

उत्तराखंड के ओसला गांव में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने खोजी हिमालय की नई पौध प्रजाति ‘बुप्ल्यूरम ओस्लेंस’।
समुद्र तल से 2,550 मीटर ऊंचाई पर मिली नई प्रजाति, डीएनए जांच और वैज्ञानिक अध्ययन से हुई पहचान की पुष्टि।
80 सेंटीमीटर तक ऊंचा होता है पौधा, लालिमा वाले पत्ते, बड़े सहपत्र और अनोखे फल इसकी खास पहचान हैं।
ओसला गांव के आसपास चार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मिले महज तीन वयस्क पौधे, विलुप्ति का गंभीर खतरा बरकरार है।
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ ने नई प्रजाति को गंभीर रूप से संकटग्रस्त घोषित किया, संरक्षण और नियमित निगरानी की जरूरत।
हिमालय की वादियों में प्रकृति आज भी अपने अनगिनत रहस्य छिपाए बैठी है। यहां के घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और कलकल बहते झरनों के बीच वैज्ञानिकों को एक ऐसा पौधा मिला है, जिसे दुनिया अब तक नहीं जानती थी। लेकिन इस नई खोज की खुशी के साथ एक चिंता भी जुड़ी है। जिस पौधे ने भारतीय वनस्पति विज्ञान को एक नई पहचान दी है, उसके अस्तित्व पर ही संकट मंडरा रहा है। वैज्ञानिकों को इसकी पूरी आबादी में महज तीन वयस्क पौधे मिले हैं।
भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण (बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में इस नई प्रजाति की खोज की है। इसका नाम ‘बुप्ल्यूरम ओस्लेंस’ रखा गया है। यह एक बहुवर्षीय शाकीय पौधा है, जो हर साल नहीं, बल्कि कई वर्षों तक जीवित रहता है। यह शोध नॉर्डिक जर्नल ऑफ बॉटनी में प्रकाशित किया गया है।
ओसला गांव के पास चट्टानों में मिला अनमोल खजाना
इस नई प्रजाति की कहानी जुलाई 2024 में शुरू हुई, जब वैज्ञानिकों की टीम उत्तराखंड के गोविंद पशु विहार राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभयारण्य में वनस्पति सर्वेक्षण के लिए पहुंची थी। इसी दौरान सांकरी क्षेत्र के पास स्थित ओसला गांव (उत्तरकाशी जिला) के नजदीक एक छोटी जलधारा के किनारे चट्टानी दीवारों पर यह पौधा दिखाई दिया।
समुद्र तल से करीब 2,550 मीटर की ऊंचाई पर मिले इस पौधे ने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा। पहली नजर में यह बुब्ल्यूरम वंश की दूसरी प्रजातियों जैसा लगा, लेकिन इसके पत्तों, फूलों और फलों की बनावट में कुछ खास अंतर दिखाई दिए। पौधे के नमूने जुटाए गए। डीएनए जांच के लिए इसकी ताजी पत्तियों को सिलिका जेल में सुरक्षित रखा गया, ताकि प्रयोगशाला में उनका वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सके।
डीएनए जांच ने खोला नई प्रजाति का राज
किसी पौधे को नई प्रजाति घोषित करना केवल उसके अलग दिखने से संभव नहीं होता। इसके लिए वैज्ञानिकों को कई स्तरों पर प्रमाण जुटाने पड़ते हैं।
शोधकर्ताओं ने पौधे के जीनोमिक डीएनए को अलग कर उसके इंटरनल ट्रांसक्राइब्ड स्पेसर (आईटीएस) क्षेत्र का विश्लेषण किया। इसके बाद मैक्सिमम लाइकलिहुड और बेयेजियन इन्फरेंस जैसी आधुनिक तकनीकों से आनुवंशिक संबंधों की जांच की गई।
वैज्ञानिकों ने भारत ही नहीं, बल्कि चीन और भूटान सहित विभिन्न देशों के हर्बेरियम यानी संरक्षित पौधों के संग्रह में मौजूद नमूनों से भी इसकी तुलना की। इन अध्ययनों से पुष्टि हुई कि ओसला में मिला पौधा वास्तव में विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति है।
80 सेंटीमीटर तक ऊंचा, पत्तियों पर लालिमा
‘बुप्ल्यूरम ओस्लेंस’ की अपनी कुछ खास पहचान हैं। यह पौधा करीब 80 सेंटीमीटर तक ऊंचा हो सकता है। इसका तना मजबूत और बनावट अपेक्षाकृत ठोस होती है। इसकी निचली पत्तियां संकरी, जबकि ऊपर की पत्तियां अपेक्षाकृत चौड़ी होती हैं। पत्तियों के किनारों पर लालिमा भी दिखाई देती है।
इसके फूलों के आसपास तीन से पांच बड़े सहपत्र होते हैं। फूलों के गुच्छों में 10 से 20 तक छोटे फूल पाए जाते हैं। इसके फल चौड़े अंडाकार होते हैं और उनकी पसलियों पर हल्के उभरे हुए पंख जैसे हिस्से दिखाई देते हैं।
यह अपने करीबी रिश्तेदार चीनी प्रजाति ‘बुप्ल्यूरम पेटिओलैटम’ से मिलता-जुलता जरूर है, लेकिन पत्तियों, सहपत्रों, फूलों और फलों की बनावट इसे अलग पहचान देती है।
नाम में बसा है ओसला गांव
इस पौधे का वैज्ञानिक नाम भी इसकी खोज की जगह से जुड़ा है। ‘ओस्लेंस’ शब्द ओसला गांव के नाम से लिया गया है। यानी दुनिया के वनस्पति विज्ञान के नक्शे पर अब इस छोटे से हिमालयी गांव की पहचान भी दर्ज हो गई है।
खोज से बड़ी चिंता, कहीं हमेशा के लिए न खो जाए पौधा
इस खोज का सबसे चिंताजनक पहलू इसकी बेहद छोटी आबादी है। शोधकर्ताओं को करीब चार वर्ग किलोमीटर के सीमित क्षेत्र में केवल एक आबादी मिली, जिसमें महज तीन परिपक्व पौधे मौजूद थे। इसी आधार पर अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के मानकों के तहत इसे ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ यानी गंभीर रूप से संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है।
यह दर्जा केवल एक वैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं, बल्कि प्रकृति की ओर से खतरे की घंटी है। इतनी छोटी आबादी वाले पौधे को प्राकृतिक बदलाव, आवास के नष्ट होने और अन्य स्थानीय दबावों से बड़ा नुकसान पहुंच सकता है।
हिमालय को बचाना होगा, तभी बचेंगी ऐसी प्रजातियां
‘बुप्ल्यूरम ओस्लेंस’ की खोज बताती है कि हिमालय की जैव विविधता अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है। पहाड़ों के छोटे-छोटे हिस्सों में ऐसी वनस्पतियां छिपी हो सकती हैं, जिनका अस्तित्व विज्ञान के लिए भी नया हो।
लेकिन केवल नई प्रजाति का नाम दर्ज कर देना काफी नहीं है। इसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा, नियमित निगरानी और पौधों की संख्या बढ़ाने के प्रयास जरूरी हैं।
ओसला की चट्टानों पर उगा यह नन्हा पौधा आज दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए बड़ी उपलब्धि है। सवाल बस इतना है कि क्या हम इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए बचा पाएंगे? हिमालय ने हमें एक नया खजाना दिया है, अब उसकी हिफाजत हमारी जिम्मेदारी है।