मजबूर हैं। जैसलमेर, बाड़मेर में गधे रबी सीजन में चने की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं और ऊंट सब कुछ तबाह करते हैं।

सेंट्रल यूरोपियन यूनिवर्सिटी, ऑस्ट्रिया में अर्थशास्त्री और प्रो. जितेन्द्र सिंह ने राजस्थान में पांच जिलों के 23 गांवों में 211 किसान परिवारों से इस संबंध में बात की और एक स्टडी प्रकाशित की। इसमें पाया गया कि किसानों का  भटकते पशुओं के कारण फसल नुकसान का जोखिम 44% तक बढ़ गया है। वहीं, फसलों की रक्षा के लिए सावधानी बरतने वाले उपायों की संख्या दोगुनी हो गई है। इससे फसलों की सुरक्षा में अधिक धन खर्च हो रहा है। इससे किसानों को खेती से लाभ कम होने लगा है।

कानून ही बने सबसे बड़ी समस्या!

राजस्थान सरकार ने अगस्त 1995 में राजस्थान गोवंशीय पशु (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रव्रजन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम, 1995 बनाया था। 9 मार्च 2018 को भाजपा सरकार ने विधानसभा में संशोधन बिल लाकर गौवंश के निर्यात और व्यापार को काफी सख्त कर दिया। इसके मुताबिक किसी भी गौवंश का राजस्थान से बाहर बूचड़खाने में ले जाना प्रतिबंधित है। गौवंश की परिभाषा में सांड, बैल और बछड़े-बछिया भी शामिल हैं, जबकि भैंस और उसकी नस्ल को इससे बाहर रखा गया।

संशोधन के अनुसार कोई भी सक्षम अधिकारी या उसके द्वारा लिखित रूप से अधिकृत कोई व्यक्ति ऐसे वाहनों को पकड़ सकता है, जिसमें गौवंश जा रहा है। साथ ही ले जाने वाले व्यक्ति को गिरफ्तार कर वाहन भी जब्त कर सकता है।

जानकारों का मानना है कि इसी आधार पर पिछले कुछ सालों में गौवंश के ट्रक कुछ संस्थाओं द्वारा शक के आधार पर पकड़े जा रहे हैं। जबकि उनके द्वारा ले जाया जा रहा गौवंश वैध या अवैध है, इसकी जांच बाद में होती है। कई बार यह कार्यवाही काफी हिंसक भी होती हैं, जो राजनीतिक मुद्दा बनती हैं। ऐसी कार्यवाहियों का असर किसानों पर सबसे ज्यादा हुआ है। क्योंकि एक दशक पहले तक राजस्थान के पशु मेलों में किसान बड़ी संख्या में बैल और गाय झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार जैसे राज्यों में बेचते थे। इससे किसानों की आय भी होती थी और गौवंश की संख्या भी नियंत्रित रहती थी। मेलों में होने वाला यह व्यापार किसानों के लिए एक समानांतर अर्थव्यवस्था थी और इससे सांडों से खेती में नुकसान की समस्या भी नहीं थी।

इसके अलावा पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2016 में पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण (पशुधन बाजार विनियमन) का प्रारूप बनाया था। इसके नियम 2017 में मंत्रालय ने जारी किए।

रामवतार बताते हैं, “ये नियम काफी सख्त और लंबी प्रक्रिया वाले हैं। बेचने वाले किसान और खरीददार को लंबी कागजी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसीलिए किसानों को सबसे आसान विकल्प गौवंश को खुले में छोड़ना लगता है।”

इसके अलावा पीएम फसल बीमा योजना में भी निराश्रित पशुओं द्वारा किए गए नुकसान को शामिल नहीं किया जाता। किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट डाउन-टू-अर्थ को बताते हैं कि हमने कई बार भारत और राज्य सरकार के कृषि मंत्रियों को इस संबंध में पत्र लिखा है। हमारी मांग है कि जंगली जानवर, आवारा पशुओं से खेती में हो रहे नुकसान को पीएम फसल बीमा योजना के तहत मुआवजा मिले। साथ ही सरकार जो कानून बनाती है, वे धरातल पर व्यवहारिक नहीं होते। इसीलिए इन कानूनों में किसानों के साथ राय-मशविरा कर संशोधन किया जाना चाहिए।

5 साल में तारबंदी के लिए 1.61 लाख किसानों को दिए 579 करोड़

मार्च 2018 में कानून लाने से थोड़ा पहले 2017 में राजस्थान में खेतों की फेंसिंग के लिए तारबंदी योजना शुरू की गई। इसके तहत खेतों में 400 रनिंग मीटर तक तारबन्दी के लिए लघु एवं सीमान्त किसानों लागत का 60% या अधिकतम 48 हजार रुपए, सामान्य किसानों को 50 प्रतिशत या अधिकतम 40 हजार रुपए और सामुदायिक स्तर पर तारबन्दी करने पर 70% या अधिकतम 56 हजार रुपए, जो भी कम हो, वह सब्सिडी दी जाती है।  किसानों द्वारा 400 रनिंग मीटर से कम परिधि पर तारबंदी की जाती है तो प्रोरेटा बेसिस पर सब्सिडी दी जाती है।

कृषि विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत 2021-22 से 2025-26 तक 1,61,478 किसानों को 579 करोड़ रुपए तारबंदी के लिए दिए जा चुके हैं। साथ ही 5,38,47,938 मीटर तार किसानों को सब्सिडी पर तारबंदी के लिए दिया गया है।

इन पांच साल के आंकड़ों के मुताबिक तारबंदी योजना का फायदा लेने वाले किसानों की संख्या हर साल बढ़ रही है। 2021-22 में जहां सिर्फ 2110 किसानों ने इसका लाभ लिया था, 2025-26 में यह बढ़कर 52,485 हो गए। इससे किसानों की पीड़ा को समझा जा सकता है।

तारबंदी के अलावा किसानों ने खेतों में हल्के करंट वाले तार भी लगाना शुरू किया है। इससे भी बड़ी संख्या में जानवर और इंसान चोटिल हो रहे हैं। हालांकि हाल ही में राजस्थान के जीव-जंतु कल्याण बोर्ड ने खेतों की बाड़ में बिजली करंट लगाने या नुकीले और ब्लेडनुमा तारों के इस्तेमाल को गंभीर अपराध श्रेणी में डाला है। बोर्ड ने कहा है कि झटका करंट से यदि किसी पशु या पक्षी के घायल या मौत की घटना सामने आती है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित जमीन मालिक की होगी।

किसानों ने अस्थाई गौशाला खोलीं, सांडों ने तारबंदी का तोड़ निकाल लिया

धौलपुर जिले की बसेड़ी पंचायत समिति के तुर्सीपुरा, पिपरौन और हरजूपुरा के किसानों ने सांड़ों की समस्या का स्थानीय स्तर पर समाधान निकाला। बंटाई पर खेती करने वाले युवा किसान नीरज शर्मा से डाउन-टू-अर्थ ने बात की। वे बताते हैं, “हमारी तीन पंचायतों में 500-700 से अधिक गाय और सांड खुले में घूमते हैं। नीलगाय और सुअरों की गिनती नहीं है। इसीलिए तीनों पंचायतों के 10 युवा किसानों ने मिलकर एक खाली जमीन पर रबी सीजन में एक अस्थाई गौशाला खोली। ग्रामीणों से चंदा लेकर गायों के चारे और पानी की व्यवस्था की। यह काम दिसंबर से मार्च तक फसल कटाई पूरी होने तक किया गया।”

यह तस्वीर युवा किसान नीरज शर्मा ने उपलब्ध कराई है
यह तस्वीर युवा किसान नीरज शर्मा ने उपलब्ध कराई है

गांव के ही सूरज भान ठाकुर बताते हैं, “इस पहल से तीनों पंचायतों की करीब 5 हजार बीघा खेती में नुकसान नहीं हुआ।”

हालांकि यह समस्या का अस्थाई हल है, लेकिन जिन पंचायतों या गांवों में गौशालाएं हैं, वहां निराश्रित गौवंश की संख्या इतनी ज्यादा है कि उनकी देखरेख करना संभव नहीं हो पाता। मुंडावर तहसील के पेहल गांव के मुकेश चौधरी बताते हैं कि गौशाला में जब किसान गाय देने जाता है तो उससे दो हजार रुपए तक चारे-पानी के लिए मांगे जाते हैं। अधिकतर किसान यह राशि वहन नहीं कर पाते इसीलिए अपने गौवंश को खुले में छोड़ देते हैं।

इसके अलावा देखने में आ रहा है कि सांड और सुअरों ने सरकारी तारबंदी स्कीम का भी तोड़ निकाल लिया है। समूह में आए सांडों का लीडर एक-दो अन्य सांडों के साथ मिलकर तारों के लिए लगाए खंभे को उखाड़ देता है और बाकी गौवंश के खेत में घुसने के लिए जगह बना देता है। यही काम जंगली सुअर भी करते हैं। रामवतार कहते हैं, “तारबंदी से फायदा तो हुआ, लेकिन जानवर अब इसके आदी हो गए हैं इसीलिए तारबंदी भी अब नाकाफी लगने लगी है। इसीलिए किसानों को पारंपरिक तरीके जैसे स्थानीय जलवायु के मुताबिक नागफनी या करोंदे की झाड़ी खेतों के चारों ओर लगानी चाहिए। इससे कुछ सहूलियत मिल सकती है।”

तारबंदी से हिरण मर रहे, कुत्तों का आतंक बढ़ा

पश्चिमी राजस्थान में लोग और चिंकारा का सह जीवन सदियों से है। इलाके में पाए जाने वाले हिरण, चिंकारा और काले हिरण खेतों और खुले मैदान में रहते आए हैं। जब से तारबंदी का विकल्प आया है, तब से बड़ी संख्या में चिंकारा मारे जा रहे हैं। यह तारबंदी खेतों के साथ-साथ वन विभाग अपनी सीमा में भी करने लगा है। इसके अलावा सोलर पार्कों की फेंसिंग भी तारों से की जाती है। जिन इलाकों में तारबंदी हो रही है, वह हिरणों का रहवास है। साथ ही पिछले कुछ दशकों से कुत्तों की संख्या भी इलाके में काफी बढ़ी है। वे शिकार के लिए हिरणों का पीछा करते हैं और हिरण इन तारों में उलझ कर जान गंवा रहे हैं। पार्थ जगाणी कहते हैं, “जो जगह हिरणों की हुआ करती थी, वहां गाय, सांड, सुअर और कुत्ते आ गए। हिरण आसान शिकार हैं, लेकिन शिकार के साथ-साथ वे तारों में फंसकर मर रहे हैं। इन हत्याओं की जिम्मेदारी ना तो समाज ले रहा है और ना ही प्रशासन।”

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