

मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि टिड्डे के दिमाग की कोशिकाएं पीएफएएस रसायनों को अलग-अलग पहचान सकती हैं।
टिड्डे पीएफओएस जैसे खतरनाक ‘फॉरएवर केमिकल’ को पर्यावरण में मिलने वाली बेहद कम मात्रा में भी पहचानने में सक्षम पाए गए।
शोधकर्ताओं ने अलग-अलग पीएफएएस रसायनों के लिए टिड्डे के दिमाग में अलग न्यूरल पैटर्न यानी रासायनिक फिंगरप्रिंट दर्ज किए।
वैज्ञानिक अब टिड्डे आधारित तकनीक से पानी में पीएफएएस प्रदूषण की तेज, सस्ती और पोर्टेबल जांच विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं।
नई खोज भविष्य में जीवित तंत्रिका प्रणालियों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स को मिलाकर प्रदूषण पहचानने वाले सेंसर बनाने का रास्ता खोल सकती है।
अमेरिका की मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक अनोखी खोज की है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि टिड्डे के दिमाग में मौजूद न्यूरॉन यानी तंत्रिका कोशिकाएं पीएफएएस नाम के खतरनाक रसायनों को पहचान सकती हैं। इतना ही नहीं, टिड्डे का दिमाग अलग-अलग पीएफएएस रसायनों के बीच अंतर भी कर सकता है।
पीएफएएस को आम भाषा में “फॉरएवर केमिकल” कहा जाता है, क्योंकि ये रसायन पर्यावरण में बहुत लंबे समय तक बने रहते हैं। इन्हें खत्म करना बेहद मुश्किल होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि टिड्डे की इस क्षमता का इस्तेमाल भविष्य में पीएफएएस प्रदूषण की जल्दी और आसानी से पहचान करने वाली तकनीक बनाने में किया जा सकता है।
क्या है पीएफएएस?
पीएफएएस यानी पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थों का एक बड़ा समूह है। इन रसायनों का इस्तेमाल कई तरह के उत्पादों में किया जाता है। नॉन-स्टिक बर्तन, पानी से बचाने वाले कपड़े और कुछ अग्निशमन फोम में इनका इस्तेमाल किया गया है।
इन रसायनों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये बहुत धीरे टूटते हैं। इसलिए ये पानी, मिट्टी और जीव-जंतुओं के शरीर में लंबे समय तक रह सकते हैं। इनमें से कुछ पीएफएएस मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए चिंता का विषय माने जाते हैं।
इन रसायनों की पहचान करने के लिए अभी आम तौर पर बहुत महंगे और आधुनिक प्रयोगशाला उपकरणों की जरूरत पड़ती है। इनमें लिक्विड क्रोमैटोग्राफी और मास स्पेक्ट्रोमेट्री जैसी तकनीकें शामिल हैं।
टिड्डे के दिमाग पर किया प्रयोग
शोधकर्ताओं ने यह जानने की कोशिश की कि क्या टिड्डे की सूंघने की क्षमता पीएफएएस जैसे मानव निर्मित रसायनों को भी पहचान सकती है। इसके लिए उन्होंने टिड्डे के दिमाग के उस हिस्से में होने वाली तंत्रिका गतिविधि को रिकॉर्ड किया, जो गंध को समझने का काम करता है।
वैज्ञानिकों ने टिड्डों को कई अलग-अलग पीएफएएस रसायनों के संपर्क में लाया। इनमें पीएफओएस भी शामिल था। पीएफओएस दुनिया में सबसे अधिक पाए जाने वाले और कड़े नियमों के तहत आने वाले पीएफएएस रसायनों में से एक है।
शोधकर्ताओं ने देखा कि अलग-अलग पीएफएएस रसायनों के संपर्क में आने पर टिड्डे के दिमाग में अलग-अलग तरह के संकेत पैदा हुए। वैज्ञानिकों ने इन संकेतों को रसायनों का “गंध फिंगरप्रिंट” बताया है।
कम मात्रा में भी पहचान
इस खोज की सबसे खास बात यह है कि टिड्डे पीएफओएस जैसी पीएफएएस सामग्री को बहुत कम मात्रा में भी पहचानने में सक्षम दिखाई दिए। ये मात्रा पर्यावरण में पाए जाने वाले प्रदूषण के स्तर के करीब थी।
शोधकर्ताओं के लिए यह परिणाम काफी हैरान करने वाला था। पीएफएएस प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रसायन नहीं हैं। ये इंसानों द्वारा बनाए गए हैं और इनका इस्तेमाल भी पिछले कुछ दशकों में ही बड़े पैमाने पर हुआ है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि टिड्डे की संवेदन प्रणाली इन रसायनों को इतनी अच्छी तरह कैसे पहचान पाती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी इस सवाल का पूरा जवाब नहीं मिला है। हालांकि, परिणाम यह जरूर दिखाते हैं कि जीवित प्राणियों की संवेदन प्रणाली का इस्तेमाल नई तकनीक बनाने में किया जा सकता है।
प्रयोगशाला से बाहर ले जाने की तैयारी
मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी की टीम अब इस तकनीक को वास्तविक पर्यावरणीय नमूनों पर आजमा रही है। इसके लिए मिशिगन में एकत्र किए गए पानी के नमूनों का परीक्षण किया जा रहा है। अगर यह तरीका वास्तविक परिस्थितियों में भी सफल रहता है, तो भविष्य में इसे छोटा और पोर्टेबल बनाया जा सकता है। ऐसी मशीन को किसी जगह के पानी की जांच के लिए सीधे मौके पर ले जाया जा सकेगा।
वैज्ञानिकों की उम्मीद है कि टिड्डे की तंत्रिका प्रणाली और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स को मिलाकर ऐसा सेंसर बनाया जा सकता है, जो कई तरह के पीएफएएस रसायनों की तेजी से पहचान कर सके।
अभी शुरुआती चरण में है तकनीक
हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि टिड्डे आधारित सेंसर जल्द ही प्रयोगशालाओं की जगह ले लेंगे। यह शोध अभी एक शुरुआती प्रमाण यानी प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट है। वास्तविक पानी और मिट्टी में मौजूद कई दूसरे रसायन सेंसर के लिए चुनौती बन सकते हैं।
फिर भी यह खोज प्रदूषण की निगरानी के क्षेत्र में एक नई दिशा दिखाती है। अगर वैज्ञानिक इस तकनीक को सफलतापूर्वक विकसित कर लेते हैं, तो भविष्य में जीवों की प्राकृतिक संवेदन क्षमता का इस्तेमाल पर्यावरण में खतरनाक रसायनों की पहचान के लिए किया जा सकता है।
यह शोध जर्नल ऑफ जर्नल ऑफ हजार्डस मटीरियल्स एडवांसेज में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं के लिए अगला बड़ा लक्ष्य यह पता लगाना है कि क्या टिड्डे की यह अनोखी क्षमता प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक दुनिया में पीएफएएस प्रदूषण की पहचान का भरोसेमंद साधन बन सकती है।