राजस्थान में रहस्यमयी कैराकल की गिनती और संरक्षण तेज, चार टाइगर रिजर्व में 18 महीने का बड़ा सर्वे शुरू

जैसलमेर में कैराकल की जलाकर हत्या के बाद वन विभाग ने ‘गोट बैंक’ योजना शुरू की, बकरी के बदले बकरी देकर बदले की हत्या रोकने और घासभूमि इकोसिस्टम बचाने की कोशिश
रणथंभौर में देखा गया कैराकल। फोटो : गोबिंद सागर भारद्वाज, निदेशक- डब्ल्यूडब्ल्यूआई
रणथंभौर में देखा गया कैराकल। फोटो : गोबिंद सागर भारद्वाज, निदेशक- डब्ल्यूडब्ल्यूआई
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राजस्थान में रहस्य और रोमांच से भरी कैट फैमिली की एक और सदस्य कैराकल के संरक्षण के प्रयास तेज हुए हैं। पिछले कुछ सालों से यहां के कई क्षेत्रों में कैराकल यानी सियाहगोश दिखाई दे रही हैं, लेकिन अब इसके कई जगह से ए कैटगरी यानी फोटोग्राफिक एविडेंस सामने आने के बाद वन विभाग ने कई संस्थाओं के साथ पिछले महीने एक प्रोजेक्ट शुरू किया है। कैराकल शर्मीली, बेहद कम दिखने वाली, लेकिन शातिर शिकारी बिल्लियों में से एक है।

15 अप्रैल को वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री, राजस्थान वन विभाग और टाइगर वॉच के बीच हुई बैठक में कैराकल (सियाहगोश) की गणना के संबंध में बड़े फैसले लिए गए। इसके तहत दो साल के अंदर कैराकल के संरक्षण की नीति बननी है।

अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक और मुख्य वन्यजीव वार्डन के.सी.ए. अरुण प्रसाद ने डाउन टू अर्थ को बताया कि प्रदेश के चार टाइगर रिजर्व सवाई माधोपुर, धौलपुर-करौली, बूंदी के रामगढ़ विषधारी और कोटा के मुकुंदरा टाइगर रिजर्व लैंडस्केप में अगले 18 महीनों में कैराकल की गणना की जाएगी।

गणना के दौरान ही सियाहगोश की आदतें, खान-पान, आवास और खतरों का भी अध्ययन किया जाएगा। इस अध्ययन के बाद आने वाली जानकारियों के आधार पर कैराकल संरक्षण की नीति बनाई जाएगी। सलीम अली पक्षीविज्ञान और प्राकृतिक इतिहास केंद्र की डॉ. शोमिता मुखर्जी गणना परियोजना का नेतृत्व करेंगी, जिसमें वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा। साथ ही कुछ अन्य संस्थाएं भी इसमें सहयोग करेंगी। राजस्थान वन विभाग इस परियोजना की अगुवाई कर रहा है।

यह प्रोजेक्ट 6 साल के लंबे इंतजार के बाद जमीन पर उतरता दिखाई दे रहा है। 2020 में रणथंभौर में 215 फोटो ट्रैप कैमरे लगाकर कैराकल के लिए विशेष अभियान चलाया गया था, जिसमें 35 कैराकल दिखीं। उसी समय से इस प्रोजेक्ट के लिए प्रयास किए जा रहे थे, जो अब जाकर शुरू हुआ है। 

इसके अलावा मार्च महीने में जैसलमेर जिले में भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास पशुपालकों द्वारा एक कैराकल को जलाकर मारने की घटना के बाद वहां भी संरक्षण के प्रयास तेज हुए हैं। वन विभाग ने गोट बैंक यानी बकरी बैंक शुरू करने की घोषणा की है।

इसके लिए काम शुरू कर दिया गया है। गोट बैंक इसीलिए बनाया जा रहा है क्योंकि मार्च में पशुपालकों ने 50 बकरियों के शिकार के शक में एक कैराकल को जिंदा जलाकर मार दिया था। इसीलिए वन विभाग ने रिवेंज किलिंग (बदली की हत्या) को रोकने के लिए यह बैंक शुरू किया है। इसके तहत अगर कैरेकल किसी की बकरी का शिकार करेगा, तो विभाग मुआवजे की कागजी कार्रवाई के बजाय सीधे बकरी बैंक से नई बकरी पशुपालक को सौंप देगा। प्लान यह भी है कि पशुपालकों को दी गई बकरी के बच्चों में से एक वापस गोट बैंक में लिया जाए ताकि बकरियों की संख्या कम ना हो।

कैराकल ग्रासलैंड इकोसिस्टम की सेहत का प्रतीक है। जहां कैराकल है, वहां का पर्यावरण स्वस्थ माना जाता है। वन विभाग सूत्रों के मुताबिक चार टाइगर रिजर्व में होने वाले सर्वे में अगर इनकी संख्या पर्याप्त मिली और ये प्राकृतिक रूप से ब्रीडिंग कर रहे हैं, तो सेंटर की जरूरत नहीं होगी। संख्या कम होने पर अगले चरण में ब्रीडिंग सेंटर स्थापित किया जाएगा।

कौन है रहस्यमयी कैराकल

आईयूसीन की रेड लिस्ट में शामिल कैराकल एक निशाचर यानी रात में शिकार करने वाला शातिर शिकारी जीव है। ये हवा में 10-12 फीट छलांग लगाकर पक्षियों को पकड़ लेता है। देश के 95% हिस्से से यह वन्य जीव विलुप्त हो चुका है। फिलहाल राजस्थान और गुजरात के कच्छ क्षेत्र में इसका मूवमेंट है। राजस्थान में पिछले कुछ सालों में कई जगह पर कैराकल देखा गया है। ज्यादा स्टडी ना होने के कारण इसके बारे में कई भ्रांतियां भी फैली हुई हैं।

जैसलमेर के 65 वर्षीय पर्यावरणविद् चतर सिंह जाम कहते हैं कि रामगढ़ क्षेत्र में कई सियाहगोश हैं। मैंने अपने जीवन में इनके पगमार्क पानी के पास नहीं देखे। रेगिस्तान में ये भेड़-बकरियों को गले से पकड़ कर उनका खून चूसता है और पीछे की ओर से मांस खाता है। हमारे इलाके में बड़ी संख्या में कैराकल हैं, लेकिन वन विभाग हमारे आंकड़ों को नहीं मानता। क्योंकि ये भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के पास रहते हैं और वहां किसी का भी आना-जाना नहीं होता। इसीलिए कभी आधिकारिक संख्या का ठीक आंकलन नहीं हुआ। 

पूर्वी राजस्थान के धौलपुर जिले में तीन साल पहले सरमथुरा के जंगलों में कैराकल दिखा था। धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व का काम देख रहे और वन विभाग में डीसीएफ आशीष व्यास से डाउन टू अर्थ ने बात की। वे बताते हैं, “हमने टाइगर की मॉनिटरिंग के लिए धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व में काफी कैमरा ट्रैप लगाए हुए हैं। इसमें हफ्ते में एक-दो बार कैराकल ट्रैप हो रही है। सवाईमाधोपुर में बाघों की संख्या बहुत है, इसीलिए हो सकता है कि जगह की तलाश में यह बिल्ली सरमथुरा रेंज में अपना हैबिटेट बना रही हों। पिछले महीने जो प्रोजेक्ट लॉंच हुआ है, उससे इसके संरक्षण को और बल मिलेगा।

हालांकि कई मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश में इसकी संख्या 50 के आसपास ही बताई जाती है, लेकिन जानकार मानते हैं कि राजस्थान में ही कैराकल सैंकड़ों की संख्या में हैं, लेकिन ए ग्रेड एविडेंस की कमी से आधिकारिक रूप से संख्या बताना थोड़ा मुश्किल होता है।

भारत के अलावा मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और सेंट्रल एशिया के जंगलों में भी कैराकल पाई जाती है। ये तेंदुआ और जंगली बिल्ली के बीच का वन्यजीव है।

कैराकल: एन इंटिमेट हिस्ट्री ऑफ ए मिस्ट्रियस कैट किताब के लेखक धर्मेंद्र खांडल कहते हैं, पिछले 20 साल में गुजरात के भुज, मध्यप्रदेश के दो जिले भिंड-मुरैना और राजस्थान के चार जिले धौलपुर, करौली, भरतपुर और सवाई माधोपुर में ही कैराकल दिखी है, लेकिन पिछले कुछ समय में ही राजस्थान के कई और जिलों में भी कैराकल की साइटिंग हुई है। बूंदी के रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व, कोटा का मुकुंदरा रिजर्व, धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व में सरमथुरा डांग क्षेत्र और बंध-बरैठा में कैराकल दिखाई दे रही हैं। इसके अलावा पश्चिमी राजस्थान के जैसलमेर में रामगढ़ क्षेत्र में कैराकल दिखाई दी है।

राजस्थान सहित देश में क्या है कैराकल का इतिहास और वर्तमान?

जर्नल ऑफ थ्रेटेंड टैक्सा में एक लेख छपा था। लेखक थे धर्मेंद्र कांडल, ईशान धर व गोडिला विश्वनाथ रेडी। यह लेख साल 1616 से अप्रैल 2020 के बीच कैराकल के ऐतिहासिक और वर्तमान की बात करता है।

लेख के अनुसार, “ इस अवधि के दौरान कुल 134 रिपोर्टों को संकलित किया। ऐतिहासिक रूप से, कैराकल की उपस्थिति भारत के 13 राज्यों और 26 जैविक प्रांतों में से 9 में दर्ज की गई थी। लेकिन 2001 के बाद से, इसकी मौजूदगी केवल 3 राज्यों और 4 जैविक प्रांतों तक सिमट गई है, जिनमें केवल 2 संभावित रूप से टिकाऊ आबादियां बची हैं।

1947 से पहले, कैराकल की मौजूदगी 7,93,927 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में दर्ज की गई थी। 1948 से 2000 के बीच, भारत में इसकी उपस्थिति के क्षेत्र में 47.99% की गिरावट आई। 2001 से 2020 के बीच, इसका विस्तार और अधिक घटकर 95.95% कम हो गया, जिससे वर्तमान में यह केवल 16,709 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र तक सीमित रह गया है—जो 1948-2000 की अवधि में दर्ज किए गए क्षेत्र का 5% से भी कम है।

1616 में मुगल बादशाह जहांगीर ने किया था कैराकल का शिकार

आजादी से पहले भारत में चीते के बाद कैराकल ही दूसरी ऐसी बिल्ली प्रजाति थी जिसे शाही और कुलीन वर्ग ने शिकार के लिए प्रशिक्षित किया था। साथ ही इसका शिकार भी किया गया। इसकी दुर्लभता की धारणा के कारण, शाही और कुलीन वर्ग के लिए कैराकल एक मूल्यवान शिकार पशु था और इसे मुख्य रूप से इसके फ़ारसी नाम सियाह-गोश (अर्थात् "काले कान वाला") से जाना जाता था। साल 1616 में मुगल बादशाह जहांगीर ने अजमेर में एक कैराकल का शिकार किया था।

साल 1935 में डूंगरपुर के उदय विलास पैलेस के पास नारा मगरा हिललॉक में भी कैराकल बिल्ली का शिकार किया गया। लेख के मुताबिक उदय विलास पैलेस के डाइनिंग हॉल में कैराकल का कटा सिर डिस्प्ले में लगा है।

डॉ. धर्मेंद्र खांडल की किताब में भी कुछ रोचक किस्से दर्ज किए गए हैं। इसमें औपनिवेशिक काल में कैराकल से जुड़ी एक कहानी काफी रोचक है। जिसमें बंगाल के नवाब मीर जाफर एक कैराकल बिल्ली को लंदन ले गए और वहां ये छोटी बिल्ली मीडिया की सुर्खियों में आ गई, लेकिन अंततः इंग्लैंड की ठंड से इसकी मृत्यु हो गई।

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