

भोपाल में करोड़ों की लागत से बना लहारपुर डैम आज प्रदूषण का शिकार होकर गंदे पानी के तालाब में बदल गया है। डैम में बिना साफ किए सीवेज और गंदे पानी के लगातार प्रवाह पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए भोपाल नगर निगम को तुरंत प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
एनजीटी ने सभी ऐसे नालों की पहचान कर उनका प्रवाह रोकने, उन्हें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट या विकेन्द्रीकृत उपचार प्रणाली से जोड़ने और डैम में किसी भी स्थिति में बिना साफ किया पानी न जाने देने का आदेश दिया है।
साथ ही जल संसाधन विभाग को ग्रीन बेल्ट विकसित करने और एमपीपीसीबी को नियमित निगरानी व सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है।
संयुक्त समिति की जांच में पाया गया कि डैम का पानी काला पड़ चुका है, सतह पर झाग है और पूरे क्षेत्र में तेज दुर्गंध फैल रही है। तीन प्रमुख नाले सीधे डैम में मिल रहे हैं, जिससे पानी अत्यधिक प्रदूषित हो गया है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि यह जलाशय अब आसपास के गांवों की हजारों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई के लिए उपयोग हो रहा है, जिससे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
एनजीटी ने इसे गंभीर पर्यावरणीय लापरवाही मानते हुए सुधार के लिए तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
लहारपुर डैम में लगातार गिर रहे गंदे पानी पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाया है और भोपाल नगर निगम को तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। 21 अप्रैल 2026 को दिए आदेश में एनजीटी ने नगर निगम से उन सभी नालों की पहचान करने को कहा है जिनके द्वारा बिना साफ किया सीवेज और गंदा पानी डैम में गिर रहा है।
एनजीटी ने कहा है कि ऐसे नालों से डैम में गिर रहे गंदे पानी के सीधे प्रवाह को तुरंत रोका जाए। एनजीटी ने आदेश दिया है कि या तो इन नालों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से जोड़ा जाए या फिर डीसेंट्रलाइज ट्रीटमेंट सिस्टम तैयार किया जाए, ताकि किसी भी स्थिति में बिना साफ किए गन्दा पानी या सीवेज डैम में न पहुंचे।
एनजीटी ने दिए सख्त कार्रवाई के आदेश
इसके साथ ही, जल संसाधन विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह बांध की सीमा को स्पष्ट रूप से चिन्हित करे और उसके आसपास वृक्षारोपण तथा ग्रीन बेल्ट विकसित करे, ताकि पर्यावरण में सुधार हो सके।
नगर निगम को यह भी निर्देश दिया गया है कि अप्रैल 2026 से लागू होने वाली ठोस अपशिष्ट प्रबंधन योजना को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। साथ ही, जन-जागरूकता के माध्यम से लोगों को समझाया जाए कि वे बांध में जाने वाले नालों में कचरा न डालें।
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) को निर्देश दिया गया है कि वह समय-समय पर बांध के पानी की गुणवत्ता की निगरानी करे। यदि कहीं से बिना ट्रीट किया पानी या ठोस कचरा बांध में डाला जाता है, तो उस पर तुरंत आवश्यक कार्रवाई की जाए और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में सख्त कदम उठाए जाएं।
न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह ने स्पष्ट कहा कि नियमों के अनुसार अपशिष्ट जल के उपचार के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की सुविधा होना आवश्यक है। बिना ट्रीटमेंट के पानी किसी भी डैम या जलाशय में नहीं जाना चाहिए। यह नगर निगम की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे नालों को एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) से जोड़े या जहां जरूरत हो वहां एसटीपी का निर्माण कर पानी के ट्रीटमेंट की व्यवस्था सुनिश्चित करे।
कैसे करोड़ों का डैम बना, गंदे पानी का तालाब
यह मामला उस समय प्रकाश में आया जब 16 जनवरी 2026 को पत्रिका में प्रकाशित एक खबर में बताया गया कि बाग मुगालिया स्थित लहारपुर डैम, जिसे करोड़ों रुपये की लागत से बनाया गया था, आज गंदे पानी का तालाब बन चुका है।
खबर के मुताबिक 1979 में शुरू होकर 1994 में पूरा हुआ यह डैम आज करीब-करीब पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है। यह डैम 278 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ था।
आरोप है कि चार प्रमुख नालों और दर्जनों छोटे सीवरों का गंदा पानी सीधे इसमें गिर रहा है। इसकी वजह से डैम का पानी काला और जहरीला हो गया है, जो किसी भी उपयोग का नहीं है। हालांकि इसके बावजूद 10 से 12 गांवों की करीब 2,500 एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई इसी दूषित पानी से हो रही है। इसकी वजह से पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो रहा है।
निरीक्षण में हुए चौंकाने वाले खुलासे
यह भी सामने आया है कि करीब 20 मीटर गहरे और एक किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस जलाशय से करीब 600 मीटर तक तेज दुर्गंध फैल रही है, जिससे आसपास के लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।
ट्रिब्यूनल ने इस मामले में एक संयुक्त समिति गठित कर साइट के निरीक्षण के निर्देश दिए थे। इसके बाद 13 अप्रैल 2026 को संयुक्त समिति ने मौके का निरीक्षण किया। निरीक्षण में पाया गया कि डैम का पानी काला पड़ चुका है, सतह पर झाग मौजूद है और पूरे क्षेत्र में सीवेज जैसी तेज दुर्गंध फैल रही है।
समिति ने यह भी पाया कि तीन प्रमुख नाले सीधे डैम में मिल रहे हैं और पानी में गंदगी, मैल और टर्बिडिटी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। अलग-अलग स्थानों पर गंध की तीव्रता भी अलग-अलग पाई गई, जो नालों के पास सबसे अधिक थी, जबकि डैम की ओर बढ़ने पर इसकी तीव्रता अपेक्षाकृत कम पाई गई।
क्या कुछ समिति ने दिए सुझाव
इसके अलावा इसरो की नेशनल वेटलैंड एटलस (2011 और 2021) के अनुसार मध्य प्रदेश के भोपाल जिले की कोलार तहसील में मौजूद यह डैम भोपाल जिले की आद्रभूमियों (वेटलैंड्स) की सूची में शामिल नहीं है।
ऐसे में संयुक्त समिति ने सिफारिश की है कि लहारपुर डैम में गिरने वाले चिन्हित नालों को इंटरसेप्ट (रोका) और डायवर्ट किया जाना चाहिए, ताकि बिना ट्रीट किया गंदा पानी सीधे डैम में न पहुंचे।
इसके साथ ही भोपाल नगर निगम को निर्देश दिया गया है कि वह गंदे पानी के उपचार के लिए उपयुक्त व्यवस्था करे। इसके लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) या विकेंद्रीकृत उपचार प्रणाली जैसी सुविधाओं की योजना बनाई जाए या मौजूदा व्यवस्था को और मजबूत किया जाए।
एनजीटी के इस आदेश को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम माना जा रहा है।