

सूर्य की यात्रा के दौरान अंतरिक्ष के घने बादलों ने पृथ्वी के वातावरण और जलवायु पर असर डाला।
हेलियोस्फीयर छोटा होने से पृथ्वी कुछ समय सूर्य के सुरक्षा कवच से बाहर रह सकती थी।
युवा सूर्य की तेज गतिविधियों ने शुरुआती पृथ्वी के वातावरण में गर्मी बढ़ाने वाली गैसें बनाई।
नाइट्रस ऑक्साइड जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस ने शुरुआती पृथ्वी को गर्म रखने में मदद की।
वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य और आकाशगंगा का वातावरण पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित कर सकता है।
पृथ्वी के मौसम और जलवायु को समझने के लिए वैज्ञानिक अब केवल धरती पर होने वाली घटनाओं को ही नहीं देख रहे हैं। नए शोधों से पता चला है कि सूर्य और उसके आसपास का अंतरिक्ष भी पृथ्वी की जलवायु को बदलने में अहम भूमिका निभा सकता है। वैज्ञानिकों ने सूर्य के पुराने इतिहास और पृथ्वी के वातावरण के बीच संबंधों को समझने की कोशिश की है।
सूर्य के चारों ओर है सुरक्षा कवच
सूर्य से लगातार आवेशित कणों की एक धारा निकलती रहती है, जिसे सौर हवा कहा जाता है। यह सौर हवा पूरे सौरमंडल के चारों ओर एक विशाल बुलबुला बनाती है। इसे हेलियोस्फीयर कहा जाता है।
यह बुलबुला पृथ्वी और दूसरे ग्रहों को अंतरिक्ष के कई तरह के प्रभावों से बचाने में मदद करता है। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह सुरक्षा कवच हमेशा एक जैसा नहीं रहा। हमारा सौरमंडल आकाशगंगा में लगातार घूमता रहता है और इस दौरान यह अलग-अलग गैस और धूल वाले क्षेत्रों से गुजरता है।
कभी बहुत छोटा हो गया था हेलियोस्फीयर
नासा के वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल की मदद से यह पता लगाने की कोशिश की कि पिछले करोड़ों वर्षों में सूर्य किस तरह के अंतरिक्षीय वातावरण से गुजरा होगा। शोध के अनुसार, सूर्य कम से कम तीन बार बहुत ठंडे और घने गैस के बादलों के करीब से गुजरा हो सकता है। यह अध्ययन एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स की वार्षिक समीक्षा नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
इन बादलों का दबाव इतना अधिक हो सकता था कि हेलियोस्फीयर बहुत छोटा हो गया। कुछ परिस्थितियों में यह पृथ्वी की कक्षा से भी छोटा हो सकता था। इसका मतलब है कि पृथ्वी कुछ समय के लिए सूर्य के सुरक्षा कवच के बाहर रही होगी।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे पृथ्वी के ऊपरी वातावरण में बदलाव आया होगा। वातावरण में जलवाष्प और दूसरी प्रक्रियाओं में परिवर्तन के कारण धरती की जलवायु भी प्रभावित हुई होगी। शोधकर्ताओं ने इन घटनाओं को पृथ्वी के पुराने जलवायु बदलावों और कुछ हिमयुगों से जोड़कर देखा है।
कमजोर था पुराना सूर्य
द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स में प्रकाशित दूसरे अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक अलग सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की है। करीब तीन अरब साल पहले सूर्य आज की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम चमकीला था। ऐसे में पृथ्वी को बहुत ठंडा होना चाहिए था। लेकिन भूवैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि उस समय पृथ्वी पर तरल पानी मौजूद था।
इस रहस्य को ‘फेंट यंग सन पैराडॉक्स’ यानी ‘कमजोर युवा सूर्य की पहेली’ कहा जाता है।
सौर तूफानों ने गर्म रखी धरती?
वैज्ञानिकों के अनुसार युवा सूर्य आज के सूर्य से अलग तरह का व्यवहार करता था। वह बहुत शक्तिशाली सौर विस्फोट करता होगा। इन विस्फोटों से निकलने वाले ऊर्जावान कण पृथ्वी के वातावरण तक पहुंचकर रासायनिक प्रतिक्रियाएं शुरू कर सकते थे।
एक प्रयोग में वैज्ञानिकों ने शुरुआती पृथ्वी जैसे वातावरण में नाइट्रोजन, अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें रखीं। फिर उन पर ऊर्जावान कणों की बौछार की गई। इससे नाइट्रस ऑक्साइड नाम की गैस बनी, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में बहुत अधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है।
वैज्ञानिकों के कंप्यूटर मॉडल के अनुसार, इसका कुछ हिस्सा भी वातावरण में बना रहता तो वह शुरुआती पृथ्वी को इतना गर्म रखने में मदद कर सकता था कि भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में पानी तरल अवस्था में रह सके।
पृथ्वी और सूर्य का गहरा संबंध
दोनों अध्ययनों से यह संकेत मिलता है कि पृथ्वी की जलवायु केवल धरती की अपनी प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं है। सूर्य का इतिहास, सौरमंडल के आसपास का अंतरिक्ष और आकाशगंगा में हमारी यात्रा भी पृथ्वी के वातावरण और जलवायु को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इन विचारों को और शोध की जरूरत है। फिर भी ये अध्ययन यह समझने में मदद करते हैं कि पृथ्वी पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियां कैसे बनीं और समय के साथ उनमें बदलाव क्यों आया।