प्रतिबंध के दशकों बाद भी यूरोप में कायम हैं खतरनाक रसायनों के निशान

प्रतिबंध के दशकों बाद भी यूरोप के पर्यावरण में जहरीले रसायनों के निशान, वैज्ञानिकों ने बताया कि इनका असर अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ
यूरोप के 25 देशों में प्रतिबंधित पीबीडीई रसायन आज भी हवा, मिट्टी, पानी और बर्फ में पाए गए हैं।
यूरोप के 25 देशों में प्रतिबंधित पीबीडीई रसायन आज भी हवा, मिट्टी, पानी और बर्फ में पाए गए हैं।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • यूरोप के 25 देशों में प्रतिबंधित पीबीडीई रसायन आज भी हवा, मिट्टी, पानी और बर्फ में पाए गए हैं।

  • वैज्ञानिकों ने 181 अध्ययनों की समीक्षा कर बताया कि पुराने रसायन प्रतिबंध के दशकों बाद भी पर्यावरण में मौजूद हैं।

  • तलछट, सीवेज कीचड़ और मिट्टी पीबीडीई रसायनों को लंबे समय तक जमा करके पर्यावरण में धीरे धीरे छोड़ते रहते हैं।

  • पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान और रिसाइकिल सामग्री से पीबीडीई दोबारा पर्यावरण और नए उत्पादों में पहुंच सकते हैं, वैज्ञानिकों ने चेताया।

  • शोधकर्ताओं ने रसायनों की लगातार निगरानी, सुरक्षित रिसाइक्लिंग और घरों, स्कूलों तथा कार्यस्थलों में प्रदूषण पर अधिक ध्यान देने की मांग की।

यूरोप में प्रतिबंधित किए गए कुछ खतरनाक रसायन आज भी पर्यावरण में मौजूद हैं। एक नए अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि पॉलीब्रोमिनेटेड डाइफेनाइल ईथर्स यानी पीबीडीई (पीबीडीईएस) पर लंबे समय से लगे प्रतिबंधों के बावजूद इनके अवशेष हवा, पानी, मिट्टी, बर्फ, तलछट और सीवेज कीचड़ में पाए जा रहे हैं।

शोधकर्ताओं ने यूरोप के 25 देशों से जुड़े अध्ययनों की समीक्षा की। यह अध्ययन जर्नल एनवायर्नमेंटल रिसर्च में प्रकाशित किया गया है। इसमें 181 शोध अध्ययनों को शामिल किया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन रसायनों का पर्यावरण में बने रहना बताता है कि किसी रसायन पर प्रतिबंध लगाना जरूरी है, लेकिन उससे पुराना प्रदूषण तुरंत खत्म नहीं होता।

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आग से बचाव के लिए होता था इस्तेमाल

पीबीडीई का इस्तेमाल कई दशकों तक आग से सुरक्षा के लिए किया जाता था। इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, प्लास्टिक, वाहन, फर्नीचर और निर्माण सामग्री में इन रसायनों का उपयोग आम था।

इनका उद्देश्य आग लगने के खतरे को कम करना था। लेकिन समय के साथ वैज्ञानिकों ने इनके पर्यावरण और स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई। इसके बाद यूरोप सहित कई जगहों पर इनके उत्पादन और इस्तेमाल पर प्रतिबंध और कड़े नियंत्रण लागू किए गए।

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यूरोप के 25 देशों में प्रतिबंधित पीबीडीई रसायन आज भी हवा, मिट्टी, पानी और बर्फ में पाए गए हैं।

इसके बावजूद पुराने उत्पादों, रिसाइकिल की गई सामग्री, कचरे और प्रदूषित स्थानों से पीबीडीई आज भी पर्यावरण में पहुंच सकते हैं।

मिट्टी और तलछट बन रहे हैं भंडार

अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि पानी में पीबीडीई की मात्रा आम तौर पर कम और अस्थायी होती है। इसके विपरीत नदियों और झीलों की तलछट, सीवेज कीचड़ और कुछ प्रकार की मिट्टी इन रसायनों को लंबे समय तक अपने अंदर रोककर रख सकती हैं।

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वैज्ञानिकों के अनुसार, तलछट को केवल प्रदूषण का अंतिम ठिकाना मानना सही नहीं है। वहां जमा रसायन धीरे-धीरे पानी, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला में दोबारा पहुंच सकते हैं।

अध्ययन में बीडीई-209 नामक पीबीडीई की मौजूदगी खास तौर पर कणों वाली सामग्री, तलछट और सीवेज से जुड़े नमूनों में अधिक पाई गई। वहीं बीडीई-47 और बीडीई-99 जैसे कम ब्रोमीन वाले रसायन हवा और मिट्टी के नमूनों में अधिक दिखाई दिए।

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दूर-दराज इलाकों में भी मिला प्रदूषण

वैज्ञानिकों के लिए चिंता की एक बड़ी वजह यह भी है कि पीबीडीई केवल औद्योगिक या बड़े शहरों में ही नहीं मिले। इनके निशान यूरोप के दूर-दराज और अपेक्षाकृत साफ माने जाने वाले इलाकों में भी मिले।

अध्ययन में आर्कटिक और पहाड़ी क्षेत्रों जैसे दूरस्थ स्थानों में भी इन रसायनों की मौजूदगी सामने आई। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इसका संबंध इन रसायनों की लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता और हवा के जरिए दूर तक पहुंचने से हो सकता है। इससे पता चलता है कि पुराने रसायनों का असर केवल उस जगह तक सीमित नहीं रहता, जहां उनका इस्तेमाल हुआ था।

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रिसाइक्लिंग से जुड़ी नई चुनौती

अध्ययन ने यूरोप की सर्कुलर इकोनॉमी के सामने भी एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है। पुरानी वस्तुओं को रिसाइकिल करके दोबारा इस्तेमाल करना पर्यावरण के लिए अच्छा कदम माना जाता है। लेकिन अगर उन पुराने सामानों में प्रतिबंधित रसायन मौजूद हैं, तो रिसाइक्लिंग के दौरान वे दोबारा नई सामग्री और उत्पादों में पहुंच सकते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि रिसाइक्लिंग के साथ रासायनिक सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है। केवल किसी रसायन के नए इस्तेमाल को रोकना पर्याप्त नहीं है। पुराने रसायनों की निगरानी भी लंबे समय तक करनी होगी।

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घरों के अंदर भी खतरा

वैज्ञानिकों ने घरों, कार्यालयों, स्कूलों और कार्यस्थलों के अंदर मौजूद धूल और हवा पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और पुराने फर्नीचर जैसी चीजों में इस्तेमाल किए गए रसायन समय के साथ घरेलू धूल में जमा हो सकते हैं।

हालांकि यह अध्ययन सीधे तौर पर किसी खास बीमारी का कारण साबित नहीं करता, लेकिन शोधकर्ता मानते हैं कि पुराने रसायनों की लगातार मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

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लंबे समय तक निगरानी की जरूरत

शोधकर्ताओं का कहना है कि अब केवल एक देश, एक प्रकार के नमूने या एक रसायन की निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। हवा, पानी, मिट्टी, तलछट और सीवेज जैसे अलग-अलग पर्यावरणीय हिस्सों को एक साथ देखना जरूरी है।

पीबीडीई की कहानी यह साफ करती है कि किसी खतरनाक रसायन पर प्रतिबंध लगने के बाद भी उसकी विरासत दशकों तक बनी रह सकती है। इसलिए रसायनों पर नियंत्रण के साथ लंबे समय तक पर्यावरण की निगरानी और सुरक्षित रिसाइक्लिंग व्यवस्था भी जरूरी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पीबीडीई अब केवल अतीत के प्रदूषक नहीं हैं। वे आज भी यूरोप के पर्यावरण में मौजूद एक सक्रिय विरासत हैं।

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