

राजस्थान की राजधानी जयपुर के वसुंधरा विहार इलाके में भूजल के कथित अवैध कारोबार और अंधाधुंध दोहन का मामला सामने आया है।
आरोप है कि सिरसी क्षेत्र में ‘बालाजी वाटर सप्लायर्स’ के नाम पर विशाल भूमिगत टैंक बनाकर शक्तिशाली पंपों से हर दिन हजारों लीटर पानी निकाला जा रहा था।
इस कथित गतिविधि से आसपास के घरेलू कुओं में पानी घटने और मालाबार नीम के पेड़ों से विकसित एक छोटे वन क्षेत्र पर संकट मंडराने की शिकायत की गई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 26 अक्टूबर 2026 को तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित कर जांच के निर्देश दिए हैं। समिति को मौके का निरीक्षण कर चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट सौंपनी होगी।
राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भूजल विभाग और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
जांच में यह पता लगाया जाएगा कि भूजल निकालने के लिए जरूरी अनुमति ली गई थी या नहीं और स्थानीय जलस्रोतों व हरियाली को कितना नुकसान पहुंचा है। यह मामला याद दिलाता है कि भूजल केवल कारोबार का साधन नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी और प्रकृति का आधार है। इसकी हर बूंद की कीमत है।
राजस्थान की राजधानी जयपुर में भूजल की कथित लूट और उसके काले कारोबार का मामला सामने आया है। आरोप है कि वसुंधरा विहार के सिरसी इलाके में ‘बालाजी वाटर सप्लायर्स’ के नाम पर बड़े पैमाने पर अवैध रूप से भूजल निकाला और बेचा जा रहा था। इस गतिविधि से इलाके का भूजल स्तर गिरने, घरों के कुएं सूखने और पेड़-पौधों पर संकट मंडराने की शिकायत सामने आई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 26 अक्टूबर 2026 को तीन सदस्यीय संयुक्त समिति गठित कर जांच के निर्देश दिए। समिति को मौके का निरीक्षण करना होगा और चार सप्ताह के भीतर कार्रवाई संबंधी रिपोर्ट अदालत में सौंपनी होगी।
एनजीटी ने इस मामले में राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राजस्थान भूजल विभाग और केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करने के निर्देश भी दिए हैं।
आवेदक के मुताबिक, इलाके में करीब 25 × 25 × 25 फीट का एक विशाल भूमिगत जलाशय बनाया गया है। आरोप है कि बिजली से चलने वाले शक्तिशाली औद्योगिक पंपों की मदद से हर दिन हजारों लीटर भूजल निकाला जा रहा था।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि पंपों को सार्वजनिक सड़क पर लगे बिजली के खंभे से जोड़ा गया था और पानी निकालने के लिए अवैध रूप से व्यावसायिक बिजली कनेक्शन का इस्तेमाल किया जा रहा था।
ऐसे में यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला केवल अवैध भूजल कारोबार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग और स्थानीय पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान की गंभीर तस्वीर भी सामने लाएगा।
भूजल किसी भी बस्ती की जीवनरेखा है। घरों में पीने, खाना बनाने और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इसी पानी पर निर्भरता रहती है। ऐसे में बड़े पैमाने पर भूजल के दोहन का असर सीधे स्थानीय लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है।
आवेदक ने दावा किया है कि कथित अवैध निकासी के कारण आसपास के घरेलू कुओं में पानी कम हो रहा है और वे सूखने की कगार पर पहुंच गए हैं। इससे इलाके के निवासियों के लिए जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है।
इस गतिविधि से मेलिया डुबिया (मालाबार नीम) के पेड़ों से विकसित एक हरे-भरे छोटे वन क्षेत्र पर भी खतरा मंडराने की आशंका जताई गई है। भूजल में गिरावट का असर पेड़-पौधों की वृद्धि और उनके जीवित रहने की क्षमता पर पड़ सकता है, खासकर तब जब वे लंबे समय तक जमीन के पानी पर निर्भर हों।
अब एनजीटी के निर्देशों के बाद संयुक्त समिति की जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि भूजल निकासी के लिए जरूरी अनुमति ली गई थी या नहीं, बिजली के इस्तेमाल में नियमों का उल्लंघन हुआ या नहीं और स्थानीय जलस्रोतों तथा हरियाली को इससे कितना नुकसान पहुंचा है।
यह मामला एक अहम सवाल भी उठाता है, जब भूजल लोगों की बुनियादी जरूरत और पर्यावरण का आधार है, तो क्या कोई इसे मनमाने ढंग से निकालकर व्यावसायिक मुनाफे का साधन बना सकता है? ऐसे में इसका जवाब अब जांच और संबंधित विभागों की कार्रवाई से ही सामने आएगा।