सरकार ने एक बहती हुई नदी को माना नाला, अब गजेटियर में फिर से नदी दर्ज करने का आदेश
यूं तो देश की कई नदियां नालों के तौर पर गिनी जा रही हैं लेकिन अगर सरकारी अभिलेख ही उसे नाला मानने लगे तो शायद स्मृति के अलावा कोई आधार नहीं बचता कि आने वाली पीढ़ी अपने नदियों के बारे में जान पाए। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में एक प्रमुख सहायक नदी सुवाव को उत्तर प्रदेश सरकार ने नाले के तौर पर दर्ज कर लिया, हालांकि, स्थानीय पर्यावरणविदों ने अदालत का दरवाजा खटखाटया और अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने वापस संबंधित सरकार को इसे नदी के तौर पर दर्ज करने का आदेश दिया है।
एनजीटी ने बलरामपुर और सिद्धार्थनगर जिले को अपने निर्देश में स्पष्ट तौर पर कहा है, " जिला मजिस्ट्रेट ‘सुवाव’ का नामांकन ‘नाला’ से ‘नदी’ में राजस्व रिकॉर्ड में सुधारें।" साथ ही पीठ ने कहा, "उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई और जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया जाता है कि वह ‘सुवाव’ का नामांकन अपने रिकॉर्ड में ‘नाला’ से ‘नदी’ में सुधारने को सुनिश्चित करें, तीन माह के भीतर इस निर्णय की एक प्रति प्राप्त करने के बाद और इसका सुधार आधिकारिक गजट और स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करके इस न्यायाधिकरण के निर्णय के अनुपालन में अधिसूचित करें।"
एनजीटी के चेयरमैन और जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की पीठ ने बलरामपुर जिले के पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव संरक्षण समिति के अध्यक्ष पतेश्वरी प्रसाद सिंह के माध्यम से 20.04.2022 की तिथि को एक पत्र याचिका पर गौर करने के बाद यह आदेश दिया है। याची ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'मुंबई महानगरपालिका बनाम अंकिता सिन्हा और अन्य' मामले का हवाला दिया था। इसके तहत स्वतः संज्ञान क्षेत्राधिकार के तहत इस याचिका पर गौर किया गया।
याचीकर्ताओं की ओऱ से सुवाव नदी के बारे में कहा गया था, "1906 में प्रकाशित गोंडा के गजेटियर में स्थलाकृति, जनसांख्यिकी, कृषि, नदियों का विवरण विस्तृत रूप से दिया गया है। इस दस्तावेज में उल्लेख किया गया है कि राप्ती नदी में अनेक छोटे-छोटे नाले/नालियां मिलती हैं, जो केवल वर्षा ऋतु के दौरान पानी ले जाती हैं और नदी जैसी दिखती हैं। लेकिन राप्ती नदी का केवल एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है, जो बुढ़ी राप्ती है, जो इसके उत्तर (बाएं) किनारे पर बहती है, और सुवाव नदी (सुवावन) है, जो इसके दक्षिण (दाएं) किनारे पर बहती है। गजेटियर में कहा गया है कि सुवाव नदी राप्ती में मिलने से पहले रसूलाबाद के पास उत्तरौला परगना में एक महत्वपूर्ण नदी बन जाती है।"
सुवाव नदी राप्ती नदी द्वारा मानसून के दौरान उत्पन्न बाढ़ को नियंत्रित करने और मापने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह अपनी धारा के दौरान दर्जनों जलमग्न क्षेत्रों, झीलों, तालाबों को भरती है और इसके बाद लगभग 120 किमी की दूरी तय करने के बाद राप्ती नदी में सीधे मिल जाती है। यह गंगा नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है। इस प्रकार, सुवाव नदी जलविज्ञान और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, और इसलिए इसके संरक्षण, प्रबंधन और पुनरुद्धार के लिए प्रयास करना इस क्षेत्र के लिए अत्यंत आवश्यक है।
याचिकाकर्ता समाज ने शिकायत की कि बालरामपुर पहले गोंडा जिले का हिस्सा था, जिसमें चार नदियां अर्थात राप्ती, सुवाव, कुआना और बेशुई बह रही थीं। वन और कृषि विकास नीतियों के निर्माण और कार्यान्वयन के बाद नदी की यह दुर्दशा हुई।
याचिका में आगे कहा गया है, "अक्टूबर 1894 में जब वन नीति घोषित हुई और वन क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र का अलग-अलग विकास हुआ। इन चार नदियों के बीच कृषि भूमि बनाई गई और गांव का विकास हुआ। सुवाव नदी और कुआना नदी के बीच वन क्षेत्र और झीलों को काटकर कृषि योग्य भूमि बनाई गई। बालरामपुर से सटे कुआना नदी के किनारे तत्कालीन महाराजा बालरामपुर ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए मारवाड़ से कुछ व्यापारी बुलाकर बसाए, जिनका नाम भगवतीगंज रखा गया। भगवतीगंज की आबादी बढ़ी और कुआना नदी के किनारे-किनारे मकान बने, जिससे सुवाव नदी एक नाले के रूप में परिवर्तित हो गई। इसके किनारे बालरामपुर के पास एक चीड़ा बांध का निर्माण महाराजा बालरामपुर द्वारा कराया गया, जिसने कई बार भयंकर बाढ़ से बालरामपुर शहर को बचाया है।
याची की ओऱ से कहा गया नदी (नाले) को सरकार द्वारा नाली का रूप दिया जा रहा है और नाले पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और सामुदायिक हाल का निर्माण कराया जा रहा है, जिसे रोकना अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है और बालरामपुर, भगवतीगंज के लोगों के जीवन में भी बड़ा संकट उत्पन्न हो रहा है। न्यायालय में कई उदाहरण हैं, जहां पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए कई बार निर्माण कार्यों को रोका गया है, जैसे कि राजस्थान में "नाला रानी नदी में अपशिष्ट पदार्थ डालने के मामले" का उदाहरण।
एनजीटी ने अपने आदेश में जिला गंगा समितियों, बालरामपुर और सिद्धार्थनगर को निर्देश दिया है कि वे उपर्युक्त संत सीचेवाल के मॉडल को अपनाएं और सुवाव नदी के पारिस्थितिकी और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार के लिए लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए इसे दोहराएं। यह कार्य विशेष रूप से लोगों की भागीदारी पर जोर देकर किया जाएगा, ताकि नदी के संरक्षण और पुनरुद्धार में समुदाय की सक्रिय भागीदारी हो।
एनजीटी ने उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया है "सुवाव नदी, एसटीपी से निकाली गई उपचारित जल, और बालरामपुर चीनी मिल तथा बजाज शुगर मिल जैसी उद्योगों से निकलने वाले सीवेज/अपशिष्ट जल की जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी सुनिश्चित करें। इसके लिए वे समय-समय पर नमूने लें और उनका विश्लेषण करवाएं तथा किसी भी पर्यावरणीय उल्लंघन की स्थिति में उपयुक्त सुधारात्मक कदम उठाएं।"
पीठ ने चेताया है "इस न्यायाधिकरण द्वारा जारी आदेश का अनुपालन न करना राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 26 के तहत एक अपराध है, जिसे दंडनीय माना जाएगा। इसके अलावा, इस न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेश को 1908 के सिविल प्रक्रिया संहिता की धाराओं के तहत एक सिविल न्यायालय के फैसले के रूप में भी लागू किया जा सकता है, जो कानून के अनुसार न्यायादेशों को गिरफ्तार करने और डिटेंशन करने के माध्यम से लागू करने की अनुमति देता है।"
इसके अलावा पीठ ने सिंचाई और जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया है कि "वह छह महीने के भीतर केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) और जल शक्ति मंत्रालय द्वारा जुलाई 2025 में जारी की गई बाढ़ जोनिंग पर तकनीकी दिशानिर्देशों और गंगा आदेश, 2016 के आधार पर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में सक्रिय बाढ़ मैदान की पहचान और सीमांकन सुनिश्चित करें।"
इसके अलावा पीठ ने बलरामपुर और सिद्धार्थनगर जिला गंगा समिति (डीजीसी) को निर्देश दिया है कि वे बालरामपुर और सिद्धार्थनगर जिलों के राजस्व रिकॉर्ड की जांच करें, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्या ग्रामीण कैचमेंट क्षेत्र में पहले जल/नमी क्षेत्र के रूप में दर्ज भूमि को राजस्व निरीक्षकों या अन्य अधिकारियों द्वारा कृषि भूमि में परिवर्तित किया गया है, और यदि हां, तो अवैध परिवर्तन को सुधारने के लिए निर्देश जारी किया जाए और उक्त भूमि को पुनः जल/नमी क्षेत्र के रूप में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।
इसके अलावा पीठ ने अपशिष्ट समेत तमाम सुधारों के साथ एनएमसीजी को यूपी सरकार द्वारा प्रस्तुत एसटीपी और सुवाव नदी पुनरुद्धार से संबंधित प्रस्तावों की समीक्षा करने के लिए निर्देशित किया है।


