

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्कूलों में बच्चों के लिए पौष्टिक आहार की नई गाइडलाइन जारी की है। यह गाइडलाइन स्कूलों में मिड-डे मील और कैंटीन के भोजन को सेहतमंद बनाने पर जोर देती है।
संगठन का मानना है कि सही पोषण बच्चों के सीखने और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है, जिससे वे जीवनभर स्वस्थ आदतें अपना सकते हैं।
आज दुनिया भर में करीब 47 करोड़ बच्चों को स्कूलों में भोजन मुहैया कराया जाता है। लेकिन इसके बावजूद इस बात की जानकारी बेहत सीमित है कि उन्हें जो खाना दिया जा रहा है, वह कितना पौष्टिक और संतुलित है।
स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में स्कूल जाने की उम्र का हर दसवां बच्चा मोटापे से ग्रस्त था। यानी करीब 18.8 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे के साथ जीवन गुजरने को मजबूर थे। इसी तरह हर पांचवां बच्चा (39.1 करोड़) बढ़ते वजन से जूझ रहा था।
अक्टूबर 2025 तक 104 देशों में स्कूलों के लिए स्वस्थ आहार से जुड़ी नीतियां मौजूद थीं। लेकिन केवल 48 देशों ने चीनी, नमक और हानिकारक वसा से भरपूर खाद्य पदार्थों के प्रचार पर रोक लगाई है।
क्लासरूम की पढ़ाई के साथ-साथ स्कूल की कैंटीन और मिड-डे मील की थाली भी बच्चों का भविष्य गढ़ रही है। बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा स्कूल में बिताते हैं और इसी दौरान वे खाने की अच्छी व बुरी आदतें भी सीखते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि अगर स्कूलों में बच्चों को पौष्टिक और संतुलित आहार मिले, तो वे जीवनभर खानपान की स्वस्थ आदतें अपना सकते हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्कूलों में स्वस्थ और पौष्टिक आहार को लेकर नए वैश्विक दिशानिर्देश जारी किए हैं।
यह पहला मौका है जब डब्ल्यूएचओ ने स्कूलों में स्वस्थ आहार को लेकर इस तरह की गाइडलाइन जारी की है। इसके मुताबिक स्कूल में मिलने वाला हर तरह का भोजन और पेय, चाहे वह मिड-डे मील हो, कैंटीन का खाना या स्कूल परिसर में बिकने वाली चीजें, सब कुछ सेहतमंद और पोषण से भरपूर होना चाहिए।
साझा जानकारी के मुताबिक आज दुनिया भर में करीब 47 करोड़ बच्चों को स्कूलों में भोजन मुहैया कराया जाता है। लेकिन इसके बावजूद इस बात की जानकारी बेहत सीमित है कि उन्हें जो खाना दिया जा रहा है, वह कितना पौष्टिक और संतुलित है।
मोटापा बढ़ा, कुपोषण अब भी चुनौती
स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि आज दुनिया पोषण की दोहरी समस्या से जूझ रही है। एक ओर बच्चों में मोटापा और बढ़ते वजन की समस्या तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर कुपोषण अब भी चुनौती बना हुआ है।
स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में स्कूल जाने की उम्र का हर दसवां बच्चा मोटापे से ग्रस्त था। यानी करीब 18.8 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे के साथ जीवन गुजरने को मजबूर थे। इसी तरह हर पांचवां बच्चा (39.1 करोड़) बढ़ते वजन से जूझ रहा था।
चिंता की बात है कि यह संख्या पहली बार उन बच्चों से ज्यादा हो गई है जो कम वजन या कुपोषण का शिकार हैं।
डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस का कहना है, स्कूलों में बच्चों को जैसा भोजन मिलता है और जिस तरह के परिवेश में उनका खान-पान तय होता है, उसका असर उनके सीखने पढ़ने और सेहत पर गहराई से पड़ता है।" उनके मुताबिक सही पोषण न सिर्फ बीमारियों से बचाता है, बल्कि साथ ही स्वस्थ भविष्य भी सुनिश्चित करता है।
बचपन में ही स्वस्थ आहार से जुड़ी अच्छी आदतें विकसित होती हैं। बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा स्कूल में बिताते हैं, इसलिए स्कूल ऐसा स्थान बन सकता है जहां स्वास्थ्य और समानता दोनों को मजबूत किया जा सके।
जरूरी है जंक फूड से दूरी
ऐसे में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नई गाइडलाइन में स्कूलों को भोजन व्यवस्था सुधारने के लिए कई ठोस सुझाव दिए हैं। इनके अनुसार स्कूलों में स्वस्थ भोजन और पेय की उपलब्धता बढ़ाने और जंक फूड जैसे हानिकारक विकल्पों को सीमित करने के लिए नियम तय किए जाएं।
संगठन ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि शर्करा (शुगर), संतृप्त वसा, सोडियम की मात्रा को सीमित किया जाना चाहिए, जबकि साबुत अनाज, फल, सूखे मेवे और दालों को अधिक मात्रा में शामिल करना होगा।
इसके साथ ही खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग, उनकी मात्रा, दुकानों में उन्हें रखने की जगह में भी बदलाव करने की आवश्यकता है, ताकि बच्चे अपने लिए स्वस्थ विकल्पों को चुन सकें। इसके साथ ही पोषण से भरपूर आहार की कीमत भी मायने रखती है।
नीतियां हैं, तो निगरानी भी जरूरी
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि इस दिशा में केवल नीतियां बनाना ही काफी नहीं है। उनकी निगरानी और सख्त पालन भी उतना ही जरूरी है।
स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2025 तक 104 देशों में स्कूलों के लिए स्वस्थ आहार से जुड़ी नीतियां मौजूद थीं। लेकिन केवल 48 देशों ने चीनी, नमक और हानिकारक वसा से भरपूर खाद्य पदार्थों के प्रचार पर रोक लगाई है।
यह गाइडलाइन सिर्फ देशों के लिए नहीं है। डब्ल्यूएचओ मानता है कि इसमें शहरों और स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी बेहद अहम है। स्थानीय स्तर पर लिए गए फैसले स्कूलों में स्वस्थ भोजन की पहल को जमीन पर उतार सकते हैं।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यह गाइडलाइन मोटापे पर काबू पाने और पोषण-केंद्रित स्कूल तैयार करने की वैश्विक कोशिशों को मजबूती देगी, ताकि स्कूल सिर्फ पढ़ाई के केंद्र न रहें, बल्कि बच्चों के स्वस्थ भविष्य की भी नींव बनें।
गौरतलब है कि लम्बे समय से सीएसई और डाउन टू अर्थ भी लोगों को जंक फूड से जुड़े खतरों को लेकर जागरूक करते रहे हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने एक व्यापक अध्ययन भी किया था, जिसमें जंक फ़ूड से जुड़े खतरों के बारे में चेताया गया था।