माइक्रोप्लास्टिक और पीएफएएस के मिश्रण से पर्यावरण को होता है भारी नुकसान: अध्ययन

एक नए अध्ययन में पाया गया कि प्लास्टिक में उपयोग होने वाले केमिकलों के मिश्रण बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं
बुसान में संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि के लिए पांचवें दौर की वार्ता जारी है, वार्ता एक दिसंबर तक चलेगी। संधि वार्ता में प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने के साथ-साथ इनमें उपयोग होने वाले केमिकलों के बारे में भी चर्चा होने की संभावना है।
बुसान में संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि के लिए पांचवें दौर की वार्ता जारी है, वार्ता एक दिसंबर तक चलेगी। संधि वार्ता में प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने के साथ-साथ इनमें उपयोग होने वाले केमिकलों के बारे में भी चर्चा होने की संभावना है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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आज, यानी 25 नवंबर से 175 देशों के प्रतिनिधि प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए, दक्षिण कोरिया के बुसान में संयुक्त राष्ट्र वैश्विक प्लास्टिक संधि के लिए पांचवें दौर की वार्ता के लिए एकत्र हुए, जो एक दिसंबर तक चलेगी। संधि वार्ता में प्लास्टिक में उपयोग होने वाले केमिकलों के बारे में भी चर्चा होने की संभावना है।

एक नए अध्ययन से पता चलता है कि रोजमर्रा की वस्तुओं में उपयोग होने वाले केमिकलों का मिला जुला असर अलग-अलग केमिकलों की तुलना में पर्यावरण के लिए अधिक हानिकारक है। बर्मिंघम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने माइक्रोप्लास्टिक्स और पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थ (पीएफएएस) के पर्यावरणीय प्रभावों की जांच की और दिखाया कि दोनों जलीय जीवन के लिए बहुत हानिकारक हो सकते हैं।

माइक्रोप्लास्टिक छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जो प्लास्टिक की बोतलों, पैकेजिंग और कपड़ों के रेशों से आते हैं। पॉलीफ्लोरोएल्काइल पदार्थ (पीएफएएस) रसायनों का एक समूह है जिसका उपयोग रोजमर्रा की वस्तुओं जैसे नॉन-स्टिक कुकवेयर, जल-प्रतिरोधी कपड़े, अग्निशमन फोम और कई औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है।

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पीएफएएस और माइक्रोप्लास्टिक को "फॉरएवर केमिकल" के रूप में जाना जाता है क्योंकि वे आसानी से नहीं टूटते हैं और पर्यावरण में जमा हो जाते हैं, जिससे वन्यजीवों और मनुष्यों दोनों के लिए इनसे खतरे पैदा हो सकते हैं।

पीएफएएस और माइक्रोप्लास्टिक दोनों को जल प्रणालियों के माध्यम से लंबी दूरी तक, आर्कटिक तक ले जाया जा सकता है। वे अक्सर उपभोक्ता उत्पादों से एक साथ निकलते हैं। फिर भी उन दोनों के प्रभाव और जिस तरह से वे पर्यावरण में अन्य प्रदूषणकारी यौगिकों के साथ क्रिया करते हैं, उसे अभी भी ठीक से समझा नहीं गया है।

इन प्रदूषकों के मिले जुले प्रभाव को बेहतर ढंग से समझने के लिए, शोधकर्ताओं ने डैफनिया का उपयोग किया, जिसे आमतौर पर पानी के पिस्सू के रूप में जाना जाता है। इन छोटे जीवों का उपयोग अक्सर प्रदूषण के स्तर की निगरानी के लिए किया जाता है क्योंकि वे रसायनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं, जिससे वे पर्यावरण में सुरक्षित रासायनिक सीमा निर्धारित करने के लिए सबसे अच्छे हैं।

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एनवायर्नमेंटल पोलूशन नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में, टीम ने पानी के पिस्सू के दो समूहों की तुलना की: एक जो कभी रसायनों के संपर्क में नहीं आए थे और दूसरे जो अतीत में रासायनिक प्रदूषण से गुजर चुके हैं। यह अनोखा नजरिया डेफनिया की लंबे समय तक निष्क्रिय रहने की क्षमता के कारण संभव हुआ, जिससे शोधकर्ताओं को अलग-अलग प्रदूषण इतिहास वाली पुरानी आबादी को फिर से जीवित करने में मदद मिली।

डेफनिया के दोनों समूहों को उनके पूरे जीवन चक्र के दौरान अनियमित आकार के माइक्रोप्लास्टिक के मिश्रण के संपर्क में लाया गया, जो प्राकृतिक परिस्थितियों को दर्शाता है साथ ही दो पीएफएएस रसायन जो आमतौर पर झीलों में पाए जाते हैं।

शोध टीम ने दिखाया कि पीएफएएस और माइक्रोप्लास्टिक एक साथ मिलकर प्रत्येक रसायन की तुलना में अधिक गंभीर विषाक्त प्रभाव पैदा करते हैं। सबसे चिंताजनक परिणाम विकास संबंधी विफलताएं थीं, जो देरी से यौन परिपक्वता और विकास में रुकावट के साथ देखी गई।

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जब इनकों एक साथ लाया गया तो रसायनों ने डेफनिया को अपने अंडों को गिराने और कम संतान पैदा करने के लिए प्रेरित किया। ये प्रभाव ऐतिहासिक रूप से प्रदूषकों के संपर्क में आने वाले डेफनिया में अधिक गंभीर थे, जिससे वे परीक्षण किए गए फॉरएवर केमिकल के प्रति कम सहनशील हो गए।

अध्ययन में पाया गया कि दोनों केमिकलों के एक साथ होने पर ये अधिक नुकसान पहुंचाते हैं, फिटनेस लक्षणों, जैसे कि उत्तरजीविता, प्रजनन और विकास में 59 फीसदी योगात्मक और 41 फीसदी सहक्रियात्मक आंतरिक क्रियाएं देखी गई।

शोधकर्ता ने शोध के हवाले से निष्कर्षों के महत्व पर जोर देते हुए कहा, रासायनिक मिश्रणों के लंबे समय के प्रभावों को समझना जरूरी है, खासकर जब यह विचार किया जाता है कि अन्य रसायनों और पर्यावरणीय खतरों के पिछले संपर्क से जीवों की नए रासायनिक प्रदूषण को सहन करने की क्षमता कमजोर हो सकती है।

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शोधकर्ता ने शोध में कहा, वर्तमान नियामक ढांचे हर एक रसायन की विषाक्तता के परीक्षण पर गौर करते हैं, जिसमें ज्यादा तीव्र खतरे वाले नजरिए का उपयोग किया जाता है। यह जरूरी है कि हम वन्यजीवों पर उनके पूरे जीवन चक्र में प्रदूषकों के मिश्रित प्रभावों का पता लगाएं ताकि वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में इन प्रदूषकों द्वारा उत्पन्न होने वाले खतरों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।

संरक्षण प्रयासों को आगे बढ़ाने और फॉरएवर केमिकल जैसे उभरते प्रदूषकों के बढ़ते खतरे का सामना करने के लिए नीति निर्माण जरूरी है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता में प्रगति के साथ रासायनिक और जैविक जांच में नए उपकरणों का मतलब है कि हम पर्यावरण में रसायनों के बीच जटिल आंतरिक क्रियाओं को समझ सकते हैं। इसलिए पर्यावरणीय विषाक्तता का आकलन करने के लिए मौजूदा तरीकों में सुधार करना न केवल संभव है बल्कि जरूरी भी है।

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