भारतीय मॉनसून को बदल रहा है अटलांटिक का 'कोल्ड ब्लॉब', उत्तर-पश्चिम की ओर मुड़ सकती है बारिश

अटलांटिक महासागर के ठंडे जल क्षेत्र का असर: वैज्ञानिकों ने भारतीय मानसून में बदलाव का नया कारण खोजा, उत्तर-पश्चिम भारत में बढ़ रही बारिश
वैज्ञानिकों का मानना है कि बेहतर जलवायु मॉडल भविष्य में मानसून, सूखा और बाढ़ की अधिक सटीक भविष्यवाणी करेंगे।
वैज्ञानिकों का मानना है कि बेहतर जलवायु मॉडल भविष्य में मानसून, सूखा और बाढ़ की अधिक सटीक भविष्यवाणी करेंगे।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • पिछले 25 वर्षों में भारतीय मानसून का स्वरूप बदला है, उत्तर-पश्चिम भारत में बारिश बढ़ी जबकि कई क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ा।

  • वैज्ञानिकों ने पाया कि अटलांटिक महासागर के दक्षिणी ग्रीनलैंड क्षेत्र का ठंडा जल भारतीय मानसून को प्रभावित कर रहा है।

  • शोध के अनुसार, "कोल्ड ब्लॉब" जेट स्ट्रीम को बदलकर अधिक नमी उत्तर-पश्चिम भारत की ओर खींचता है।

  • बारोट्रॉपिक गवर्नर तंत्र बड़े वायुमंडलीय पैटर्न द्वारा छोटे मौसमीय तंत्रों को नियंत्रित कर वर्षा वितरण बदलता है।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि बेहतर जलवायु मॉडल भविष्य में मानसून, सूखा और बाढ़ की अधिक सटीक भविष्यवाणी करेंगे।

भारत में मानसून करोड़ों लोगों के जीवन और आजीविका का आधार है। खेती, पेयजल और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर करता है। पिछले लगभग 25 वर्षों में भारतीय मानसून के स्वरूप में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। उत्तर-पश्चिम भारत में पहले की तुलना में अधिक बारिश हो रही है, जबकि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में कई जगह बारिश की कमी के कारण सूखे जैसी स्थिति बनने लगी है।

वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे थे कि मानसून में यह बदलाव क्यों आ रहा है। हालांकि, अब तक उपयोग किए जा रहे कई जलवायु मॉडल इन परिवर्तनों का सही अनुमान लगाने में सफल नहीं रहे हैं।

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अटलांटिक महासागर से जुड़ा है संबंध

हाल ही में एजीयू एडवांसेज में प्रकाशित एक शोध में वैज्ञानिकों ने मानसून के इस बदलाव का नया कारण बताया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान जलवायु मॉडल अटलांटिक महासागर के तापमान में होने वाले बदलावों और उनके दुनिया के अन्य हिस्सों पर पड़ने वाले प्रभावों को सही ढंग से नहीं समझ पाते हैं।

विशेष रूप से, वैज्ञानिकों ने एक ऐसे क्षेत्र पर ध्यान दिया है जिसे "कोल्ड ब्लॉब" कहा जाता है। यह उत्तरी अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के दक्षिण में स्थित ठंडे पानी का एक बड़ा क्षेत्र है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह क्षेत्र वैश्विक मौसम प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है।

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जेट स्ट्रीम पर पड़ता है असर

अध्ययन में पाया गया कि जब जलवायु मॉडल में कोल्ड ब्लॉब के प्रभाव को शामिल किया गया, तो परिणाम काफी अलग दिखाई दिए। इस ठंडे पानी के क्षेत्र का असर जेट स्ट्रीम पर पड़ता है। जेट स्ट्रीम वातावरण में बहुत तेज गति से बहने वाली वायु धाराएं होती हैं, जो मौसम को प्रभावित करती हैं।

कोल्ड ब्लॉब के कारण जेट स्ट्रीम की दिशा और व्यवहार में बदलाव आता है। इससे अधिक नमी उत्तर-पश्चिम भारत की ओर खिंचती है, जिसके कारण वहां बारिश बढ़ जाती है। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में तूफानी प्रणालियों के बनने की संभावना कम हो जाती है, जिससे वर्षा घट सकती है।

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बारोट्रॉपिक गवर्नर तंत्र क्या है?

वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को "बारोट्रॉपिक गवर्नर मैकेनिज्म" नाम दिया है। इसका अर्थ है कि बड़े पैमाने पर बनने वाली वायु प्रणालियां छोटे पैमाने की मौसम प्रणालियों को नियंत्रित या कमजोर कर देती हैं।

जब बड़े स्तर की हवाएं मजबूत हो जाती हैं, तो वे छोटे तूफानों और मौसमीय गतिविधियों को विकसित होने से रोक सकती हैं। इससे वर्षा और मौसम के पैटर्न में व्यापक बदलाव देखने को मिलते हैं।

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भविष्य की भविष्यवाणी होगी बेहतर

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तंत्र केवल भारतीय मानसून को ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई मध्य-अक्षांश क्षेत्रों में बढ़ी हुई तूफानी गतिविधियों को भी समझाने में मदद कर सकता है।

इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी के एक हिस्से में होने वाले बदलाव दूसरे हिस्सों के मौसम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए भविष्य के जलवायु मॉडलों में इन वैश्विक संबंधों को बेहतर तरीके से शामिल करना आवश्यक है।

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वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि जलवायु मॉडल अटलांटिक महासागर और भारतीय मानसून के बीच इस संबंध को सही ढंग से समझ सकें, तो भविष्य में मानसून, सूखे और बाढ़ जैसी घटनाओं की अधिक सटीक भविष्यवाणी की जा सकेगी। इससे करोड़ों लोगों को मौसम संबंधी खतरों से निपटने में मदद मिलेगी।

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