डिजिटल खेती में महिलाओं को मिले बराबरी का हक, सिर्फ आंकड़ों में न सिमटे उनकी भागीदारी

एआई और नई तकनीक से बदल सकती है खेती की तस्वीर, लेकिन आर्थिक तंगी और कर्ज की मुश्किलें बन रही हैं बड़ी रुकावट
डिजिटल खेती में महिलाओं को मिले बराबरी का हक, एआई और नई तकनीक का लाभ पहुंचाने के लिए सस्ता कर्ज और प्रशिक्षण जरूरी।
डिजिटल खेती में महिलाओं को मिले बराबरी का हक, एआई और नई तकनीक का लाभ पहुंचाने के लिए सस्ता कर्ज और प्रशिक्षण जरूरी।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • डिजिटल खेती में महिलाओं को मिले बराबरी का हक, एआई और नई तकनीक का लाभ पहुंचाने के लिए सस्ता कर्ज और प्रशिक्षण जरूरी।

  • महिला किसानों की आर्थिक आजादी पर जोर, बिना संपत्ति गिरवी रखे कर्ज मिलने से छोटे कारोबार और खेती को मिल सकता है बढ़ावा।

  • मोबाइल से कर्ज मिला तो बढ़ा महिलाओं का मुनाफा, युगांडा के अध्ययन में नकद कर्ज की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक लाभ दर्ज।

  • डिजिटल तकनीक से बढ़ेगा महिलाओं का आत्मविश्वास, बांग्लादेश में महिला किसान सीख रहीं हिसाब-किताब, निवेश योजना और कारोबार प्रबंधन के नए तरीके।

  • महिलाओं तक तकनीक पहुंचाना ही काफी नहीं, सरकारी और निजी निवेश से उनकी आमदनी, निर्णय क्षमता और आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ाना भी जरूरी है।

खेती-किसानी में अब तकनीक का दखल तेजी से बढ़ रहा है। मौसम की जानकारी देने वाले मोबाइल ऐप, कीटों से फसल बचाने वाली डिजिटल सलाह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसी नई तकनीकें किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन सुविधाओं का फायदा महिलाओं को भी बराबरी से मिल रहा है? अगर महिलाओं के पास तकनीक इस्तेमाल करने के साधन ही नहीं होंगे, तो डिजिटल खेती का सपना अधूरा ही रहेगा।

विश्व बैंक की वरिष्ठ कृषि सलाहकार और ग्लोबल एग्रीकल्चर एंड फूड सिक्योरिटी प्रोग्राम (जीएएफएसपी) की प्रमुख के मुताबिक, महिलाओं को डिजिटल तकनीक से जोड़ना भर काफी नहीं है। उन्हें इन सुविधाओं का खर्च उठाने, इनके इस्तेमाल का हुनर सीखने और इनसे होने वाली कमाई पर अपना अधिकार रखने का मौका भी मिलना चाहिए।

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संकट की मार, महिलाओं पर ज्यादा बोझ

दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा, युद्ध और बढ़ती महंगाई जैसे कई संकटों से जूझ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में संघर्ष के कारण उर्वरकों की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। वहीं, मौसम की मार किसानों की मुश्किलें और बढ़ा रही है। इन हालात में छोटे किसानों के लिए खेती करना पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। महिला किसानों के सामने तो आर्थिक संसाधनों, जमीन और पानी तक सीमित पहुंच जैसी अतिरिक्त परेशानियां भी हैं।

वैश्विक कृषि अनुसंधान नेटवर्क सीजीआईएआर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत है। वहीं, खेती से जुड़े अन्य खाद्य व्यवसायों में काम करने वालों में महिलाओं की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत है। इसके बावजूद उनकी कमाई, फैसले लेने की ताकत और आर्थिक सुरक्षा कई बाधाओं से प्रभावित होती है।

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बिना गारंटी भी मिल सकता है कर्ज

महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारने में आसान कर्ज बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन गरीब परिवारों की कई महिलाओं के पास जमीन, मकान या दूसरी संपत्ति नहीं होती, जिसे बैंक में गिरवी रखकर कर्ज लिया जा सके।

शोध में इथियोपिया में हुए एक प्रयोग का जिक्र किया गया। विश्व बैंक की अफ्रीका जेंडर इनोवेशन लैब के सहयोग से वहां महिला उद्यमियों को मनोवैज्ञानिक आकलन के आधार पर कर्ज देने की व्यवस्था की गई। इसमें पारंपरिक संपत्ति की गारंटी के बजाय महिलाओं की सोच और व्यवहार से जुड़े आकलन के आधार पर उनकी कर्ज चुकाने की क्षमता का अनुमान लगाया गया।

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शोधकर्ता के अनुसार, इस सुविधा की पेशकश पाने वाली 89 प्रतिशत महिलाओं ने तीन साल के दौरान औपचारिक रूप से कर्ज लिया, जबकि तुलना वाले समूह में यह आंकड़ा 42 प्रतिशत था। इस तरह तकनीक ने उन महिलाओं के लिए भी वित्तीय सहायता का रास्ता खोला, जिनके पास गिरवी रखने के लिए संपत्ति नहीं थी।

मोबाइल से मिले पैसा, तो बढ़े कमाई का मौका

युगांडा में हुए एक अध्ययन से पता चला कि मोबाइल मनी खातों के जरिए कर्ज पाने वाली महिलाओं का मुनाफा नकद में कर्ज पाने वाली महिलाओं के मुकाबले 15 प्रतिशत अधिक था। इससे साफ होता है कि केवल पैसा देना ही जरूरी नहीं, बल्कि पैसा किस तरह दिया जाता है, यह भी मायने रखता है। महिलाओं के अपने नियंत्रण वाले खातों से उनकी आर्थिक स्वतंत्रता मजबूत हो सकती है।

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डिजिटल जानकारी से बढ़ेगा महिलाओं का आत्मविश्वास

बांग्लादेश में जीएएफएसपी की मदद से चल रही एक परियोजना महिलाओं को डिजिटल तकनीक के जरिए आगे बढ़ने का अवसर दे रही है। स्थानीय आलू उत्पादक सहकारी संस्था की महिला सदस्यों को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के रूरलइन्वेस्ट डिजिटल टूल से जोड़ा जा रहा है। इसकी मदद से वे हिसाब-किताब रखने, वित्तीय रिकॉर्ड तैयार करने और निवेश की योजना बनाने का काम सीख रही हैं।

इससे महिलाएं केवल तकनीक इस्तेमाल करने वाली नहीं, बल्कि कारोबार को समझने और फैसलों में भाग लेने वाली सदस्य भी बन रही हैं। उनका आत्मविश्वास बढ़ रहा है और रोजगार के नए अवसर खुल रहे हैं।

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निवेश बढ़े, तभी बदलेगी तस्वीर

जीएएफएसपी ने साल 2010 से अब तक कम आय वाले देशों में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की 300 से अधिक परियोजनाओं में करीब 2.5 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है। इसके लाभार्थियों में लगभग 41 प्रतिशत महिलाएं हैं।

शोधकर्ता का मानना है कि सरकारी और निजी निवेश को मिलाकर महिलाओं के लिए कर्ज, प्रशिक्षण और डिजिटल सुविधाएं सुलभ बनानी होंगी। साथ ही, खेती की कमाई के हिसाब से कर्ज चुकाने की सुविधाजनक व्यवस्था भी जरूरी है।

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असली कामयाबी यह नहीं कि कितनी महिलाओं तक तकनीक पहुंची, बल्कि यह है कि उससे उनकी आमदनी, हुनर और फैसले लेने की ताकत कितनी बढ़ी। डिजिटल खेती तभी सार्थक होगी, जब महिलाएं इसकी लाभार्थी ही नहीं, बल्कि इसकी दिशा तय करने वाली भागीदार भी बनेंगी।

‘समानता को बढ़ावा, भविष्य में बदलाव: 2050 तक मजबूत और उत्पादक खाद्य, भूमि एवं जल व्यवस्था का मार्ग’ शीर्षक वाली रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं की जरूरतों और वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर समाधान तैयार किए जाने चाहिए। इन योजनाओं को बनाने में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ उनके लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

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