

अंडमान में 2004 की सुनामी से उजड़े तटीय इलाकों में दो दशक बाद मैंग्रोव जंगल तेजी से फिर विकसित हो रहे हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार ऊंचे और पुराने मैंग्रोव पेड़ नए पौधों को सुरक्षित वातावरण देकर उनकी जड़ों को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।
हल्का अम्लीय या सामान्य पानी मैंग्रोव के विकास के लिए बेहतर है, जबकि अधिक क्षारीय पानी पौधों की वृद्धि रोकता है।
जमीन की बनावट और समुद्री कचरे ने भी मैंग्रोव की वापसी में भूमिका निभाई, हालांकि कचरे के प्रभाव पर शोध जारी है।
अध्ययन से मिली जानकारी दुनिया के संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव संरक्षण और प्राकृतिक पुनरुद्धार की बेहतर योजनाएं बनाने में मदद करेगी।
दिसंबर 2004 में आए भूकंप और सुनामी ने अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कई हिस्सों को बुरी तरह प्रभावित किया था। उत्तर अंडमान के तटीय इलाकों में जमीन एक मीटर से भी ज्यादा ऊपर उठ गई थी। इसके कारण समुद्र के नीचे मौजूद चट्टानें, पुराने समुद्री क्षेत्र और मृत प्रवाल यानी कोरल रीफ जमीन के ऊपर आ गए। बड़ी संख्या में मैंग्रोव के पेड़ भी नष्ट हो गए थे।
उस समय ऐसा लग रहा था कि इन इलाकों में फिर से घने मैंग्रोव जंगल बनना मुश्किल होगा। लेकिन करीब दो दशक बाद इन उजड़े इलाकों में प्रकृति ने एक बार फिर अपना कमाल दिखाया है। यहां नए मैंग्रोव जंगल धीरे-धीरे विकसित हो रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने खोजा वापसी का कारण
भारतीय वन्यजीव संस्थान और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस प्राकृतिक बदलाव को समझने के लिए विस्तृत अध्ययन किया। वैज्ञानिकों ने उत्तर अंडमान के 18 अलग-अलग स्थानों पर करीब 300 हिस्सों का सर्वेक्षण किया। यह शोध 'बेसिक एंड एप्लाइड इकोलॉजी' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
अध्ययन का उद्देश्य केवल यह देखना नहीं था कि मैंग्रोव वापस आए हैं या नहीं। वैज्ञानिक यह जानना चाहते थे कि इतनी बड़ी प्राकृतिक तबाही के बाद मैंग्रोव दोबारा कैसे उग पाए और किन परिस्थितियों ने उनकी मदद की।
अध्ययन में सामने आया कि मैंग्रोव की वापसी केवल पुराने पेड़ों की नजदीकी पर निर्भर नहीं करती। इसमें पेड़ों की ऊंचाई, पानी की रासायनिक स्थिति, जमीन का प्रकार और समुद्र से आने वाला कचरा भी भूमिका निभा सकता है।
ऊंचे पेड़ बनाते हैं सुरक्षित माहौल
वैज्ञानिकों के अनुसार, मैंग्रोव की अच्छी बढ़त में पेड़ों की ऊंचाई सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है। जब शुरुआती दौर में कुछ मैंग्रोव पेड़ बड़े हो जाते हैं, तो उनकी शाखाएं और जड़ें आसपास के क्षेत्र को सुरक्षित बनाने लगती हैं।
मैंग्रोव की जटिल जड़ें समुद्र के पानी की तेज गति को कम करती हैं। इससे पानी के साथ आने वाली मिट्टी और दूसरी जरूरी सामग्री जड़ों के बीच जमा होने लगती है। इससे जमीन धीरे-धीरे स्थिर होती है और नई पौधों को जड़ जमाने के लिए बेहतर जगह मिलती है। इस तरह पुराने और मजबूत पेड़ नए पौधों के लिए एक तरह की प्राकृतिक सुरक्षा दीवार का काम करते हैं।
पानी का पीएच भी करता है असर
अध्ययन में पानी की रासायनिक स्थिति का भी महत्वपूर्ण असर पाया गया। वैज्ञानिकों ने देखा कि हल्के अम्लीय से लेकर सामान्य स्थिति वाले पानी में मैंग्रोव के नए पौधों के पनपने की संभावना ज्यादा थी।
इसके विपरीत, बहुत अधिक क्षारीय पानी में नए पौधों को परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में उनकी जड़ों का विकास और पोषक तत्वों को लेने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इससे साफ होता है कि किसी क्षेत्र में केवल खाली जमीन और पानी होना ही पर्याप्त नहीं है। पानी की गुणवत्ता भी मैंग्रोव के विकास के लिए बेहद जरूरी है।
जमीन की बनावट भी महत्वपूर्ण
भूकंप के कारण अलग-अलग जगहों पर जमीन अलग मात्रा में ऊपर उठी थी। कहीं नरम मिट्टी बची, तो कहीं कठोर और नुकीले मृत प्रवाल दिखाई देने लगे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जमीन की यह बनावट भी मैंग्रोव की वापसी को प्रभावित करती है।
नरम और स्थिर मिट्टी में पौधों के लिए जड़ जमाना आसान होता है, जबकि कठोर और अस्थिर सतह पर नए पौधों को टिके रहना मुश्किल हो सकता है।
समुद्री कचरे ने चौंकाया
अध्ययन का सबसे हैरान करने वाला परिणाम समुद्री कचरे से जुड़ा था। प्लास्टिक और मछली पकड़ने के पुराने जाल जैसे कचरे की मौजूदगी कुछ स्थानों पर मैंग्रोव की अधिक संख्या और विविधता से जुड़ी मिली। मैंग्रोव की जड़ों में यह कचरा फंस जाता है। इससे समुद्री लहरों की ताकत कुछ कम हो सकती है और पानी के साथ आने वाले मैंग्रोव के बीज, जिन्हें प्रोपेग्यूल कहा जाता है, जड़ों के बीच अटक सकते हैं। इससे उन्हें उगने के लिए स्थिर जगह मिल सकती है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि इसका मतलब यह नहीं है कि प्लास्टिक मैंग्रोव के लिए अच्छा है। इस संबंध को समझने के लिए अभी और प्रयोग की जरूरत है। समुद्री कचरा समुद्री जीवों और पूरे पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या बना हुआ है।
भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत
मैंग्रोव जंगल जलवायु परिवर्तन से लड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं। वे बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर जमा करते हैं और समुद्र की तेज लहरों, तूफानों तथा सुनामी से तटीय इलाकों की रक्षा भी करते हैं।
अंडमान में हुआ यह प्राकृतिक पुनरुद्धार वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद कर रहा है कि तबाह हो चुके तटीय क्षेत्रों में मैंग्रोव दोबारा कैसे विकसित हो सकते हैं। इससे भविष्य में दुनिया के दूसरे संवेदनशील समुद्री इलाकों में मैंग्रोव बचाने और बढ़ाने की बेहतर योजनाएं बनाई जा सकती हैं। सबसे बड़ी सीख यही है कि प्रकृति को सही परिस्थितियां मिलें तो वह बड़े से बड़े विनाश के बाद भी खुद को दोबारा खड़ा कर सकती है।