कोलकाता में बढ़ता बाढ़ का खतरा: महज बारिश नहीं बेतरतीब विकास और आद्रभूमियों की अनदेखी भी जिम्मेवार

अध्ययन में सामने आया है कि शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से, खासकर पूर्वी कोलकाता की आद्रभूमियों और उनके आसपास तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में बाढ़ का खतरा सबसे अधिक है
फोटो: आईस्टॉक
फोटो: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • तेजी से फैलते कंक्रीट और सिकुड़ती आद्रभूमियों के बीच कोलकाता एक नए खतरे की ओर बढ़ रहा है, ऐसा खतरा जो सिर्फ बारिश से नहीं, बल्कि इंसानी विकास से पैदा हो रहा है।

  • इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग साइंस एंड टेक्नोलॉजी, शिबपुर के अध्ययन से पता चला है कि शहर का करीब एक-तिहाई हिस्सा बाढ़ से प्रभावित हो रहा है और सबसे अधिक खतरा पूर्वी कोलकाता में आद्रभूमियों और आसपास के तेजी से फैलते शहरी इलाकों में है।

  • चौंकाने वाली बात यह है कि कम बारिश के बावजूद बाढ़ का दायरा और गहराई बढ़ रही है, जो साफ संकेत देता है कि समस्या का कारण बदलता भूमि उपयोग, खराब ड्रेनेज और अनियंत्रित शहरी विस्तार है। यह अध्ययन चेतावनी देता है कि अगर आद्रभूमियों को नहीं बचाया गया और शहर की योजना नहीं बदली गई, तो कोलकाता में बाढ़ भविष्य की नहीं, बल्कि स्थायी हकीकत बन सकती है।

उपग्रह से प्राप्त आंकड़े दर्शाते हैं कि कोलकाता में आद्रभूमियां यानी वेटलैंड्स खतरे में हैं, जलजमाव वाले क्षेत्र लगातार बढ़ रहे हैं और शहर में बाढ़ का खतरा बढ़ता जा रहा है।

इस बारे में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग साइंस एंड टेक्नोलॉजी (आईआईईएसटी), शिबपुर से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए एक नए अध्ययन से पता चला है कि कोलकाता की गलियों में जमा होता बाढ़ का पानी अब महज मौसम की मार नहीं, बल्कि तेजी से हो रहे शहरीकरण और अनियंत्रित विकास का परिणाम बनता जा रहा है।

हर बार भारी बारिश के बाद शहर के निचले इलाके पानी में डूब जाते हैं, और उपग्रह से प्राप्त तस्वीरें यह स्पष्ट कर रही हैं कि बाढ़ का खतरा अब केवल बारिश पर निर्भर नहीं रह गया है। अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सेंटिनल-1 उपग्रह के आंकड़ों की मदद से 2016 से 2023 के बीच कोलकाता के बाढ़ प्रभावित इलाकों का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के जो नतीजे सामने आए हैं वे बेहद चिंताजनक हैं।

शहर का एक-तिहाई हिस्सा बाढ़ से प्रभावित

वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि इस दौरान शहर का करीब 33 फीसदी हिस्सा यानी 65.74 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित हुआ है।

यह भी पढ़ें
भारत में मौसमी आपदाओं का कहर, सात महीनों में 1626 की मौत, 157,818 हेक्टेयर फसलें बर्बाद
फोटो: आईस्टॉक

इस दौरान ज्यादातर इलाकों में पानी घुटनों तक (0.25 से 0.5 मीटर) भर जाता है, लेकिन कई निचले इलाकों में 0.75 मीटर तक भी जलभराव देखा गया। आशंका है कि इससे घर, स्कूल और अस्पताल खतरे में हैं।

इस अध्ययन के नतीजे जर्नल एडवांसेज इन स्पेस रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से, खासकर पूर्वी कोलकाता की आद्रभूमियों और उनके आसपास तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में बाढ़ का खतरा सबसे अधिक है, जहां कम बारिश के दौरान भी जलजमाव अब आम बात हो गई है।

चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ सालों में कम बारिश के बावजूद भी बाढ़ का दायरा और पानी की गहराई बढ़ी है। यानी संकेत साफ है कि यह सिर्फ बारिश का खेल नहीं, बल्कि बेतरतीब शहरीकरण, खराब ड्रेनेज सिस्टम और भूमि के बदलते स्वरुप का भी परिणाम है। साथ ही जिस तरह से आद्रभूमियों पर दबाव बढ़ रहा है, वो भी आग में घी का काम कर रहा है।

बढ़ते कंक्रीट से घट रही जमीन की पानी सोखने की क्षमता

वैज्ञानिकों के मुताबिक कंक्रीट के फैलाव ने जमीन की पानी सोखने की क्षमता छीन ली है। नतीजा, जहां पहले पानी बह जाता था, अब वहीं ठहरकर तबाही मचा रहा है।

हालांकि आद्रभूमि जैसे प्राकृतिक इलाके अब भी शहर को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, ये बाढ़ के खिलाफ ढाल की तरह काम करते हैं। यह आद्रभूमियां प्राकृतिक बफर की तरह हैं जो अतिरिक्त पानी को सोख लेती हैं।

यह भी पढ़ें
अनिल अग्रवाल डायलॉग 2025: बढ़ते तापमान और भारत पर हावी होती चरम मौसमी घटनाओं पर विशेषज्ञों ने जताई चिंता
फोटो: आईस्टॉक

अध्ययन में 2021 से 2023 के लिए उपग्रह की मदद से तैयार बाढ़ के मानचित्रों की जमीनी जांच भी की गई, जिसमें ये 87 से 90 फीसदी तक सही पाए गए। इससे अध्ययन के निष्कर्षों की विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।

यह अध्ययन पारंपरिक धारणा को चुनौती देता है कि कोलकाता में बाढ़ का मुख्य कारण केवल बारिश है। इसके बजाय यह दिखाता है कि अनियंत्रित शहरी विस्तार शहर की संवेदनशीलता को और बढ़ा रहा है।

क्या हैं समाधान?

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि आद्रभूमियों की सुरक्षा, ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार और बेहतर पर्यावरण अनुकूल शहरी योजना अपनाने से भविष्य में बाढ़ के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

देखा जाए तो कोलकाता के लिए यह महज एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि आने वाले संकट की चेतावनी है। अगर अभी भी आद्रभूमियों को नहीं बचाया गया, ड्रेनेज सिस्टम में सुधार नहीं हुआ और शहरी योजना को संतुलित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में बाढ़ कोई अस्थाई समस्या नहीं, बल्कि शहर की स्थाई हकीकत बन सकती है।

यह भी पढ़ें
नए युग में धरती: 50 के दशक में हुई थी मानव युग की शुरूआत!
फोटो: आईस्टॉक

Related Stories

No stories found.
Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in