

ऊटी के ग्रपेस-3 टेलीस्कोप ने 22 वर्षों तक अरबों म्यूऑन कणों का अध्ययन कर वायुमंडलीय और सौर प्रभावों का विश्लेषण किया।
सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र और पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल के तापमान में बदलाव से म्यूऑन कणों की संख्या प्रभावित होती है।
वैज्ञानिकों ने फास्ट फूरियर ट्रांसफॉर्म तकनीक से सूर्य के 11 वर्षीय चक्र और मौसमीय प्रभावों को अलग-अलग पहचानने में सफलता पाई।
भारत और जापान के शोधकर्ताओं ने लंबे समय के आंकड़ों से अंतरिक्ष मौसम और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध स्पष्ट किया।
अध्ययन से पता चला कि जमीन आधारित टेलीस्कोप से वायुमंडलीय तापमान और सौर गतिविधियों की वास्तविक समय निगरानी संभव है।
तमिलनाडु के ऊटी में स्थित एक बुहत ऊंचाई वाली वेधशाला में वैज्ञानिकों ने पिछले 22 सालों तक एक बहुत ही अनोखा प्रयोग किया है। यहां भारत और जापान के वैज्ञानिकों ने मिलकर अंतरिक्ष से आने वाले अदृश्य कणों की लगातार निगरानी की।
इस अध्ययन में “ग्रपेस-3 म्यूऑन टेलीस्कोप” नामक विशाल उपकरण का उपयोग किया गया। इस प्रयोग का उद्देश्य यह समझना था कि पृथ्वी के वातावरण और सूर्य की गतिविधियां इन कणों को कैसे प्रभावित करती हैं।
कॉस्मिक किरणें और म्यूऑन क्या हैं
अंतरिक्ष से आने वाले भारी-ऊर्जा वाले कणों को कॉस्मिक किरणें कहा जाता है। ये कण हमारे सौरमंडल के बाहर से लगातार पृथ्वी की ओर आते रहते हैं। जब ये कण पृथ्वी के वायुमंडल से टकराते हैं, तो वे हवा में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के साथ प्रतिक्रिया करते हैं।
इस प्रक्रिया में कई नए कण बनते हैं, जिन्हें द्वितीयक कण कहा जाता है। इनमें से एक महत्वपूर्ण कण “म्यूऑन” होता है। म्यूऑन बहुत तेज गति से चलते हैं और इतनी दूरी तय करते हैं कि वे पृथ्वी की सतह तक पहुंच सकते हैं। इसी कारण वैज्ञानिक इन्हें जमीन पर लगे डिटेक्टरों से गिन सकते हैं।
सूर्य और वायुमंडल का प्रभाव
वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी तक पहुंचने वाले म्यूऑन की संख्या हर समय समान नहीं रहती। इसमें दो मुख्य कारण होते हैं। पहला कारण सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र है। सूर्य अपने चारों ओर एक शक्तिशाली चुंबकीय ढाल बनाता है, जो कई कॉस्मिक किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से रोक देता है। जब यह चुंबकीय क्षेत्र अधिक मजबूत होता है, तो कम कण पृथ्वी तक पहुँचते हैं और म्यूऑन की संख्या घट जाती है।
दूसरा कारण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का तापमान है। जब ऊपरी वायुमंडल गर्म होता है, तो वह फैल जाता है। इससे कणों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और कई कण समय से पहले ही नष्ट हो जाते हैं। परिणामस्वरूप जमीन तक पहुंचने वाले म्यूऑन की संख्या कम हो जाती है।
22 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण
एस्ट्रोपार्टिकल फिजिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में साल 2001 से 2022 तक के आंकड़ों को शामिल किया गया। इस दौरान हर दिन अरबों म्यूऑन कणों की गिनती की गई। कुल मिलाकर यह आंकड़े चार अरब से अधिक रोजमर्रा के रिकॉर्ड का विशाल संग्रह था। इस लंबे समय के आंकड़ों के कारण वैज्ञानिकों को सूर्य के 11 वर्षीय चक्र और पृथ्वी के मौसमीय चक्र को अलग-अलग समझने का अवसर मिला।
लेकिन समस्या यह थी कि सूर्य का चक्र और मौसम का चक्र आपस में मिलकर आंकड़ों को जटिल बना रहे थे। इसे अलग करने के लिए वैज्ञानिकों ने उन्नत गणितीय तकनीक का उपयोग किया, जिसे फास्ट फूरियर ट्रांसफ़ॉर्म कहा जाता है। इसके साथ ही कंप्यूटर आधारित एल्गोरिद्म की मदद से छोटी-छोटी गलतियों और उपकरणों की उम्र से होने वाले बदलावों को भी ठीक किया गया।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुसंधान संस्थान
इस शोध में भारत और जापान के कई प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान शामिल थे। इनमें टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी, तथा जापान के ओसाका सिटी यूनिवर्सिटी, नागोया यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो और हिरोशिमा सिटी यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान शामिल थे। यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग इस अध्ययन को और अधिक मजबूत बनाता है।
नतीजे और वैज्ञानिक महत्व
इस शोध से यह स्पष्ट हुआ कि जमीन पर स्थित डिटेक्टरों की मदद से हम न केवल अंतरिक्ष की गतिविधियों को समझ सकते हैं, बल्कि पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल के तापमान को भी माप सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में मौसम और जलवायु परिवर्तन को समझने में मदद कर सकती है। इससे अंतरिक्ष मौसम की सटीक जानकारी भी मिल सकती है, जो उपग्रहों और संचार प्रणालियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
सीमाएं और आगे की चुनौतियां
हालांकि इस अध्ययन में बहुत सफलता मिली है, फिर भी कुछ अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। कणों के व्यवहार से जुड़ी कुछ जटिल वैज्ञानिक मान्यताओं में अभी भी सुधार की आवश्यकता है। इसके अलावा सूर्य और मौसम के प्रभाव कभी-कभी एक-दूसरे के साथ मिल जाते हैं, जिससे पूरी तरह सटीक परिणाम निकालना कठिन हो जाता है। फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नई पद्धति भविष्य के शोध के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है।
ऊटी में किया गया यह 22 साल लंबा अध्ययन विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि है। इससे यह साबित हुआ है कि ब्रह्मांडीय कणों की मदद से हम पृथ्वी और अंतरिक्ष दोनों को बेहतर समझ सकते हैं। यह शोध आने वाले समय में मौसम, जलवायु और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नई दिशा दे सकता है।