

यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी के शोधकर्ताओं ने जैव विज्ञान में फ्लो मैचिंग तकनीक पर व्यापक समीक्षा प्रकाशित की, जिससे नई उम्मीद जगी।
फ्लो मैचिंग एआई को जैविक प्रक्रियाओं के बदलाव समझने में मदद करता है, जिससे प्रोटीन और कोशिकाओं का अध्ययन आसान होगा।
नई तकनीक प्रोटीन फोल्डिंग, कोशिकाओं की प्रतिक्रिया और कैंसर जैसी बीमारियों की प्रगति समझने में वैज्ञानिकों की मदद कर सकती है।
एआई आधारित मॉडल दवा खोजने की प्रक्रिया तेज कर सकते हैं और वैज्ञानिकों को प्रयोगों के लिए बेहतर विकल्प चुनने में मदद करेंगे।
भविष्य में वर्चुअल सेल तैयार करने की उम्मीद है, जिससे प्रयोगशाला में जांच से पहले कंप्यूटर पर जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन होगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल तेजी से चिकित्सा और जैव विज्ञान के क्षेत्र में भी बढ़ रहा है। इसी दिशा में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी के शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण काम किया है। विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग और सहयोगी संस्थानों की टीम ने जैव विज्ञान में इस्तेमाल होने वाली एआई तकनीक ‘फ्लो मैचिंग’ पर एक व्यापक समीक्षा प्रकाशित की है।
यह शोध प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मशीन इंटेलिजेंस में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक दवा खोजने, बीमारी को समझने और भविष्य में अधिक व्यक्तिगत इलाज विकसित करने में मदद कर सकती है।
क्या है फ्लो मैचिंग?
फ्लो मैचिंग एआई की एक ऐसी तकनीक है, जो कंप्यूटर को यह समझने में मदद करती है कि कोई जैविक प्रणाली एक स्थिति से दूसरी स्थिति में कैसे बदलती है।
आसान भाषा में समझें तो हमारा शरीर हमेशा बदलता रहता है। कोशिकाएं बढ़ती हैं, प्रोटीन अपना आकार बदलते हैं और बीमारियां समय के साथ आगे बढ़ती हैं। पारंपरिक कंप्यूटर मॉडल अक्सर इन प्रक्रियाओं की अलग-अलग तस्वीरों या अवस्थाओं का अध्ययन करते हैं। इसके विपरीत, फ्लो मैचिंग इन बदलावों के बीच के रास्ते को समझने की कोशिश करता है।
यानी यह सिर्फ यह नहीं बताता कि कोई चीज कैसी है, बल्कि यह समझने में मदद कर सकता है कि वह कैसे बदल रही है।
प्रोटीन से लेकर कैंसर तक में उपयोग
फ्लो मैचिंग का इस्तेमाल जैव विज्ञान के कई स्तरों पर किया जा सकता है। अणु के स्तर पर यह प्रोटीन के मुड़ने और अपना आकार बदलने की प्रक्रिया को समझने में मदद कर सकता है। प्रोटीन की संरचना को समझना नई दवाओं के विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कोशिकाओं के स्तर पर यह तकनीक यह अनुमान लगाने में मदद कर सकती है कि किसी विशेष परिस्थिति या दवा के संपर्क में आने पर कोशिका किस तरह प्रतिक्रिया करेगी।
इससे भी बड़े स्तर पर शोधकर्ता यह समझने की कोशिश कर सकते हैं कि अलग-अलग कोशिकाओं में होने वाले बदलाव पूरे ऊतक और शरीर को किस तरह प्रभावित करते हैं। कैंसर जैसी जटिल बीमारियों के विकास को समझने में भी ऐसी तकनीक भविष्य में उपयोगी साबित हो सकती है।
दवा खोजने की प्रक्रिया हो सकती है तेज
नई दवा तैयार करने में कई साल लगते हैं। वैज्ञानिकों को बड़ी संख्या में संभावित दवाओं और उनके प्रभावों का परीक्षण करना पड़ता है। एआई इस प्रक्रिया को तेज करने में मदद कर सकता है।
फ्लो मैचिंग के जरिए कंप्यूटर संभावित जैविक बदलावों का मॉडल तैयार कर सकता है। इससे वैज्ञानिकों को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि प्रयोगशाला में किन संभावनाओं पर पहले काम किया जाए।
इस तरह एआई शोधकर्ताओं का समय और संसाधन बचाने में मदद कर सकता है। हालांकि, कंप्यूटर से मिले परिणामों को प्रयोगशाला में जांचना अभी भी जरूरी रहेगा।
‘वर्चुअल सेल’ बनाने की बड़ी योजना
यूनिवर्सिटी ऑफ मिसौरी के शोधकर्ताओं की नजर भविष्य की एक बड़ी संभावना पर भी है। वह है एआई की मदद से एक ‘वर्चुअल सेल’ तैयार करना।
वर्चुअल सेल का मतलब एक ऐसा डिजिटल मॉडल है, जो कंप्यूटर पर कोशिका के अंदर होने वाली अलग-अलग प्रक्रियाओं को समझ और उनका अनुमान लगा सके। अगर यह तकनीक भविष्य में काफी सटीक हो जाती है, तो वैज्ञानिक किसी नए विचार या दवा का प्रभाव पहले कंप्यूटर पर देख सकते हैं और उसके बाद प्रयोगशाला में उसका परीक्षण कर सकते हैं।
इससे चिकित्सा अनुसंधान की गति बढ़ सकती है और इलाज को व्यक्ति की जरूरत के अनुसार तैयार करने में भी मदद मिल सकती है।
एआई बदल सकता है जैव विज्ञान का तरीका
शोध के अनुसार, फ्लो मैचिंग जैव विज्ञान में जनरेटिव एआई के लिए एक व्यापक ढांचा बन सकता है। माना जा रहा है कि कंप्यूटर बड़ी मात्रा में ऐसे संबंधों को पहचान सकते हैं, जिन्हें इंसानों के लिए समझना मुश्किल होता है।
हालांकि यह तकनीक अभी विकास के दौर में है और इसे मानव शरीर की जटिलताओं को समझने के लिए काफी आगे जाना होगा। फिर भी वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि फ्लो मैचिंग भविष्य में जैव चिकित्सा अनुसंधान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
दवा खोजने से लेकर बीमारी की प्रगति समझने तक, एआई विज्ञान को एक नई दिशा दे रहा है। फ्लो मैचिंग इसी बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी हो सकती है।