

मुंबई में मानसून की देरी के बाद बारिश शुरू हुई, लोगों को भीषण गर्मी से कुछ राहत मिली लेकिन असमान वर्षा जारी।
अब तक देश में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज, जिससे कृषि और जल संसाधनों पर गंभीर चिंता बढ़ी।
एल नीनो प्रभाव के कारण भारत में मानसून कमजोर रहने की आशंका, मौसम पैटर्न में अनिश्चितता लगातार बनी हुई है।
मुंबई में जल संकट के चलते प्रशासन ने पानी उपयोग पर प्रतिबंध लगाए, स्विमिंग पूल और निर्माण कार्य प्रभावित हुए।
सरकार ने 315 संवेदनशील जिलों के लिए योजना बनाई, जल संरक्षण और तालाबों, बांधों की मरम्मत पर विशेष जोर दिया गया।
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में लंबे इंतजार के बाद आखिरकार दक्षिण-पश्चिम मानसून ने दस्तक दे दी है। 23 जून को शहर में भारी बारिश दर्ज की गई, जिससे भीषण गर्मी से परेशान लोगों को कुछ राहत मिली। पिछले कई हफ्तों से तापमान लगातार बहुत ज्यादा बना हुआ था और उमस ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया था।
बारिश आने के बाद लोगों ने राहत की सांस ली, लेकिन यह बारिश पूरे शहर में समान रूप से नहीं हुई। कुछ इलाकों में तेज बारिश हुई, जबकि कई उपनगरों में केवल हल्की बूंदाबांदी ही देखने को मिली।
मानसून में इस बार कमी की आशंका
भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के आंकड़ों के अनुसार, इस साल अब तक देश में सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। जून के मध्य तक लगभग 60.6 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य औसत से लगभग 43 प्रतिशत कम है। यह स्थिति किसानों और नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय बनी हुई है क्योंकि भारत में खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर है।
मानसून का समय हर साल जून से सितंबर तक होता है और इसी दौरान देश की लगभग 70 से 80 प्रतिशत वार्षिक बारिश होती है। अगर बारिश कम होती है तो इसका सीधा असर फसलों, जलाशयों और पीने के पानी की उपलब्धता पर पड़ता है।
गर्मी और पानी की समस्या
बारिश में देरी और कम वर्षा के कारण कई शहरों में पानी की समस्या बढ़ने लगी है। मुंबई में भी प्रशासन ने पानी के उपयोग पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं। स्विमिंग पूल और निर्माण कार्यों में पानी के उपयोग को सीमित किया गया है ताकि पानी की बचत की जा सके।
गर्मी के कारण रात के समय भी लोगों को आराम नहीं मिल पा रहा था। कई लोग खुले स्थानों या समुद्र तटों पर सोने को मजबूर हुए ताकि उन्हें थोड़ी ठंडक मिल सके। जिन घरों में एयर कंडीशनर की सुविधा नहीं है, वहां स्थिति और कठिन बनी रही।
एल नीनो का असर
विशेषज्ञों के अनुसार इस साल बारिश की कमी का एक बड़ा कारण “एल नीनो” नामक प्राकृतिक जलवायु घटना भी है। यह एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है और इससे दुनिया भर में हवा और बारिश के पैटर्न बदल जाते हैं।
भारत में एल नीनो के दौरान अक्सर बारिश कम हो जाती है। इसका असर खासकर कृषि पर पड़ता है क्योंकि खेतों की सिंचाई पूरी तरह मानसून की बारिश पर निर्भर होती है। पिछले वर्षों में भी एल नीनो के कारण कई जगह सूखे जैसे हालात बने थे और तापमान भी अधिक दर्ज किया गया था।
सरकार की तैयारी और किसानों की चिंता
कम बारिश की आशंका को देखते हुए सरकार ने कई कदम उठाने की बात कही है। देश के लगभग 315 जिलों को संवेदनशील मानकर वहां विशेष योजनाएं तैयार की जा रही हैं। जल संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है और तालाबों, बांधों तथा जलाशयों की मरम्मत के निर्देश दिए गए हैं।
पानी की हर बूंद की बचत जरूरी है और इसी को ध्यान में रखकर योजनाएं बनाई जा रही हैं। किसानों को भी सलाह दी गई है कि वे बदलते मौसम के अनुसार खेती की योजना बनाएं ताकि नुकसान कम हो सके।
कृषि और आम जीवन पर असर
भारत में बड़ी आबादी की आजीविका खेती पर निर्भर है। अगर मानसून कमजोर रहता है तो धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों पर सीधा असर पड़ता है। इससे खाद्य उत्पादन कम हो सकता है और कीमतों में भी वृद्धि हो सकती है।
शहरों में रहने वाले लोगों पर भी इसका असर दिखाई देता है क्योंकि पानी की कमी और गर्मी दोनों ही जीवन को कठिन बना देती हैं।
मुंबई में मानसून की शुरुआत ने लोगों को राहत जरूर दी है, लेकिन बारिश का पैटर्न अभी भी अनिश्चित बना हुआ है। कम वर्षा और एल नीनो जैसी परिस्थितियों के कारण आने वाले दिनों में चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में जल संरक्षण और समझदारी से पानी के उपयोग की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा हो गई है।