

चिंपैंजी और इंसानों में 98.8 प्रतिशत डीएनए समानता, भावनाओं और व्यवहार में भी दिखती है गहरी समानता।
जेन गुडॉल के शोध ने साबित किया कि चिंपैंजी औजार बना सकते हैं और उनका उपयोग भी कर सकते हैं।
जंगलों की कटाई, शिकार, बीमारी और जलवायु परिवर्तन से चिंपैंजी की संख्या लगातार तेजी से घट रही है।
विश्व चिंपैंजी दिवस पर संरक्षण की अपील, विलुप्ति के खतरे से बचाने के लिए वैश्विक प्रयासों की जरूरत।
अफ्रीका के संरक्षण केंद्र अनाथ और बचाए गए चिंपैंजी को सुरक्षित जीवन और लंबी देखभाल प्रदान कर रहे हैं।
हर साल 14 जुलाई को विश्व चिंपैंजी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को चिंपैंजी के बारे में जागरूक करना और उनके संरक्षण के लिए प्रयास बढ़ाना है। यह दिन साल 1960 की याद में मनाया जाता है, जब प्रसिद्ध वैज्ञानिक जेन गुडॉल ने तंजानिया के जंगलों में जाकर चिंपैंजी पर अपना ऐतिहासिक शोध शुरू किया था। उनका काम आज भी वन्यजीव विज्ञान के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण अध्ययनों में गिना जाता है।
चिंपैंजी इंसानों के सबसे करीबी जीवित रिश्तेदारों में से एक हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इंसानों और चिंपैंजी के डीएनए में लगभग 98.8 प्रतिशत समानता है। इसके अलावा चिंपैंजी में कई ऐसे व्यवहार भी देखे जाते हैं जो इंसानों से मिलते-जुलते हैं।
भावनाओं को समझने वाले जीव हैं चिंपैंजी
चिंपैंजी केवल बुद्धिमान ही नहीं, बल्कि भावनाओं को समझने वाले जीव भी हैं। वे अपने समूह के दूसरे सदस्यों के साथ मजबूत संबंध बनाते हैं। वे एक-दूसरे को गले लगाते हैं, दुख के समय सांत्वना देते हैं और अपने साथियों की मौत पर शोक जैसी भावनाएं भी दिखाते हैं।
वैज्ञानिकों ने लंबे समय तक चिंपैंजी के समूहों का अध्ययन किया है। इस दौरान उन्होंने देखा कि चिंपैंजी एक-दूसरे की मदद करते हैं और आपसी संबंधों को बनाए रखते हैं। उनके बीच प्यार, सहयोग और सहानुभूति जैसे गुण दिखाई देते हैं।
चिंपैंजी भी बनाते हैं और इस्तेमाल करते हैं औजार
चिंपैंजी की सबसे खास बातों में से एक है कि वे औजारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। जेन गुडॉल ने वर्ष 1960 में तंजानिया के गोंबे जंगल में एक चिंपैंजी को लकड़ी की टहनी से दीमक निकालते हुए देखा था। यह पहली बार था जब किसी ने देखा कि चिंपैंजी खुद औजार बनाकर उनका उपयोग करते हैं।
इस खोज ने वैज्ञानिकों की पुरानी सोच को बदल दिया, क्योंकि उस समय माना जाता था कि केवल इंसान ही औजार बना और इस्तेमाल कर सकते हैं।
चिंपैंजी के अलग-अलग समूहों में औजारों का इस्तेमाल करने के तरीके भी अलग होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके बीच भी अलग-अलग परंपराएं होती हैं। बदलते पर्यावरण के अनुसार वे अपने व्यवहार में बदलाव भी कर सकते हैं। कुछ चिंपैंजी अब इंसानों द्वारा उगाए गए खेतों की फसलों का उपयोग भोजन के रूप में करने लगे हैं।
जेन गुडॉल का ऐतिहासिक योगदान
जेन गुडॉल ने चिंपैंजी के जीवन को समझने में बहुत बड़ा योगदान दिया। उन्होंने पता लगाया कि चिंपैंजी समूह में शिकार करते हैं और मांस खाते हैं। उन्होंने यह भी देखा कि चिंपैंजी परिवार लंबे समय तक एक साथ रहते हैं और उनके बीच गहरे रिश्ते होते हैं।
गोंबे में उनका अध्ययन दुनिया में जंगली जानवरों पर किए गए सबसे लंबे शोधों में से एक बन गया। अपने लगभग 65 साल के करियर में उन्होंने हजारों घंटों के अध्ययन और नोट्स के माध्यम से चिंपैंजी के व्यवहार को समझने में मदद की।
चिंपैंजी आज गंभीर खतरे में हैं
एक समय अफ्रीका के 25 देशों में करीब 10 से 20 लाख चिंपैंजी पाए जाते थे। आज उनकी संख्या बहुत कम हो गई है। अनुमान के अनुसार, जंगलों में अब लगभग तीन से चार लाख चिंपैंजी ही बचे हैं। कुछ संस्थाओं के अनुसार यह संख्या इससे भी कम हो सकती है।
सभी चिंपैंजी प्रजातियां संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल हैं, लेकिन पश्चिमी चिंपैंजी की स्थिति सबसे गंभीर है। अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) ने इसे "अत्यंत संकटग्रस्त" घोषित किया है। वर्ष 1990 से 2014 के बीच पश्चिमी चिंपैंजी की संख्या में करीब 80 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई।
जंगलों की कटाई और शिकार बड़ी समस्या
चिंपैंजी के लिए सबसे बड़ा खतरा जंगलों की कटाई है। खेती और लकड़ी के लिए बड़े पैमाने पर जंगल नष्ट किए जा रहे हैं, जिससे उनका प्राकृतिक घर खत्म हो रहा है।
इसके अलावा चिंपैंजी का अवैध शिकार, बीमारियां और छोटे चिंपैंजी को पकड़कर पालतू जानवरों के व्यापार में बेचना भी बड़ी समस्याएं हैं।
संरक्षण केंद्र दे रहे हैं नई उम्मीद
जिन चिंपैंजी को जंगलों से बचाया जाता है, उनके लिए संरक्षण केंद्र जीवन बचाने की जगह बनते हैं। अफ्रीका में कई ऐसे केंद्र हैं जहां घायल और अनाथ चिंपैंजी की देखभाल की जाती है।
सिएरा लियोन का टैकुगामा चिंपैंजी अभयारण्य और युगांडा का नगांबा द्वीप ऐसे ही उदाहरण हैं। यहां बचाए गए चिंपैंजी को सुरक्षित वातावरण दिया जाता है।
चिंपैंजी लंबे समय तक जीवित रहते हैं और 50 से 60 साल तक की उम्र तक पहुंच सकते हैं। इसलिए इन संरक्षण केंद्रों को कई दशकों तक उनकी देखभाल करनी पड़ती है।
विश्व चिंपैंजी दिवस हमें याद दिलाता है कि ये जीव केवल जंगलों का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के ऐसे साथी हैं जिनके साथ हमारा गहरा संबंध है। उनकी रक्षा करना प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करना है।