

11,000 प्रकाश वर्ष दूर दो नवजात ग्रहों की भीषण टक्कर ने वैज्ञानिकों को पहली बार ऐसी घटना को लाइव देखने का मौका दिया है।
इस टक्कर से बना गर्म धूल और मलबे का विशाल बादल एक तारे की रोशनी को बार-बार ढक रहा है, जिससे उसकी चमक में अजीब उतार-चढ़ाव दिख रहे हैं। इंफ्रारेड में लगातार चमकती यह धूल बताती है कि टक्कर कितनी शक्तिशाली रही होगी।
अध्ययन में पाया गया कि इसकी रोशनी में करीब 380.5 दिनों का एक नियमित चक्र था, जो संकेत देता है कि यह मलबा तारे के चारों ओर करीब पृथ्वी-सूर्य जितनी या उससे थोड़ी अधिक दूरी (यानी करीब 15 करोड़ किलोमीटर) पर घूम रहा है।
हैरानी की बात यह है कि इस बादल में मौजूद धूल का कुल वजन कम से कम 400 क्विंटिलियन किलोग्राम (4,00,00,00,00,00,00,00,000 किलोग्राम) आंका गया है, जो इस टक्कर की ताकत और पैमाने का अंदाजा देता है।
इस खोज की खास बात यह भी है कि यह घटना पृथ्वी और चंद्रमा के जन्म जैसी प्रतीत होती है। करीब 450 करोड़ साल पहले, एक विशाल टक्कर ने ही हमारे चंद्रमा को जन्म दिया था। Gaia20ehk के आसपास घूम रहा धूल का यह बादल भी करीब उतनी ही दूरी पर है, जितनी दूरी पृथ्वी की सूर्य से है। यह इस बात का भी संकेत है कि भविष्य में यहां भी कोई 'पृथ्वी-चंद्रमा जैसा सिस्टम' बन सकता है।
अंतरिक्ष के अथाह सन्नाटे में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दुर्लभ घटना देखी है, जो हमारे सौर मंडल के अतीत को समझने का नजरिया बदल सकती है।
11,000 प्रकाश वर्ष दूर दो नवजात ग्रहों की भीषण टक्कर ने उस पुराने रहस्य को फिर से जगा दिया है कि आखिर करीब 4.5 अरब साल पहले हुए टकराव से पृथ्वी और चंद्रमा कैसे बने थे? वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसी ही किसी विनाशकारी टक्कर ने हमारे चंद्रमा को जन्म दिया होगा। अब इस नई घटना के संकेत हमें उस प्राचीन कहानी को समझने का अनोखा मौका दे रहे हैं, जो हमारे सौर मंडल के निर्माण से जुड़ी है।
यानी, जो कहानी कभी हमारी धरती के अतीत में लिखी गई थी, वही अब ब्रह्मांड में फिर से दोहराई जा रही है और इस बार इंसान उसे लाइव देख रहा है। आइए, इस हैरान कर देने वाली घटना को आसान भाषा में समझते हैं।
इस घटनाक्रम की शुरुवात तब हुई जब यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन से जुड़े खगोलशास्त्री अनास्तासियोस (एंडी) त्जानिडाकिस 2020 के पुराने टेलीस्कोप आंकड़ों को खंगाल रहे थे। उस दौरान उन्हें एक ऐसा तारा दिखा जिसका व्यवहार सामान्य नहीं था। इस रहस्यमयी तारे का नाम Gaia20ehk (Gaia-GIC-1) है, जो पृथ्वी से करीब 11,000 प्रकाश वर्ष दूर प्यूपिस तारामंडल के पास स्थित है।
कई सालों तक Gaia20ehk एक बिल्कुल सामान्य तारे की तरह दिखता रहा, जिसकी चमक करीब-करीब स्थिर थी। लेकिन 2016 के बाद इसमें अचानक बदलाव आने लगे, इसकी रोशनी तीन बार कम हुई और यह कमी करीब 200 दिनों तक बनी रही। इस दौरान तारे की दिखाई देने वाली रोशनी करीब एक-तिहाई (25 फीसदी) घट गई। बाद में यह मंद होना अनियमित हो गया और इसमें कोई स्पष्ट दोहराव वाला पैटर्न नहीं दिखा।
जब वैज्ञानिकों को दिखा कुछ असामान्य
इसके बाद 2021 आते-आते, यह तारा बिलकुल अलग व्यवहार करने लगा, उसकी चमक बेतरतीब ढंग से बदलने लगी। त्जानिडाकिस ने इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि, "तारे ऐसा व्यवहार नहीं करते, इसे देखकर हम दंग रह गए, आखिर हो क्या रहा है?”
पड़ताल से पता चला कि समस्या इस तारे में नहीं, बल्कि उसके सामने से गुजर रही किसी चीज में थी। विशाल मात्रा में धूल और चट्टानों के टुकड़े तारे के आगे से गुजरते हुए उसकी रोशनी को बीच-बीच में ढक रहे थे। इसकी वजह से पृथ्वी तक पहुंचने वाला प्रकाश कम ज्यादा दिख रहा था। वैज्ञानिक ऐसे पैटर्न को “डिपर” कहते हैं, यानी कोई चीज तारे के सामने से गुजरकर उसकी रोशनी को कुछ समय के लिए ढक देती है।
वैज्ञानिकों ने जब इस मलबे के स्रोत की जांच की तो पता चला कि यह कोई साधारण घटना नहीं थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह दो नवजात ग्रहों की भीषण टक्कर के कारण पैदा हुआ मलबा था, जिसे पहली बार रियल टाइम में देखा गया है। यानी, जो कहानी कभी हमारी धरती के अतीत में लिखी गई थी, वही अब ब्रह्मांड में फिर से दोहराई जा रही है, और इस बार इंसान उसे लाइव देख रहा है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक जब किसी नए तारे के आसपास गैस, धूल और चट्टानें गुरुत्वाकर्षण के कारण आपस में जुड़ती हैं, तो ग्रह बनते हैं। लेकिन शुरुआती समय में यह प्रक्रिया बेहद बेतरतीब होती है, ग्रह आपस में टकराते हैं, टूटते हैं या अंतरिक्ष में दूर फेंक दिए जाते हैं। इसके करीब 10 करोड़ साल बाद जाकर कहीं एक स्थिर सौरमंडल बन पाता है।
शुरुआत में वैज्ञानिक इस रोशनी को लेकर भी उलझन में थे। लेकिन जांच से पता चला कि ग्रहों के बीच की यह टक्कर इतनी भीषण थी कि उससे पैदा हुई गर्मी अभी भी इन्फ्रारेड रोशनी के रूप में चमक रही है। दिलचस्प बात यह है कि जब तारे की सामान्य रोशनी कम हो रही थी, उसी समय इन्फ्रारेड रोशनी बढ़ रही थी, जैसे कोई जलता हुआ मलबा अंतरिक्ष में फैल रहा हो।
टकराव के बाद बना ‘मलबे का विशाल बादल’
इसका मतलब था कि जो धूल तारे को ढक रही है, वह बेहद गर्म है, इतनी गर्म कि खुद तारे की रोशनी को सोखकर गर्म हो रही है और फिर उसे ऊष्मा के रूप में वापस छोड़ रही है। इस धूल का तापमान करीब 900 केल्विन आंका गया, यानी बेहद तपता हुआ मलबा, जो पिछले चार साल से लगातार चमक रहा है। यह गर्मी किसी साधारण घटना से नहीं, बल्कि एक विनाशकारी टक्कर से ही आ सकती है।
अध्ययन में पाया गया कि इसकी रोशनी में करीब 380.5 दिनों का एक नियमित चक्र था, जो संकेत देता है कि यह मलबा तारे के चारों ओर करीब पृथ्वी-सूर्य जितनी या उससे थोड़ी अधिक दूरी (यानी करीब 15 करोड़ किलोमीटर) पर घूम रहा है।
यह भी सामने आया है कि इस भीषण टक्कर के बाद बना धूल का बादल बेहद विशाल है, जिसका फैलाव कई करोड़ मील तक हो सकता है। यह इतना विशाल कि तारे की रोशनी को आसानी से ढक सकता है। हैरानी की बात यह है कि इस बादल में मौजूद धूल का कुल वजन कम से कम 400 क्विंटिलियन किलोग्राम (4,00,00,00,00,00,00,00,000 किलोग्राम) आंका गया है, जो इस टक्कर की ताकत और पैमाने का अंदाजा देता है।
हमारी पृथ्वी से मिलती है इस टकराव की कहानी?
इस खोज की खास बात यह भी है कि यह घटना पृथ्वी और चंद्रमा के जन्म जैसी प्रतीत होती है। करीब 450 करोड़ साल पहले, एक विशाल टक्कर ने ही हमारे चंद्रमा को जन्म दिया था। Gaia20ehk के आसपास घूम रहा धूल का यह बादल भी करीब उतनी ही दूरी पर है, जितनी दूरी पृथ्वी की सूर्य से है। यह इस बात का भी संकेत है कि भविष्य में यहां भी कोई 'पृथ्वी-चंद्रमा जैसा सिस्टम' बन सकता है।
देखा जाए तो असल में, नए सौरमंडल बेहद उथल-पुथल भरे होते हैं, ग्रह लगातार टकराते, टूटते और इधर-उधर बिखरते रहते हैं। लाखों-करोड़ों वर्षों में जाकर एक संतुलित व्यवस्था बनती है, जैसी आज हमारे सौरमंडल में दिखती है। हालांकि यह रहस्य अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है। इस धूल को शांत होने में कुछ या लाखों साल भी लग सकते हैं। लेकिन इतनी दूर किसी टक्कर को “लाइव” देख पाना बेहद दुर्लभ है, इसके लिए सही कोण, सही समय और किस्मत तीनों का साथ चाहिए।
यह खोज सिर्फ एक रोमांचक कहानी नहीं है, यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करती है कि क्या पृथ्वी और चंद्रमा जैसी घटनाएं ब्रह्मांड में आम हैं, या बेहद दुर्लभ? इसका जवाब ही तय करेगा कि हमारी पृथ्वी की तरह जीवन के लिए अनुकूल दुनिया ब्रह्मांड में कितनी हो सकती हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।