आर्सेनिक और फ्लोराइड से मिलेगी राहत: आईआईटी गुवाहाटी ने विकसित की नई किफायती तकनीक

आईआईटी गुवाहाटी की कुछ ही मिनटों में आर्सेनिक और फ्लोराइड हटाने वाली यह तकनीक महज 18 रुपए की लागत में 1,000 लीटर पानी साफ कर सकती है।
प्रतीकात्मक तस्वीर: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट
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सारांश
  • भारत के लाखों लोगों के लिए भूजल में मौजूद आर्सेनिक और फ्लोराइड आज भी सुरक्षित पेयजल की राह में बड़ी चुनौती हैं। दोनों प्रदूषकों को एक साथ हटाना अब तक जल शोधन प्रणालियों के लिए मुश्किल रहा है।

  • ऐसे में आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक नई और किफायती तकनीक विकसित की है, जो कुछ ही मिनटों में पानी से 98.2 फीसदी तक आर्सेनेट और 91.8 फीसदी तक फ्लोराइड हटाने में सक्षम है।

  • रोटेटिंग-एनोड इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन रिएक्टर नाम की इस तकनीक से 1,000 लीटर पानी को महज 18 से 58 रुपए की अनुमानित लागत में साफ किया जा सकता है।

  • खास बात यह है कि इसका परीक्षण असम के वास्तविक भूजल नमूनों पर भी किया गया है। अब वैज्ञानिक इसे प्रयोगशाला से निकालकर निरंतर प्रवाह वाली पायलट प्रणाली के रूप में विकसित करने की तैयारी कर रहे हैं।

  • यदि बड़े स्तर पर यह तकनीक सफल रहती है, तो आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित ग्रामीण इलाकों में कम लागत पर सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में यह एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि साबित हो सकती है।

भारत के लाखों लोगों के लिए साफ और सुरक्षित पेयजल आज भी बड़ी चुनौती है। देश के कई हिस्सों में भूजल में प्राकृतिक रूप से मौजूद आर्सेनिक और फ्लोराइड लंबे समय तक शरीर में पहुंचकर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर सकते हैं।

मुश्किल यह है कि दोनों प्रदूषकों को एक साथ हटाना पारंपरिक जल शोधन प्रणालियों के लिए आसान नहीं रहा है। लेकिन अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी किफायती तकनीक विकसित की है, जो कुछ ही मिनटों में पानी से दोनों खतरनाक प्रदूषकों को काफी हद तक हटाने में सक्षम है।

समस्या से निजात पाने के लिए आईआईटी, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने रोटेटिंग-एनोड इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन (आरए-ईसी) रिएक्टर विकसित किया है। शुरुआती परीक्षणों में यह तकनीक पानी से 98.2 फीसदी तक आर्सेनेट और 91.8 फीसदी तक फ्लोराइड हटाने में सफल रही है।

महज 18 रुपये में मिलेगा 1,000 लीटर शुद्ध पेयजल

इस तकनीक की एक और बड़ी खासियत इसकी लागत है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, प्रदूषण की मात्रा के आधार पर 1,000 लीटर पानी के ट्रीटमेंट का अनुमानित खर्च 18 से 58 रुपए हो सकता है। ऐसे में यह तकनीक उन इलाकों के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है, जहां सुरक्षित पेयजल तक पहुंच सीमित है।

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आईआईटी गुवाहाटी के प्रोफेसर मिहिर कुमार पुरकैत और शोधकर्ता मुकेश भारती द्वारा किए इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल केमिकल इंजीनियरिंग में प्रकाशित हुए हैं।

प्रोफेसर पुरकैत ने इस तरह की तकनीक की जरूरत को समझाते हुए प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि, “भारत में लाखों लोगों के लिए भूजल पीने के पानी का प्रमुख स्रोत है। हालांकि कई क्षेत्रों में इसी पानी में आर्सेनिक और फ्लोराइड दोनों पाए जाते हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। समस्या यह है कि वाटर ट्रीटमेंट के दौरान दोनों प्रदूषक अलग-अलग तरीके से व्यवहार करते हैं और एक-दूसरे को हटाने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकते हैं।“

कैसी काम करती है यह नई प्रणाली

इस चुनौती से निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने पारंपरिक इलेक्ट्रोकोएग्यूलेशन प्रणाली में बदलाव किया। आमतौर पर इसमें स्थिर एल्युमिनियम इलेक्ट्रोड का इस्तेमाल होता है, लेकिन नई प्रणाली में घूमने वाला एल्युमिनियम एनोड लगाया गया है।

इस रिएक्टर में जब बिजली प्रवाहित की जाती है, तो एल्युमिनियम और हाइड्रॉक्साइड आयन मिलकर बेहद छोटे कण या फ्लॉक्स बनाते हैं। ये फ्लॉक्स आर्सेनिक और फ्लोराइड के कणों को अपने साथ बांध लेते हैं, जिससे दोनों प्रदूषकों को पानी से अलग किया जा सकता है।

घूमता हुआ इलेक्ट्रोड इस प्रक्रिया में पानी के बेहतर मिश्रण और प्रदूषकों को पकड़ने की क्षमता को बढ़ाता है। साथ ही यह इलेक्ट्रोड की सतह पर परत जमने की समस्या को भी कम करता है।

असम के भूजल पर भी परखी गई तकनीक

शोधकर्ता मुकेश भारती के मुताबिक, टीम ने रिएक्टर की गति, विद्युत धारा की तीव्रता, इलेक्ट्रोड के बीच की दूरी और उपचार के समय जैसे कई कारकों का विस्तार से परीक्षण किया। तकनीक को वास्तविक परिस्थितियों के करीब ले जाने के लिए इसमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, बाइकार्बोनेट, सल्फेट और फॉस्फेट जैसे प्राकृतिक आयनों के प्रभावों की भी जांच की गई।

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इसके अलावा असम से लिए गए भूजल के वास्तविक नमूनों पर भी इसका परीक्षण किया गया।

अब प्रयोगशाला से गांवों तक पहुंचाने की तैयारी

वैज्ञानिक अब इस तकनीक को प्रयोगशाला से बाहर वास्तविक दुनिया में ले जाने की दिशा में काम कर रहे हैं। अगले चरण में निरंतर प्रवाह वाली पायलट स्तर की प्रणाली विकसित की जाएगी।

भविष्य में इसमें सेंसर आधारित स्वचालित नियंत्रण भी जोड़ा जाएगा, जिससे पानी के पीएच, विद्युत चालकता, करंट और रिएक्टर की गति जैसी स्थितियों की वास्तविक समय में निगरानी की जा सके।

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ऐसे में अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है, तो यह ग्रामीण और प्रभावित समुदायों को कम लागत में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।

इसके साथ ही इसका इस्तेमाल विकेंद्रीकृत जल शोधन प्रणालियों, आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित भूजल के उपचार, उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी को साफ करने तथा अन्य उन्नत वाटर ट्रीटमेंट तकनीकों के साथ भी किया जा सकता है।

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